बैंकों की जालसाजी और अनुशासन पर्व
स्रोत: हिंदी विवेक          | दिंनाक:३१-मार्च-२०१८




पंजाब नेशनल बैंक में 13 हजार करोड़ रु. के ऐतिहासिक घोटाले का भंड़ाफोड़ होते ही लोगों का सकते में आना स्वाभाविक है। सरकारी बैंक जिस तरह से अरबों के डूबत कर्जे में फंसे हुए हैं उसे देखते हुए धोखाधड़ी का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है। तथ्य यह है कि ये कांग्रेस शासन के जमाने के कंकाल हैं, जो छिपाए नहीं छिप सकते। मोदी सरकार के जिम्मे अब सफाई का काम आ गया है। जिस तत्परता और कड़ाई से कदम उठाए जा रहे हैं उससे तो लगता है कि वित्तीय क्षेत्र में अनुशासन पर्व का आरंभ हो रहा है।

पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में हुए 13,000 करोड़ रु. के सब से बड़े घोटाले से सभी स्तंभित रह गए। अचरज का विषय यह भी है कि पिछले 2011 से चल रहे इस घोटाले पर किसी की नजर कैसे नहीं गई? पीएनबी की अपनी अंकेक्षण और निगरानी व्यवस्था क्योंकर विफल हो गई? रिजर्व बैंक क्या कर रहा था? उसके लेखा परीक्षक क्यों सोते रहे? यही क्यों, पीएनबी के आंतरिक लेखा परीक्षक ने किस तरह और क्यों उसे आया-गया कर दिया? बैंकिंग प्रणाली इतनी लचर क्यों हो गई? पीएनबी के साथ पूरा बैंकिंग उद्योग ही किस तरह चन्द बदमाशों का शिकार हो गया? इस तरह के अनेक प्रश्नों के जवाब में इतनी रहस्यमय जानकारी सामने आएगी कि हम भौचक रह जाएंगे।

ऐसे हुआ घोटाला

पीएनबी घोटाले के खलनायक नीरव मोदी एवं मेहुल चोकसी हैं। दोनों मामा-भांजे हैं याने मेहुल मामा और नीरव भांजा। वे गुजरात के पालनपुर के हैं अर्थात पालनपुरिया हैं। पालनपुरिया ज्यादातर हीरे और आभूषणों के कारोबार में पुस्तैनी रूप से लगे हुए हैं। पालनपुरियों में परम्परा है कि कोई व्यापारी किसी कारण से संकट में फंस जाए तो बाकी पालनपुरिया उसकी सहायता कर उसे उबार लेते हैं। लेकिन घोटाला इतना बड़ा और गंभीर है कि नीरव और मेहुल को उबारने में कोई अपने हाथ नहीं जलाना चाहता। इस वर्ग के कोई 400 परिवार एंटवर्प, बेल्जियम में हैं। ज्यादातर शाह और मेहता हैं, मोदी या चोकसी या अन्य उपनाम वालों की संख्या कम है। उन्होंने वहां का परम्परागत हीरा व्यापार यहूदियों से करीब-करीब छीन लिया है।

नीरव और मेहुल ने रातोरात हीरा सम्राट बनने के चक्कर में उन्होंने पीएनबी को कोई 13,000 करोड़ रु. का चूना लगाया। बैंक कारोबार में कमीशन लेकर किसी व्यापारी के लेनदेन की गारंटी लेना आम व्यवहार है। बैंक के मुनाफे का वह एक जरिया है। यह गारंटी साख-पत्र देकर ली जाती है। वह तीन प्रकार का होता है। एक- लेटर ऑफ क्रेडिट अर्थात एलसी, जो माल खरीदी के लिए दिया जाता है। जिससे माल खरीदा उसे बैंक कमीशन लेकर भुगतान कर देता है अथवा भुगतान की आश्वस्ति देता है। दूसरा लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (भुगतान की गारंटी) याने संक्षेप में एलओयू। भारत में कोई बैंक यदि किसी के पक्ष में एलओयू जारी करता है तो उसके आधार पर एलओयूधारी विदेश में किसी भारतीय बैंक की किसी शाखा से रुपये में ॠण उठा सकता है। उसका बाद में वह स्थानीय मुद्रा में विनिमय कर सकता है। इसे नोस्त्रो खाता कहते हैं। तीसरा है फारेन लेटर ऑफ के्रडिट अर्थात एफएलसी याने विदेशी मुद्रा में ॠण की गारंटी। यह पारिभाषिक बैंकिंग शब्दावली हैं और कुछ तकनीकी हैं। उसे आसानी से समझने की दृष्टि से आम बोलचाल में लिखा है। पीएनबी का जो घोटाला उजागर हुआ है वह एलओयू का है और पीएनबी की मुंबई ब्राडी हाऊस शाखा से जुड़ा है।

