त्रिपुरा विजय का अन्य चुनावों पर प्रभाव
स्रोत: हिंदी विवेक          | दिंनाक:२६-मार्च-२०१८





भाजपा यदि कर्नाटक को कांग्रेस से छीनने में कामयाब हो जाती है तो दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी राज्यों- ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में भाजपा के हौसले बुलंद हो जाएंगे। भाजपा हिंदी भाषी राज्यों में अपने शिखर पर तो पहुंच ही गई है, पूर्वोत्तर में भी उसे भारी सफलता मिली है। अब दक्षिण में सेंध लगा कर देश को वाकई वाममुक्त करने की चुनौती उसके समक्ष है।


खिरकार, त्रिपुरा में माणिक की जगह हीरा ने अपनी जगह बना ली। देश के उत्तर-पूर्व कोने से ऐसा जनादेश आया जिसने बता दिया, मोदी लहर नॉनस्टॉप बढ़ रही है। हीरा (HIRA) अर्थात् H का अर्थ हाइवे, I का आईवे, R का रेलवे और A का अर्थ एयरवे। यह जुमला प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां चुनाव प्रचार के दौरान उछाला था और कहा था कि ‘किसी की हत्या हो जाए तो पहले लाल सलाम वालों को चढ़ावा देना पड़ता है पर अब किसी को डरने की जरूरत नहीं है। राज्य के लोगों को अब बस माणिक उतार कर हीरा पहनना होगा।’ 25 साल तक अगरतला के कोने-कोने में शान से लहराने वाले लाल झंडे को केसरिया रंग के सामने नतमस्तक होना पड़ा। बड़ा सवाल है कि क्या इन चुनावी नतीजों का असर स्थानीय स्तर पर सीमित रह जाएगा या 2019 के आम चुनाव से पहले कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम के विधान सभा चुनावों पर इसका असर होगा?

पूर्वोत्तर में तीन राज्यों के नतीजे कहते हैं, कांग्रेस का बुरा हाल है और लाल सलाम ठोकने वाली पार्टी पाताल पहुंच चुकी है। 5 साल पहले शून्य सीट पाने वाली पार्टी दो तिहाई बहुमत से जीती। भाजपा को 2013 में डेढ़ फीसदी वोट मिले थे, सिर्फ एक सीट पर ज़मानत बची थी। इस बार दो तिहाई से विजय मिली। ये जीत बताती है कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी भाजपा को हिंदी पट्टी से आगे लेकर गई है। देश के कोने-कोने तक भाजपा ने अपनी पहुंच बना ली है। एक जमाने में सिर्फ हिंदुओं की पार्टी का ठप्पा था, लेकिन पूर्वोत्तर की जीत ने ये साबित कर दिया है कि भाजपा अपनी इस पहचान से आगे निकल चुकी है। मेघालय और नगालैंड में ईसाइयों का साथ मिला और अब नजर मुस्लिम वोटरों पर है। मोदी इसकी भरपूर कोशिश भी कर रहे हैं और इसकी एक झलक दिल्ली में दिखी जब जीत के बाद बुलाई गई बैठक में मोदी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करना शुरू किया तो अजान की आवाज सुनाई दी और मोदी तुरंत चुप हो गए। साढ़े तीन मिनट तक उन्होंने मौन रखा। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनाव परिणामों ने भाजपा के आत्मविश्वास को यकीनन बढ़ाया है।

जो कांग्रेस वहां मुख्य विपक्षी पार्टी थी उसका मताधार केवल दो प्रतिशत तक सिमट जाने के कुछ तो राष्ट्रीय निहितार्थ हैं। वाम मोर्चा का 25 वर्ष का गढ़ ध्वस्त हुआ तो कांग्रेस त्रिपुरा और नगालैंड में बिल्कुल साफ हो गई। मेघालय में हालांकि वह सब से बड़ी पार्टी अवश्य बनी है, पर बहुमत से दूर रही, शेष दलों की सीटें उससे काफी ज्यादा थीं। इस कारण वहां भी एनडीए सरकार का रास्ता प्रशस्त हो गया।

भाजपा अगर इन चुनाव परिणामों से उत्साहित है तो इसे अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता है। इसके बाद भाजपा एवं एनडीए का विस्तार देश की 68 प्रतिशत आबादी तक हो गया है। यह किसी पार्टी के लिए सामान्य उपलब्धि नहीं है। राजस्थान एवं मध्यप्रदेश के कुछ उपचुनाव परिणामों से ऐसा लगने लगा था कि शायद देश के मनोविज्ञान में कुछ परिवर्तन आ रहा है लेकिन इन परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि अभी ऐसे परिवर्तन की कल्पना जल्दबाजी होगी। सामान्यत: पूर्वोत्तर में असम को छोड़ दें तो अन्य राज्यों के चुनावों की देश स्तर पर हमेशा अनदेखी होती थी। लेकिन इस बार अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी ने पूर्वोत्तर के चुनावों को एक नया स्वरूप दिया है और उसका असर दिख रहा है। पूरे देश की अभिरुचि उन चुनावों में बनी है और इससे जनादेश भी प्रभावित हो रहा है।

