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अध्यात्म

योग- सहयोग से स्वस्थ राष्ट्र

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आज के भागदौड़ वाले जेट-युग में स्वयं को समय देना बड़ा कठिन होता जा रहा है, और स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए फास्ट फूड का सेवन, तनाव के दौरान वैज्ञानिक चेतावनी के बावजूद भी धूम्रपान और मद्यपान तो है ही। समय-समय पर शरीर के द्वारा की जाने वाली शिकायतों को सुनने के लिए फुरसत किसके पास है?..

अध्यात्म और सेवा का अद्भुत संगम क्रियायोग फाउंडेशन

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गीता के क्रियायोग को जनता तक पहुंचाने का कार्य पिछले ५० वर्षों से सद्गुरु मंगेशदा क्रियायोग फाउंडेशन निरंतर कर रहा है| मानवी मन के इस तरह उपचार के साथ समाज के दीनदुखियों की सेवा का कार्य भी चल रहा है| इस तरह मन और शरीर दोनों की सेवा का अद्भुत कार्य फाउंडेशन कर रहा है| उसके कार्यों के बारे में पल्लवी अनवेकर से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत है|..

सेवा अध्यात्म की फलश्रुति

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जब अंतःकरण की सभी वृत्तियां शुभ कार्य में लगती हैं, तो वे सेवा के रूप में प्रकट होती हैं| भारतीय मनीषा की सभी चराचर के प्रति यही भावना रही है, अध्यात्म की वास्तविक फलश्रुति भी यही है|..

डार्विन का सिद्धांत और दशावतारों की अवधारणा

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यहां डार्विन से महज फर्क इतना है कि डार्विन मानव के पूर्वज बंदर को बताते है। पॉंचवां, वामन-अवतार, लघु रूप में मानव जीवन के विकास का प्रतीक है। विष्णु का छठा, परशुराम स्वरूप मनुष्य के संपूर्ण विकास का अवतरण है। इसी अवतार के माध्यम से मानव जीवन को व्यवस्थित रूप में बसाने के लिए वनों को काटकर घर बसाने और बनाने की स्थिति को अभिव्यक्त करता है। परशुराम के हाथ में फरसा इसी परिवर्तन का द्योतक है। ..

हिंदू संस्कृति और पर्यावरण

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हिंदुत्व में हर व्याधि का समाधान दे सकने वाली शक्ति और क्षमता है परंतु इसके लिए पहले हम हिंदुओं को उस जीवन दर्शन के अनुसार जीना होगा| दुनिया का पथ प्रदर्शन करना अतीत में भी हमारा पावन कर्तव्य रहा है और हर परिस्थिति में हमें वही कार्य करना है ताकि निकट भविष्य में विश्‍व पर्यावरण का संकट टाला जा सके|..

संक्रांति पर्व

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संक्रांति का त्यौहार सामाजिक संबंध दृढ़ करने, आपस में मिलने जुलने, तनाव दूर कर, खुशियां फैलाने वाला त्यौहार है. यह पर्व केवल भारत ही नहीं, थाईलैंड, म्यांमार, कंबोडिया और श्रीलंका में भी पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है...

मन की शक्ति

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  पूरे विश्व के वैज्ञानिक जिसकी खोज न कर सके ऐसी एक खोज हिंदुस्थान के अध्यात्मिक परंपरा ने की है . वह है मानवीय मन के शक्ति की खोज . हमारे मन मे असीम शक्ति है. अणुशक्ति से भी बढ़कर है. विश्व के इतिहास में इसे हमने अनुभव किया है. कुछ साल पहले की बात है, विश्व में महासत्ता के रूप में संयुक्त अमेरिका और संयुक्त सोविएत का बोलबाला था. विश्व की सब से श्रेष्ठ, उच्चतम परमाणु शक्ति इन दो देशों के पास थी. इन दोनों में श्रेष्ठता साबित करने हेतु कई साल शीतयुद्ध चल रहा था. लेकिन पेरेस्त्रोईका और ग्लासनोस्त ..

वात्सल्य एवं राजनीति का संगम

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श्री नरेन्द्रभाई ने पू. प्रमुख स्वामी के आशीर्वाद लेने हेतु फोन किया तो कहना पड़ा कि स्वामीश्री आराम कर रहे हैं। दोपहर को और बाद में शाम को फिर फोन किया, उत्तर वही था। श्री नरेन्द्रभाई ने कहा कि स्वामीश्री के श्वासोच्छवास को सुन पाऊं, कुछ इस तरह फोन उनके पास रखिए। वही मेरे लिए आशीर्वाद समान होगा। विश्व की संस्कृति के इतिहास पर दृष्टि करने से पता चलता है कि प्राचीन समय में ऋषियों की तेजस्वी आंखों को जमाने का कोई डर नहीं था। वे स्वार्थबुद्धि से परे होने के कारण सत्यवक्ता और स्पष्टवक्ता भी थे। केवल ..

बाली में हिन्दू धर्म का विस्तार

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भारत के बाहर अन्य देशों में भी हिंदू धर्म तथा भारतीय सभ्यता के प्रमाण मिलते रहे हैं| बाली द्वीप इंडोनेशिया का हिस्सा है| वैसे वह मुस्लिम देश है, लेकिन बाली द्वीप पूर्णता हिन्दू है| इस विविधता को वे अपनी संस्कृति मानते हैं| बाली के मंदिर, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, कला, नृत्य, संगीत आदि में हिन्दू धर्म का लुभावना रूप दर्शनीय है| मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे अपने परिवार के साथ इंडोनेशिया के खूबसूरत द्वीप बाली के दर्शन का सुअवसर प्राप्त हुआ| बाली की राजधानी डेनपसार पहुंचते ही वहां के रास्तों में निर्मित ..

भगवद्गीता सबके लिए

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गीता मनुष्यमात्र को आतंकवाद, भोगवाद, पर्यावरण ह्रास, बैरभाव, ईर्ष्या आदि से बचा सकती है। संप्रदाय निरपेक्ष शाश्वत सिद्धांतों को मानव धर्म के तौर पर सिखा सकती है। आने वाले समय मेंं विश्व भगवद्गीता को मानवता की विवेक ग्रंथ के रूप में स्वीकार कर लें तो आश्चर्य की बात नहीं होगी। कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भयभीत एवं हताश हुए अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता सुनाई। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत महाकाव्य का गीता एक हिस्सा है। ‘अर्जुन को युद्ध करने हेतु प्रेरित करना’- यही कृष्ण का उद्देश्य ..

इस्लाम में स्वर्ग और नरक

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मुहम्मद पैगंबर की तरह प्रत्येक धर्म संस्थापकों ने मनुष्य के पारलौकिक जीवन और स्वर्ग-नरक की संकल्पनाओं को रचा है। शायद उसका लक्ष्य केवल इतना ही था कि जनसाधारण सन्मार्ग पर चलें और दुष्कृत्यों से दूर रहें। आज की कसौटी तो यही है कि मानवता, आपस में भाईचारा और सहिष्णुता कायम करने से पृथ्वी पर ही स्वर्ग आ जाएगा। हजारो वर्षों पूर्व से ही प्रत्येक धर्म में मानव के मरणोत्तर अस्तित्व एवं उसके पारलौकिक जीवन के विषय में विविध मत रहे हैं एवं आज भी हैं। इसके अनुसार जीवितावस्था में जिसका जैसा व्यवहार हो उसे ..