नीरव और मेहुल ने ब्राडी हाऊस शाखा से ऐसे एलओयू जारी करवाए। बाद में इन एलओयू को भारतीय बैंकों की विदेशों में स्थित शाखाओं में जमा किया और वहां से पैसे उठा लिए। एलओयू तीन लोगों के हाथ से गुजरता है। एक जारी करने वाला, दूसरा उसकी जांच करने वाला और तीसरा उन दोनों से वरिष्ठ अधिकारी। एलओयू विदेश में जिस भारतीय बैंक में ॠण उठाने के लिए जमा किया जाता है वह बैंक मूल बैंक शाखा से पुष्टि किए बिना ॠण जारी नहीं करता। पुष्टि और संदेशों के आदान-प्रदान के लिए ‘स्विफ्ट’ नामक ई-प्रणाली है। ‘स्विफ्ट’ के लिए सम्बंधित तीनों लोगों के अलग-अलग पासवर्ड होते हैं। जब तक तीनों न मिले या ऊपर से कोई निर्देश न हो तब तक ‘स्विफ्ट’ से छेड़छाड़ संभव नहीं है। यह घोटाला इसलिए दबा रहा क्योंकि इन संदेशों का बैंक में अलग से कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता। बैंक के खातों में भी वह दिखाई नहीं देता। क्योंकि सारा लेनदेन विदेशी शाखा में हो जाता है। यहां तक कि बैंक के आंतरिक लेखा परीक्षकों ने भी स्विफ्ट संदेशों का मुआयना नहीं किया, न रिजर्व बैंक ने निगरानी के कोई कष्ट उठाए।

आयात-निर्यात व्यापार में एलओयू जारी करना आम बात है। बैंक के व्यवसाय का यह एक हिस्सा है। एलओयू अर्थात भुगतान गारंटी के बदले बैंक को कमीशन मिलता है, जो बैंक की आय है। अक्सर कोई न कोई सम्पत्ति रेहन रख कर ही एलओयू जारी किया जाता है, जबकि नीरव-मेहुल के मामले में ऐसा नहीं हुआ। एलओयू के बदले पीएनबी ने कोई सम्पत्ति रेहन नहीं रखी। हीरा-आभूषण के कारोबार में एलओयू 90 दिनों के लिए होता है। इस अवधि के बाद बहुत कम लोग भुगतान करते हैं। उसे अगली अवधि के लिए बढ़ा देते हैं। इसे रोल-ओवर कहते हैं। इसमें बैंक का कमीशन फिर जोड़ा जाता है। इस तरह रकम बढ़ते चली जाती है। नीरव-मेहुल के मामले में ऐसे ही होता रहा और पिछले पांच साल से रकम रोल-ओवर होती रही, कमीशन जुड़ता गया, नए एलओयू जारी होते रहे, विदेश में ॠण उठाना जारी रहा और ॠण का भुगतान आया ही नहीं।

बैंकिंग क्षेत्र में कोई कर्मचारी या अधिकारी तीन साल से अधिक समय के लिए एक ही डेस्क या एक ही शाखा में नहीं रहता। उसका तबादला होता रहता है। लेकिन इस मामले में गोकुलनाथ शेट्टी नामक एक ही अधिकारी 2011 से एक ही डेस्क पर बना रहा और 31 मई 17 को निवृत्त हुआ। 2011 से 2017 तक 6 साल में उसने 6,498 करोड़ रु. के 150 एलओयू जारी किए। निवृत्ति के अंतिम दो माह में तो उसने 3032 करोड़ रु. के 143 एलओयू और 1,854 करोड़ रु. के एफएलसी (विदेशी साख पत्र) जारी किए। इस तरह घोटाला कुल 11,384 करोड़ रु. तक पहुंच गया। अब तो वह 13,000 करोड़ रु. के आसपास पहुंच गया है। इस घोटाले के शिकार यूनियन बैंक (2300 करोड़ रु.), एक्सिस बैंक 2200 करोड़ रु.), इलाहाबाद बैंक (2000 करोड़ रु.), कैनरा बैंक (1000 करोड़ रु.) और बैंक ऑफ इंडिया (1000 करोड़ रु.) हैं।