त्रिपुरा में माकपा नेतृत्व वाले वाम दलों के खिलाफ रुझान था जिसे भाजपा ने मुखर किया और परिणाम सामने है। वास्तव में माकपा यह स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है कि पिछले 25 सालों में उसने त्रिपुरा को दिया क्या है। माणिक सरकार की छवि एक आम मिलनसार तथा ईमानदार नेता की रही है, जो उन्होंने बिप्लब देव के शपथ ग्रहण में शामिल होकर सिद्ध भी की, जबकि पार्टी ने बहिष्कार किया था। लेकिन उन्होंने प्रशासन को क्या दिशा दी, विकास के संदर्भ में क्या किया यह सवाल जनता के सामने था। आखिर भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं की हत्याएं वहां किस सुशासन का परिचायक थीं? माकपा और उसके सहयोगी वाम दलों को विचार करना पड़ेगा कि पश्चिम बंगाल के बाद उनका दूसरा केन्द्र इस तरह क्यों ध्वस्त हुआ? पश्चिम बंगाल में हाल में जो उपचुनाव हुए हैं उनमें दूसरे नंबर की पार्टी भाजपा रही है। पश्चिम बंगाल में लगातार पराजय के बावजूद माकपा ने न अपने संगठन, विचारधारा और कार्यशैली को लेकर आत्ममंथन किया, न उसमें समय के अनुरूप कोई बदलाव किया।

राष्ट्रीय राजनीति पर भी भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत का असर साफ तौर पर दिखने लगा है। विपक्षी खेमे में, विशेषकर क्षेत्रीय दलों में तीसरे मोर्चे के विकल्प को लेकर सुगबुगाहट तेज़ हो गई है। साथ ही, भाजपा बनाम तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी आदि के बीच ज़ुबानी जंग भी। तृणमूल संसदीय दल के नेता डेरेक ओ ब्रायन ने एक टीवी चैनल से कहा, भाजपा का टार्गेट बंगाल है और हमारा लाल किला। 2019 में मोदी जी लाल किला पर झंडा नहीं फहराएंगे। कोई और फहराएगा। त्रिपुरा का ख़तरा बंगाल पर मंडराता देख टीएमसी ने बचाव के लिए हमला बोल दिया। साथ में दूसरे दलों को जोड़ने की कोशिश भी। भाजपा ने साफ कर दिया है कि त्रिपुरा के बाद अब उसके निशाने पर बंगाल और ओडिशा हैं। हालांकि कांग्रेस कह रही है कि फिलहाल तीसरे मोर्चे की संभावना नहीं है। त्रिपुरा के नतीजों का असर पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ पूरे विपक्षी खेमे पर साफ दिख रहा है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री की ममता बनर्जी के साथ बातचीत को इसी घटनाक्रम के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है।

त्रिपुरा में जीत के बाद जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दिल्ली में पार्टी हेडक्वार्टर पहुंचे तो सब से पहले उन्होंने जो बात कही, उसमें आने वाले कर्नाटक चुनावों का जिक्र था। भाजपा की संसदीय दल की बैठक में प्रधान मंत्री मोदी के पहुंचते ही सांसदों ने ‘जीत हमारी जारी है, अब कर्नाटक की बारी है’ का नारा लगाया। भाजपा के लिए कर्नाटक चुनाव में जीतने का मतलब कांग्रेस मुक्त दक्षिण भारत की पहली सीढ़ी पर कदम रखने जैसा है। कांग्रेस से पहले वहां पर भाजपा की सरकार थी। भाजपा का जमीनी स्तर पर खासा नेटवर्क है। लेकिन भाजपा के लिए भी ये आसान लड़ाई नहीं है। इसकी एक वजह यहां के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया हैं।

