राजनीति में उलझा कावेरी जल-विवाद
स्रोत: हिंदी विवेक          | दिंनाक:३१-मार्च-२०१८





कावेरी के जल बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में बरसों से विवाद और कानूनी लड़ाई चलती रही। इस पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी आ चुका है, लेकिन दोनों में से कोई राज्य संतुष्ट नहीं है। इसी तरह के विवाद हरियाणा-पंजाब, कर्नाटक-महाराष्ट्र-गोवा, केरल-तमिलनाडु आदि राज्यों में भी लम्बे अर्से से चल रहे हैं। ये विवाद राजनीति की भेंट चढ़ गए हैं।
र्नाटक और तमिलनाडु की जीवन रेखा मानी जाने वाली नदी कावेरी के जल को लेकर देश के दो बड़े राज्यों में हिंसा और आगजनी सामने आती रहती है। जबकि कावेरी दोनों राज्यों के करोड़ों लोगों के लिए वरदान है, लेकिन निहित राजनैतिक स्वार्थों के चलते कर्नाटक और तमिलनाडु की जनता के बीच केवल आगजनी और हिंसा के ही नहीं, सांस्कृतिक टकराव के हालात भी उत्पन्न हो जाते हैं। सनातन भारतीय संस्कृति में पानी पिलाना पुण्य का श्रेष्ठ काम माना जाता है, लेकिन यहां स्वार्थी तत्व एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए हैं। इसलिए पानी में आग का मुहावरा यहां विकृत रूप में चरितार्थ होता रहता है।

दरअसल तमिलनाडु में इस साल कम बारिश होने के कारण पानी की जबरदस्त किल्लत है। इस समस्या के तात्कालिक निदान के लिए तमिलनाडु ने सर्वोच्च न्यायालय से पानी देने की गुहार लगाई थी। कम बारिश के कारण राज्य में हुई दयनीय स्थिति को उजागार करते हुए कहा गया था कि तमिलनाडु की चालीस हजार एकड़ में खड़ी फसल बर्बाद हो रही है, इसलिए उसे कृषि और किसानों की आजीवका के लिए तुरंत पानी की जरूरत है। हालांकि कर्नाटक ने अदालत को उत्तर देते हुए कहा था कि कम बारिश के कारण राज्य के अधिकतर जलाशय खाली हैं इसलिए पानी देना मुमकिन नहीं है। कर्नाटक सरकार ने उच्च न्यायालय को यह भी बताया कि कावेरी नदी जल-विवाद न्यायाधिकरण ने समता के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार अंतरराज्यीय कावेरी नदी के जल का बंटवारा नहीं किया है। इसलिए इसमें समता का सिद्धांत लागू किया जाए।

भारत में नदियों के जल का बंटवारा, बांधों का निर्माण और राज्यों के बीच उसकी हिस्सेदारी एक गंभीर व अनसुलझी रहने वाली समस्या बनी हुई है। इसका मुख्य कारण है, नदी जैसे प्राकृतिक संसाधन के समुचित व तर्कसंगत उपयोग की जगह राजनीतिक सोच से प्रेरित होकर नदियों के जल का दोहन करना है। कर्नाटक में जल विवाद के सामने आते ही पूर्व प्रधान मंत्री एच. डी. देवेगौड़ा ने क्षेत्रीय मानसिकता से काम लेते हुए इस मुद्दे को भड़काने का काम कर दिया था। उन्होंने कहा था कि “इस मुद्दे पर लड़ाई जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियों व जनता को एकजुट होना होगा।” यही नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी नाराजी जताते हुए कहा, “तमिलनाडु के किसान एक साल में तीन फसल उगा रहे हैं, जबकि कर्नाटक के पास एक फसल के लिए भी पानी नहीं है। ऐसे में उन्हें पानी देना कैसे संभव है? इसके विरोध में हमें तमिलनाडु के लोगों की तरह एकजुट होना होगा।” देश के प्रधान मंत्री रहे व्यक्ति भी जब किसी विवाद को सुलझाने की बजाय क्षेत्रीयता के आधार पर लोगों को उकसाने की बात करें, तो तय है कि विवाद उलझेगा ही। ऐसी ही एकपक्षीय धारणाओं की वजह से कर्नाटक-तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद 125 साल से स्थायी बना हुआ है।