कौन हैं नीरव और मेहुल?

नीरव मोदी और मेहुल चोकसी दोनों रिश्तेदार हैं। नीरव का जन्म जामनगर में 1970 में हुआ। हीरा व्यापार उनका पुश्तैनी व्यवसाय था। उसके दादा केशवलाल मोदी चेन्नई और सिंगापुर में इसी कारोबार में थे। पिता दीपक मोदी अपने ममेरे भाई मेहुल चोकसी के साथ मुंबई में कारोबार करते थे और नीरव 19 साल की उम्र से ही उसमें हाथ बंटाता था। मेहुल चोकसी गीतांजलि, गिली और नक्षत्र जैसे प्रसिद्ध आभूषण शोरुम के मालिक हैं। उनके विश्वभर में 4000 से अधिक स्टोर्स हैं। नीरव अमेरिका के पेनीसिल्वेनिया के वार्टन स्कूल में पढ़ा है। उसकी पत्नी अमी भी वहीं पढ़ी है। दोनों का प्यार बाद में विवाह में बदल गया। वह अमेरिकी नागरिक है। नीरव भले ही जामनगर में पैदा हुआ, लेकिन पला-बढ़ा एंटवर्प, बेल्जियम में। कहते हैं कि उसके पास भारत के अलावा बेल्जियम का भी पासपोर्ट है। एंटवर्प हीरा व्यापार के लिए दुनियाभर में मशहूर है। उसने अपने मामा मेहुल चोकसी के साथ रह कर व्यापार के गुर सीखे और 2010 में ‘नीरव मोदी ग्लोबल डायमंड ज्वेलरी हाऊस’ नामक फर्म की स्थापना की। उसके छोटे भाई निशाल की शादी मुकेश और अनिल अंबानी की बहन की बेटी अर्थात भांजी के साथ हुई है। नीरव ने महज 19 साल की उम्र में ही ‘फायरस्टार डायमंड’ नामक कम्पनी की स्थापना की, जो हीरे के साथ हीरा आभूषणों का भी व्यापार करती थी। दुनियाभर में उसके 17 प्रमुख स्थानों पर शोरुम हैं। चोकसी पर भी हीरा आयात के एक मामले में 48 करोड़ का जुर्माना लग चुका है, फिर भी आगे कुछ नहीं हुआ। उनके रिश्तों का जाल हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक और राजनीतिक नेताओं से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों-उद्योगपतियों तक फैला हुआ है। कभी वे फोर्स पत्रिका की दुनियाभर के अमीरों की सूची में भी थे। उनकी पृष्ठभूमि इसलिए लिखी कि उनकी पहुंच ध्यान में आ जाए। इसी का लाभ उठाकर मामा-भांजे ने ऐसे गुल खिलाए कि पूरा भारतीय बैंकिंग उद्योग ही चपेट में आ गया।

पूर्ववर्ती बैंक घोटाले

1992 ः हर्षद मेहेता शेयर घोटाला- लगभग 4,900 करोड़ रु.। उन दिनों शेयरों या प्रतिभूतियों के लिए डिमैट खाते नहीं हुआ करते थे। डिमैट का मतलब है शेयरों का आपका डिजिटल खाता, जो किसी अधिकृत शेयर ब्रोकर के पास हो। उस खाते से सारा लेनदेन ई-माध्यम (कंप्यूटर) के जरिए ही होगा। हर्षद मेहता के जमाने में शेयरों का लेनदेन बैंकों द्वारा जारी टोकन के जरिए होता था। इसे बैंकर्स रसीद या बीआर कहा जाता था। प्रत्यक्ष शेयर या प्रतिभूतियों का तत्काल हस्तांतरण नहीं होता था। हर्षद मेहता ने बैंक ऑफ कराड और बॉम्बे मर्केंटाइल बैंक से सांठगांठ कर फर्जी बीआर बनवा कर अन्य बैंकों से पैसा उठाया और चुकता नहीं कर पाया।

1996 ः सीआरबी फाइनेंस- 57 करोड़ रु.। सीआरबी फाइनेंस के संस्थापक चैनरूप भंसाली को स्टेट बैंक से पूर्व-मुद्रित वारंट्स की सुविधा प्राप्त थी। उन दिनों कोर बैंकिंग नहीं था इसलिए इन वारंटों का डिमांड ड्राफ्ट की तरह स्थानीय तौर पर भुगतान कर दिया जाता था। भंसाली ने अपने ही नाम से अन्य शहरों में हजारों वारंट्स जारी किए और रकम डकार ली।

2001 ः होम ट्रेड- 600 करोड़ रु.। संजय अग्रवाल को शेयर दलाली की अच्छी जानकारी थी। उसने होम ट्रेड नाम से ऑनलाइन पोर्टल बनाया। करोड़ों रु. प्रचार पर खर्च किए। सरकारी बाँड देने के नाम पर उसने सहकारी बैंकों से 600 करोड़ रु. ऐंठ लिए।

2001 ः केतन पारेख- 1200 करोड़ रु.। उसने माधवपुरा मर्केंटाइल कोआपरेटिव बैंक से सांठगांठ कर खाते में धन न होते हुए भी पे-आर्डर जारी करने की व्यवस्था कर ली। इन पे-आर्डर के आधार पर बैंक ऑफ बड़ौदा ने भुगतान कर दिया और इस फर्जीवाडे में उसकी रकम फंस गई।

2015 ः बिल डिस्काउंटिंग- 350 करोड़। बैंक ऑफ बड़ौदा में ही फर्जी निर्यात बिलों के आधार पर रकम उठाने का मामला प्रकाश में आया।

फर्जी आयात-निर्यात

हीरा व्यापार में फर्जी आयात-निर्यात का बहुत बोलबाला है। केवल कागजों पर आयात-निर्यात होता रहता है। वही माल बारबार निर्यात व आयात किया जाता है। यूपीए-1 के शासन के दौरान सन 2007 से यह गोरखधंधा खूब चला। तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने तराशे हीरों के आयात पर 3% का आयात शुल्क हटा दिया था। कुछ हीरा व्यापारियों ने इसका दुरुपयोग किया। वे अपने ही लोगों को निर्यात दिखा कर बैंकों से रियायती ॠण उठाते थे और ब्याज के अंतर को चट कर जाते थे। यह धंधा स्वतंत्र लेख का विषय है। केवल संकेत के लिए इसका यहां उल्लेख किया है। सन 2010-11 में सरकार के ध्यान में यह बात आई कि तराशे हीरों का आयात 60 फीसदी बढ़ कर 12,900 करोड़ रु. हो गया है। उस समय प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री थे। इस गोरखधंधे की बात उनके ध्यान में आते ही उन्होंने न केवल मुक्त आयात बंद कर दिया बल्कि इस आयात पर 2% आयात शुल्क लागू कर दिया। खबर तो यह भी आई है कि पी.चिदम्बरम ने 2014 में मतगणना के दिन ही हीरा व्यवसाय को लाभ पहुंचाने वाले कई निर्णय जारी कर दिए। वे भी अब इस जांच के दायरे में आ जाएंगे। बेटा कार्ति पहले ही आइएनएक्स भ्रष्टाचार के मामले में फंस चुका है। इससे स्पष्ट होता है कि किस तरह मामा-भांजे को सरकारी आशीर्वाद प्राप्त होता रहा।

हर चार घंटे में एक भ्रष्टाचारी

पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि सरकारी बैंकों में भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में कोई 5,000 कर्मचारियों और 30 अधिकारियों को दंडित किया गया। अधिकारियों में पंजाब नेशनल बैंक और यूनाइटेड़ बैंक (प्रत्येकी 5) और स्टेट बैंक के 4 अधिकारियों को भ्रष्टाचार में लिप्त पाया गया। दस अन्य बैंकों के कुल 16 अधिकारियों पर मामले चले। कर्मचारियों में सर्वाधिक मामले स्टेट बैंक (1538) के थे। इसके बाद पीएनबी (184) और यूनाइटेड़ बैंक (141) का नम्बर आता है। 24 अन्य बैंकों के भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारियों की संख्या 3137 थी।

पिछले दो वर्ष की अवधि और पकड़े गए कर्मचारियों का अनुपात लगाए तो निचोड़ निकलता है कि हर चार घंटे में एक बैंक कर्मी भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़ा गया है। इससे यह भी पता चलता है सरकारी बैंक भ्रष्टाचार से कितने जर्जर हो चुके हैं। यह सब यकायक नहीं हुआ है। बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस ने बैंकों से जो खिलवाड़ की, उसका यह दीर्घावधि परिणाम है। नतीजा यह है कि पिछले 11 वर्षों में हुए तीनों वित्त मंत्रियों- प्रणव मुखर्जी, पी.चिदम्बरम और वर्तमान अरुण जेटली को बैंकों के घाटे की पूर्ति के लिए सरकारी बजट से 2.6 लाख करोड़ रु. देने पड़े हैं। इस लूट का परिणाम जनता को भुगतना पड़ा है।

राजनीतिक पैंतरेबाजी

इस मामले पर बहुत राजनीति चल रही है और संसद से लेकर सड़कों तक आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जारी रहेगा। जालसाजी के खुलते ही विपक्षी दल कांग्रेस ने डावोस सम्मेलन के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भारतीय उद्योगतियों की एक समूह फोटो में नीरव के उपस्थित होने की फोटो जारी कर भाजपा को घेरने की कोशिश की, जबकि पलटवार में भाजपा ने कहा कि उनके पास भी फोटो है चमकाने के लिए। इसके बाद फोटो मामला कुछ ठण्डा पड़ता दिखा। लेकिन फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि नीरव और मेहुल को सरकार ने देश से भागने दिया और इसमें सांठगांठ है। जवाब में भाजपा ने विजय मल्या और ललित मोदी जैसे कांग्रेस के राज में भागे लोगों की याद दिला दी। यही नहीं, यह भी उजागर कर दिया कि गीतांजलि शोरूम के राहुल गांधी द्वारा उद्घाटन के दूसरे ही दिन इलाहाबाद बैंक पर चोकसी को कर्ज देने के लिए किस तरह दबाव डाला गया। इन राजनीतिक जुमलेबाजी पर गौर करें तो इतना अवश्य स्पष्ट होगा कि सरकारी बैंकों की वर्तमान स्थिति के लिए कांग्रेस अपनी जिम्मेदारी को झटक नहीं सकती; क्योंकि अधिकतर समय तक उनका ही राज रहा है और वित्तीय क्षेत्र में आज की जर्जरता और अनुशासनहीनता उनके कुशासन, स्वार्थ और लालच की ही देन है।

सख्त कदम और कड़ा अनुशासन

बैंकों की सेहत को सुधारने के लिए कड़े अनुशासन और सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। इसे राजनीति की अपेक्षा राष्ट्रीय वित्तीय समस्या मान कर चलना और रास्ते खोजना सब के लिए हितावह होगा। वर्तमान मोदी सरकार ने घोटाला खुलते ही जिस सख्ती और तत्परता से कदम उठाने शुरू किए वह अभूतपूर्व है। इन कदमों को संक्षेप में इस तरह रखा जा सकता हैः

1. सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, आर्थिक अपराध विभाग आदि ने तत्परता से कार्रवाई कर देशभर में छापामारी की और कई लोगों को गिरफ्तार किया। इनमें सम्बंधित बैंकों के अधिकारी-कर्मचारी भी शामिल हैं।

2. पीएनबी मामले में नीरव और मेहुल चोकसी की कई स्वदेशी सम्पत्तियों को जब्त कर दिया गया, जिसका मूल्य 5,000 करोड़ रु. से अधिक बताया जाता है। उनकी विदेशी सम्पत्तियों के बारे में सम्बंधित देशों से वार्ता प्रस्तावित है। जिन देशों के साथ आरोपी को लौटाने की संधियां हैं, उन देशों में यह संभव है। उनके सारे खाते सील कर दिए गए हैं।