सिद्धरमैया ने राष्ट्रीय नीतियों से लेकर हिन्दुत्व पर प्रधान मंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी पर हमला जारी रखा। कर्नाटक की आन बान शान को बनाए रखने के लिए उन्होंने राज्य के झंडे की मांग को बाकायदा आगे बढ़ाया। हिन्दी का विरोध और कावेरी जल विवाद में खुल कर कर्नाटक के पक्ष में कानूनी और सरकारी लड़ाई जारी रखी। ‘कन्नड़ स्वाभिमान’ का नारा देने वाले सिद्धरमैया अपने राज्य में काफी लोकप्रिय भी हैं। अपनी शर्तों पर काम करने वाले मुख्यमंत्री को कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने प्रचार की डोर पकड़ा दी है। जबकि गुजरात में चुनाव प्रचार के सारे फैसले राहुल गांधी लेते थे। लेकिन कर्नाटक में सिद्धरमैया स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा को घेरने में लगे हैं। कांग्रेस का मानना है कि सिद्धारमैया के जरिए वो भाजपा के विजय रथ पर रोक लगा पाएंगे। लेकिन कर्नाटक की चुनावी रणभूमि में त्रिपुरा की तरह नाथ संप्रदाय कुछ स्थानों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। योगी वहां भी भाजपा के लिए ट्रंप कार्ड साबित होने वाले हैं। त्रिपुरा में योगी ने जिन 20 विधान सभा क्षेत्रों में प्रचार किया था उनमें से 17 सीटें भाजपा के खाते में गईं। हालांकि कांग्रेस इस बार काफी उत्साहित तो है, लेकिन डरी भी है। उसका एक कारण कर्नाटक में सत्ता बदलने की परंपरा है। गौरतलब बात है कि 1994 के बाद से कर्नाटक में कोई भी सरकार दूसरी बार सत्ता में नहीं आई है। साथ ही जमीनी स्तर पर कांग्रेस बहुत मजबूत नहीं है। भाजपा के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मजबूत और अनुशासित नेटवर्क है जिसे भाजपा बाकायदा भुनाने में लगी है। भाजपा का मानना है कि प्रधान मंत्री मोदी वोट खींचने वाले नेता हैं और उनके नाम पर लोग भाजपा को वोट देंगे। कर्नाटक चुनाव में तीसरा पहलू भी है और वह है पूर्व प्रधान मंत्री एड डी देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल (सेक्यूलर) जिसने मायावती और शरद पवार से गठजोड़ की है। ये गठजोड़ भाजपा और कांग्रेस दोनों के वोट बैंक पर सेंध मारने की तैयारी में है।

दरअसल देश के पूर्वोत्तर, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व हिस्से में कुल मिला कर 216 लोकसभा सीटें हैं। पिछली बार भाजपा को इनमें से महज 32 सीटें मिली थीं। पूर्वोत्तर की 25 सीटों को छोड़ कर दक्षिण और पूर्व में 191 सीटें हैं। इनमें से पिछली बार भाजपा को केवल 24 सीटें मिली थीं, जिनमें अकेले कर्नाटक से पार्टी को 17 सीटें मिलीं। अबकी बार भाजपा किसी भी कीमत पर यहां ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए प्रयास कर रही है। यदि कर्नाटक को कांग्रेस से छीनने में पार्टी कामयाब हो जाती है तो दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी राज्यों ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना जैसे राज्यों में भाजपा के हौसले बुलंद हो जाएंगे। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि भाजपा हिंदी पट्टी राज्यों में अपने शिखर पर पहुंच गई है। ऐसे में यदि 2019 में इन क्षेत्रों में पार्टी के प्रदर्शन में कुछ गिरावट आती भी है तो वह इन क्षेत्रों में अपने प्रदर्शन को बेहतर कर उसकी भरपाई करना चाहेगी। पूर्वोत्तर में अब मिजोरम को छोड़ कर सभी राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं। इस क्षेत्र में 25 सीटें हैं। भाजपा के नेतृत्व में पिछली बार इनमें से 11 सीटें एनडीए को मिली थीं। 2019 में पार्टी ने यहां कम से कम 20 सीटें जीतने का लक्ष्यम रखा है। मिजोरम में भी इस साल के अंत में चुनाव है। भाजपा ने इस राज्य को भी कांग्रेस से छीनने का संकल्प लिया है।

भाजपा के लिए 2018 में कर्नाटक चुनाव से इतर छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनौती बेहद कठिन है। लोकसभा की 93 सीटें इन्हीं चार राज्यों से आती हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 93 सीटों में से 79 सीटों पर भाजपा ने विजय पताका फहराई थी। अब देखना होगा कि 2018 विधान सभा में इन तीनों राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है? हालांकि, लोकसभा चुनाव और विधान सभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न में सामान्यतया अंतर होता है। दोनों चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं। और अब तो प्रधान मंत्री मोदी और अमित शाह की जोड़ी को अगले चुनावों के लिए नई ऊर्जा भी मिल चुकी है। साथ ही कांग्रेस के लिए ये साफ संकेत है कि अगर इस साल के विधान सभा चुनावों और अगले साल के आम चुनाव में उसे भाजपा को कड़ी टक्कर देनी है, तो कार्यकर्ताओं के बीच मध्य प्रदेश-राजस्थान के उपचुनावों और राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से पैदा हुआ जोश और उम्मीद बरकरार रहे, इस पर मेहनत करनी होगी।

ले-देकर भाजपा अगर कह रही है कि देश कांग्रेस के साथ वाममुक्त भी हो रहा है तो इस समय उसे एकदम निराधार नहीं कहा जा सकता है। चूंकि वाम दल केवल केरल तक सिमट गए हैं और देश की दूसरी प्रमुख पार्टी कांग्रेस भी अब चार राज्यों तक सिमट कर रह गई है।