दक्षिण भारत की गंगा मानी जाने वाली कावेरी नदी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु में बहने वाली जीवनदायी सदानीरा नदी है। यह पश्चिमी घाट के ब्रह्मगिरी पर्वत से निकली है। यह 800 किलोमीटर लंबी हैं। इसके आसपास के दोनों राज्यों के हिस्सों में खेती होती है। तमिल भाषा में कावेरी को ‘पोन्नी’ कहते हैं। पोन्नी का अर्थ सोना उगाना है। दोनों राज्यों की स्थानीय आबादी में ऐसी लोकमान्यता है कि कावेरी के जल में धूल के कण मिले हुए हैं। इस लोकमान्यता को हम इस अर्थ में ले सकते हैं कि कावेरी के पानी से जिन खेतों में सिंचाई होती है, उन खेतों से फसल के रूप में सोना पैदा होता है। इसीलिए यह नदी कर्नाटक और तमिलनाडु की कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूलाधार है। ब्रह्मगिरी पर्वत कर्नाटक के कुर्ग क्षेत्र में आता है, जो कर्नाटक के अस्तित्व में आने से पहले मैसूर राज्य में था। यहीं से यह नदी मैसूर राज्य को सिंचित करती हुई दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई तमिलनाडु में प्रवेश करती है और फिर इस राज्य के बड़े भू-भाग को जल से अभिसिंचित करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

1892 व 1924 में मैसूर राज्य व मद्रास प्रेसिडेंसी; वर्तमान तमिलनाडु के बीच जल बंटवारे को लेकर समझौते हुए थे। आजादी के बाद मैसूर का कर्नाटक में विलय हो गया। इसके बाद से कर्नाटक को लगने लगा कि मद्रास प्रेसिडेंसी पर अंग्रेजों का प्रभाव अधिक था, इसलिए समझौता मद्रास के पक्ष में किया गया है। लिहाजा वह इस समझौते को नहीं मानता है। जबकि तमिलनाडू का तर्क है कि पूर्व समझौते के मुताबिक उसने ऐसी कृषि योग्य भूमि विकसित कर ली है, जिसकी खेती कावेरी से मिलने वाले सिंचाई हेतु जल के बिना संभव ही नहीं है। इस बावत 1986 में तमिलनाडु ने विवाद के निपटारे के लिए केंद्र सरकार से एक ट्रिब्यूनल बनाने की मांग की। नदी विवाद जल अधिनियम के तहत 1990 में ट्रिब्यूनल बनाया गया। इस ट्रिब्यूनल ने कर्नाटक को आदेश दिया कि तमिलनाडु को 419 अरब क्यूसेक फीट पानी, केरल को 30 अरब तथा पांडीचेरी को 2 अरब क्यूसेक पानी दिया जाए। किंतु कर्नाटक ने इस आदेश को मानने से इंकार करते हुए कहा कि कावेरी पर हमारा पूरा हक है, इसलिए हम पानी नहीं देंगे।

कर्नाटक का तर्क है कि अंग्रेजों के शासनकाल में कुर्ग मैसूर रियासत का हिस्सा था, और तमिलनाडु मद्रास प्रेसिडेंसी के रूप में फिरंगी हुकूमत का गुलाम था। गोया, 1924 के फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता है। हालांकि अभी भी ट्रिब्यूनल के इसी फैसले और अदालत के दबाव में कर्नाटक मजबूरीवश तमिलनाडु को पानी दे रहा है, लेकिन उसकी पानी देने की मंशा कतई नहीं है। यह पानी कर्नाटक में कावेरी नदी पर बने कृष्ण-राजा सागर बांध से दिया जाता है। जबकि तमिलनाडु कावेरी के पानी पर ज्यादा हक की मांग इसलिए करता है, क्योंकि कावेरी का 54 प्रतिशत बेसिन इलाका उसके क्षेत्र में है। कर्नाटक में बेसिन क्षेत्र 42 प्रतिशत है। इसी आधार पर ट्रिब्यूनल ने तमिलनाडु को कावेरी के 58 प्रतिशत पानी का हकदार बताया था। लेकिन कर्नाटक केवल एक हजार टीएमसी पानी देने को तैयार है, इसीलिए न्यायालय के संशोधित आदेश को भी जनता ने मंजूर नहीं किया।

दरअसल, भारत में नदियों के जल बंटवारे और बांधों की ऊंचाई से जुड़े अंतरराज्जीय जल विवाद अब राज्यों की वास्तविक जरूरत के बजाय सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और वोट बैंक की राजनीति का शिकार होते जा रहे हैं। जैसा कि देवेगौड़ा के बयान से परिलक्षित होता है। इसीलिए जल विवाद केवल कावेरी नदी से जुड़ा इकलौता विवाद नहीं है, बल्कि कई और भी विवाद इसी तरह दशकों से बने चले आ रहे हैं। तमिलनाडु व केरल के बीच मुल्ला पेरियार बांध की ऊंचाई को लेकर भी विवाद गहराया हुआ है। तमिलनाडु इस बांध की ऊंचाई 132 फीट से बढ़ाकर 142 फीट करना चाहता है, वहीं केरल इसकी ऊंचाई कम रखना चाहता है। इस परिप्रेक्ष्य में केरल का दावा है कि यह बांध खतरनाक है, इसीलिए इसकी जगह नया बांध बनना चाहिए जबकि तमिलनाडु ऐसे किसी खतरे की आशंका को सिरे से खारिज करता है। गौरतलब है कि पेरियार नदी पर बंधा यह बांध 1895 में अंग्रेजों ने मद्रास प्रेसिडेंसी को 999 साल के पट्टे पर दिया था। जाहिर है, अंग्रेजों ने अपने शासन काल में अपनी सुविधा और जरूरत के मुताबिक बांधों का निर्माण व अन्य विकास कार्य किए। लेकिन स्वतंत्र भारत में उन कार्यों, फैसलों और समझौतों की राज्यों की नई भौगोलिक सीमा के गठन व उस राज्य में रहने वाली जनता की सुविधा व जरूरत के हिसाब से पुनर्व्याख्या करने की जरूरत है। क्योंकि अब राज्यों के तर्क वर्तमान जरूरतों के हिसाब से सामने आ रहे हैं। इस लिहाज से केरल का तर्क है कि इस पुराने बांध की उम्र पूरी हो चुकी है, लिहाजा यह कभी भी टूट कर धराशायी हो सकता है। अब इस आशंका की तकनीकी समीक्षा हो और अगर शंका निर्मूल है तो जनता को जागरूक करने की जरूरत है। इस परिप्रेक्ष्य में तमिलनाडु की शंका है कि केरल जिस नए बांध के निर्माण का प्रस्ताव रख रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु को पूर्व की तरह पानी देता रहेगा। इसलिए प्रस्ताव में दोनों राज्यों के हितों से जुड़ी शर्तों का पहले अनुबंध हो, तब बांध को तोड़ा जाए। केरल के सांसदों ने राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन से भी इस मुद्दे में हस्तक्षेप की अपील की है। इन विवादों के चलते इस मसले का भी निवारण नहीं हो पा रहा है।

इसी तरह पांच नदियों वाले प्रदेश पंजाब में रावी व ब्यास नदी के जल बंटवारे पर पंजाब और हरियाणा पिछले कई दशकों से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। इनके बीच दूसरा जल विवाद सतलुज और यमुना लिंक का भी है। प्रस्तावित योजना के तहत सतलुज और यमुना नदियों को जोड़ कर नहर बनाने से पूर्वी व पश्चिमी भारत के बीच अस्तित्व में आने वाले जलमार्ग से परिवहन की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मार्ग से जहाजों के द्वारा सामान का आवागमन शुरू हो जाएगा। मसलन सड़क के समानांतर जलमार्ग का विकल्प खुल जाएगा। हरियाणा ने तो अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा कर लिया है, लेकिन पंजाब को इसमें कुछ नुकसान नजर आया तो उसने विधान सभा में प्रस्ताव लाकर इस समझौते को ही रद्द कर दिया। लिहाजा अब यह मामला भी अदालत में है। इसी तरह कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के बीच महादयी नदी के जल बंटवारे को लेकर दशकों से विवाद गहराया हुआ है। गौरतलब है कि न्यायाधीश जे एम पंचाल व महादयी नदी जल ट्रिब्यूनल ने तीनों राज्यों को सलाह दी है कि जल बंटवारे का हल परस्पर बातचीत व किसी तीसरे पक्ष के बिना हस्तक्षेप के सुलझाएं। यह मसला सुलझता है या नहीं यह तो बातचीत के नतीजे सामने आने के बाद पता चलेगा। बहरहाल अंतरराज्जीय जल विवादों का राजनीतिकरण इसी तरह होता रहा तो देश की जीवनदायी नदियों में कावेरी की तरह आग लगना तय है।