3. रिजर्व बैंक ने वाई.एच. मालेगाम के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया है, जो पूरे मामले पर अपनी रिपोर्ट देगी और खामियों की निशानदेही करेगी तथा इस तरह की जालसाजी रोकने के उपायों का सुझाव देगी। मालेगाम 17 वर्ष तक रिजर्व बैंक बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं और बैंकिंग और अंकेक्षण प्रणाली के विशेषज्ञ हैं।

4. सरकार ने 50 करोड़ रु. से अधिक के डूबत ॠण मामलों की दो हफ्ते के भीतर जांच और यथास्थिति की सूचना देने का बैंकों को आदेश दिया है, ताकि किसी संभावित धोखाधड़ी को समय पर ही रोका जा सके। 100 करोड़ रु. से अधिक के ॠण मामलों की भी अलग से जांच होगी और इसकी सूचना रिजर्व बैंक को त्वरित देनी होगी।

4. लेखा परीक्षण के नियमन और निगरानी के लिए ‘नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी’ के नाम से नई संस्था कायम की जा रही है। अब तक इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) सीए की परीक्षा लेने और सनद देने के साथ-साथ लेखा परीक्षण का नियमन भी करती थी। अब इस संस्था के पास केवल परीक्षा लेने और सनद देने का ही काम रह जाएगा। लेखा परीक्षण के नियमन और निगरानी का काम नई संस्था करेगी।

5. एक नए विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल में मंजूरी दी है, जिसके अंतर्गत वित्तीय जालसाजी, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के प्रति बेहद कड़ाई बरती जाएगी। पश्चिमी देशों की तर्ज पर यह कड़ा कानून प्रस्तावित है। भारत में अब तक इसके लिए भारतीय दण्ड विधान (आईपीसी) के अंतर्गत ही मामले चलते हैं और वह भी सालों बाद हल्कीफुल्की सजा पाकर भ्रष्टाचारी छूट जाते हैं। नए कानून के तहत भारी सजा का प्रावधान है। यही नहीं, भ्रष्टाचारी के परिवार और सहयोगियों की देश-विदेश की सम्पत्तियों को भी जब्त किया जाएगा। बेनामी सम्पत्ति वैसे भी जब्त होगी। सहयोगियों या मित्रों या दूर के रिश्तेदारों पर ऐसी सम्पत्ति रखने के लिए कार्रवाई की जाएगी।

6. इसी तरह कम्पनियों या अन्यों द्वारा जनता से जमा राशि लेने पर भी नियंत्रण लाने वाला एक नया कानून प्रस्तावित है। इस विधेयक के अनुसार जमा राशि स्वीकार करने के लिए सरकार के पास पंजीयन कराना होगा। विधेयक के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 5 से 7 साल की सजा होगी। इसमें किश्तें जमा कर निर्धारित अवधि के बाद निश्चित सोना, जमीन, प्लाट या अन्य कोई चीज देने जैसी फर्जी योजनाओं पर अंकुश लगेगा। ऐसी जमा राशि स्वीकार करने वाले का दीवाला निकलने पर जमाकर्ताओं की राशि के भुगतान को प्राथमिकता दी जाएगी।

जिस सख्ती और तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं उससे भ्रष्टाचार और जालसाजी के प्रति शून्य सहनीयता (जीरो टालरेंस) का सरकार का इरादा दिखाई देता है। इसलिए आने वाली अवधि को वित्तीय अनुशासन पर्व कहने में कोई हर्ज नहीं है। अनुशासन का पर्व तो वैसे भी सरकार के हर मंत्रालय में गाहे-बगाहे दिखाई दे ही रहा है। ‘स्वच्छ भारत’ बाहर ही नहीं, अंदर भी करना पड़ रहा है। बाहर की अपेक्षा अंदर ज्यादा गंदगी है, जिसे साफ करना समय की मांग तो है ही, किसी भी काम करने वाली सरकार का कर्तव्य और जिम्मेदारी भी है।