मानव जीवन पर शनि ग्रह का प्रभाव
स्रोत: हिंदी विवेक          | दिंनाक:०९-अप्रैल-२०१८



भारतीय ज्योतिष में शनि का स्थान न्यायदाता का है पर लोगों के मन में सबसे ज्यादा भय इसी ग्रह को लेकर ही होता है. सूर्यपुत्र और लंगड़े होने के कारण बहुत धीरे चलने वाले शनि की सीधी नजर जितनी लाभप्रद होती है, टेढ़ी होने पर उतनी ही खतरनाक. इस लेख में पंडित प्रसाद दीक्षित शनि के व्यवहार और प्रभावों पर विस्तृत चर्चा करेंगे....

सभ्यता का उदय भारत, चीन, मिश्र आदि देशों से माना जाता है l इन स्थानों पर सभ्यता का जो इतिहास हमें उपलब्ध हुआ है, उसमें ज्योतिष शास्त्र भी है l आज तक इस पावन विज्ञान अर्थात शास्त्र की और निरंतर खोज हो रही है l प्राचीन काल में जब संसार अज्ञान-अंधकार में मूढ़मति हुआ पड़ा था, तब भी भारत ज्ञान से परिपूर्ण था l ज्ञान आकाश से भारत जगमगा रहा था l अज्ञान अंधकार वह दूर करता चला जा रहा था l तदर्थ जोतिष भारतीय विद्या है, जो सभ्यता संस्कृति के साथ भारत की यूनान होते हुए सुदूर पूर्व पहुंची l काल गति से हमारा संबंध इन देशों से टूटता गया और पुनः स्वतंत्र शास्त्र के रूप में भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न ढंग से इन विद्याओं का विकास हुआ l

सूर्य से 88,00,60,000 मिल दूर स्थित शनि ग्रह का व्यास 71 हजार मील है l इसके तीन वलय हैं जो छल्ले की तरह इसे चारों ओर घेरे रहते हैं और इन छल्लो की मोटाई कहीं 20, कहीं 30, और 40 मील होती है l 2.5 वर्षों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है l यह अपनी धुरी पर 10 घंटे 12 मिनटों में एक चक्कर लगाता है, इसलिए मंद भी कहते हैं l शनि ग्रह का अधिकार जांघों पर रहता है l यह एक राशि पर ढाई वर्ष रहता है l यह मकर एवं कुंभ राशि का स्वामी है l इसके अपने नक्षत्र पुष्य, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद है l नपुंसकलिंगी और तामस स्वभाव वाला ग्रह है l यह पश्चिम दिशा का स्वामी है l शनि की अपनी उच्च राशि तुला एवं नीच राशि मेष है l वृष एवम मिथुन राशि इसकी मित्र राशियां तथा कर्क, सिंह और वृश्चिक इसकी शत्रु राशियां हैं l यह बुध के साथ सात्विक, शुक्र के साथ राजस तथा सूर्य एवं चंद्रमा के साथ शत्रुवत व्यवहार करता है l यह अपने स्थान से तीसरे, सातवें और दसवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है l शनि की दैनिक गति 8 कला 5 विकला या 10 घंटा 16 मिनट है l इसका रंग गहरा नीला एवं इसकी महाकाल 19 वर्ष की होती है l

शनि आयु, जीवन एवं मृत्यु का कारक ग्रह होता है l यह जीव को संपत्ति एवम विपत्ति देने वाला है l वस्तुतः शनि जीव के प्रारब्ध के व्यवस्थाओं का आकलन करता है , जिसमें सोने तपाकर इसकी कलस को दूर कर अधिक मूल्यवान बनाया जाता है l यह जीव के अंतकरण की अहम और उसकी प्रकृति की दूसरों को उभार कर उन्हें नष्ट कर देता है l शनि प्रभावित व्यक्ति एकांतप्रिय होते हैं उनके सामने एक लक्ष्य होता है और वह उसे पूर्ण करने में तत्पर रहते हैं l

समाज घर स्त्री तक की चिंता नहीं रहती ऐसे व्यक्ति आस्थावान होते हैं l ये काम करते रहते हैं और विश्वास रखते हैं कि उनके कर्मों का फल उन्हें आज नहीं तो भविष्य में अवश्य मिलेगा l उतावले नहीं होते l भीड़ भाड़ वाला स्थान उन्हें रुचिकर नहीं होता l ऐसे जातक रहस्यवादी, साहित्यकार और कलाकार होते है l करुण रस उन्हें अधिक पसंद होता है l शनि हड्डी, नीचे का दांत, बड़ी आंत एवं मांस पेशियों पर विशेष प्रभाव डालता है l वृषभ एवं तुला लग्न में योगकारक बन जाता है l अश्विनी, मघा, मूल, विशाखा, पुनर्वसु पर उत्तम फल एवं पुष्य, अनुराधा, मृगशिरा, चित्र धनिष्ठा, भरणी पर अशुभ फल प्रदान करता है l वायु रोग, सूखा रोग एवं पिंडलियों के रोग के अलावा और भी कई रोगों का कारक होता है l यदि प्रतिकूल हो तो स्नायु रोग होता है l शनि आयु कारक ग्रह है, अतः शनि जिस भाव में बैठता है उसकी आयु की वृद्धि भी करता है एवं घटाता भी है l यदि शनि शत्रु राशि का हो तो आयु घटती है l मेष, सिंह वृश्चिक राशि का शनि अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति की आयु घटेगी और मकर कुंभ वृष राशि का शनि हो तो व्यक्ति की आयु बढ़ेगी l शनि से अनेक रोगों का जन्म भी होता है l शनि दूषित हो तो कदापि नीलम धारण ना करें क्योंकि इससे केवल नुकसान होगा l ऐसी स्थिति में शनि की वैदिक ढंग से शांति कराकर शनि यंत्र सदैव गले में धारण करना श्रेष्ठ एवं सुखद रहेगा l

**********************

पंडित प्रसाद दीक्षित, ज्योतिषाचार्य एवं न्यासी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी l