पर्यावरण, प्रदूषण और बच्चों की स्थिति
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:२९-जनवरी-२०१८




बाल मित्रो!

पर्यावरण शब्दपरि+आवरणके योग से बना है जिसका अर्थ है- हमारे चारों ओर का आवरण अर्थात हमारा परिवेश| हमारे परिवेश में मानव समुदाय के अतिरिक्त पशु-पक्षी, वनस्पति तथा नदी, झील, पर्वत, मैदान अर्थात भौगोलिक जड़-चेतन सभी शामिल हैं| इन सब को संयुक्त रूप से प्रकृति कहा जा सकता है| प्रकृति मानव के लिए सदैव से ही विशिष्ट रही है| इसे बच्चों की भाषा में प्रकृति मां कहा जाता है| बच्चे कई बार धरती माता, भारत मां तथा धरा मां जैसे शब्दों से भी इसे संबोधित करते हैं| बाल कविताओं-कहानियों आदि में इन सभी मां स्वरूपों को देखा जाता है| सबसे विशिष्ट बात तो यह है कि इन सभी स्वरूपों को केन्द्र में रख कर रची गई कविताएं एवं कहानियां बच्चों को प्रकृति तथा परिवेश या पर्यावरण से जोडती हैं| यही कारण है कि बचपन से ही बच्चे तितली, भौंरे, फूल, खरगोश एवं तोता, कबूतर आदि से जुड़ जाते हैं| वे वृक्षारोपण भी करते हैं तथा फूल-पौधे आदि से जुड़ाव के तौर पर उन्हें पानी भी देते हैं|

पर्यावरण के विपरीत एक और विशिष्ट शब्द है- ‘प्रदूषण’| प्रदूषण अर्थात पर्यावरण अथवा परिवेश को दूषित किया जाना| दूसरे शब्दों में, पर्यावरण में किसी भी प्रकार दोष उत्पन्न होने से प्रदूषण होता है|

सामान्यत: प्रदूषण को जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण तथा मृदा प्रदूषण के रूप में देखा जाता है| अर्थात जल, वायु अथवा मृदा (मिट्टी) का दूषित होना ही प्रमुखतः प्रदूषण कहलाता है| परंतु प्रदूषण के मात्र तीन रूप ही नहीं हैं| इसके अन्य रूप भी हैं, जैसे रेडियोधर्मी प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, खाद्य प्रदूषण इत्यादि|

प्रदूषण के सभी रूप पर्यावरण या प्रकृति के परम शत्रु हैं| जब कारखाने की चिमनियों से निकलता धुआं हवा को दूषित करता है तो वायु प्रदूषण होता है| जब कारखानों से निकलने वाले रसायन, पशुओं के नहलाने से मुर्दों को बहाने के साथ ही सीवर आदि के गंदे पानी को नदियों, नहरों, झीलों में डाला जाता है तो जल प्रदूषण होता है|

मृदा प्रदूषण का अर्थ है मिट्टी का धूल में परिणीत हो जाना तथा उसकी उपजाऊ क्षमता का समाप्त हो जाना| आजकल यह प्रदूषण भी पूर्ण रूपेण देखा जा रहा है| भारत के छोटे शहर एवं गांव तो पूरी तरह मृदा प्रदूषण के शिकार दिखाई देते हैं|

परंतु मित्रो! आज विश् में सर्वाधिक विकराल रूप ले रहा है ध्वनि प्रदूषण| कारण हैं- तेज आवाज में चिल्ला कर बोलना, तेज हॉर्न बजाना, ऊंची आवाज में गाने सुनना, लाउड स्पीकर पर प्रचार एवं तेज ध्वनि के पटाखे, ढोल-नगाड़े आदि का बजाया जाना| इस तरह देखें तो पूरे विश् में सर्वाधिक प्रदूषण ध्वनि प्रदूषण के रूप में ही होता है|

बारूद के प्रयोग से रेडियोधर्मी प्रदूषण भी होता है| बारुद के प्रयोग से तीव्र ध्वनि होने पर जहां ध्वनि प्रदूषण होता है वहीं हानिकारक रेडियोधर्मी तत्वों के पूरे वातावरण में बिखर जाने पर रेडियोधर्मी प्रदूषण भी होता है|

ये सभी प्रकार के प्रदूषण प्रकृति एवं मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करते हैं| इन सभी से भयंकर एवं मृत्युकारक बीमारियां होती हैं|

खाद्य प्रदूषण भी विश् के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है| आज खाने-पीने की हर वस्तु प्रदूषित है| रासायनिक प्रभाव प्रत्येक वस्तु पर दिखाई देता है| पेड़ पर लगने वाले फल और सब्जी भी प्रदूषित हैं क्योंकि खाद भी रासायनिक है| वायु में भी जहर है| जल भी प्रदूषित है तथा हथियारों की होड़ तथा आतिशबाजी में किए जा रहे बारूद के कण भी पूरे वातावरण में व्याप्त हैं|

इस प्रकार आज का विश् पर्यावरण में प्रदूषण के जहर का शिकार है|

इस प्रदूषण के लिए अनचाहे ही सही प्रत्यक्ष रूप में बच्चे भी जिम्मेदार हैं क्योंकि बच्चे खुशियां मनाने के लिए आतिशबाजी के प्रयोग से सहमत हो जाते हैं| शोरगुल के लिए भी तैयार रहते हैं| यद्यपि यह वास्तविक दोष बच्चों का नहीं है, उन्हें जैसा सिखाया जाता है अथवा जैसा व्यवहार वे देखते हैं; उसे ही सीखते हैं तथा स्वीकार करते हैं, परंतु जब वास्तविकता से परिचित हो जाते हैं तब भी परिस्थिति को बदलने की कोशिश नहीं करते|

दोस्तो! यदि भारत के बच्चे चाहें तो भारत प्रदूषण मुक्त देश बन सकता है| इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाने होंगे-

* सभी बच्चे अपना घर तथा घर के बाहर स्वच्छता रखें| उन्हें बड़ी विनम्रता के टोकते हुए स्वच्छता का महत्व समझाएं|

* तेज आवाज में बोलना, तेज लाउड स्पीकर बजाना, विस्फोटकों का प्रयोग आदि करें तथा बड़ों को भी ऐसा करने दें|

* आतिशबाजी का प्रयोग कदापि करें, ही दूसरों को करने दें|

* नदी, नहर, तालाब, झील आदि को स्वच्छ रखने हेतु बड़ों को समझाएं क्योंकि जब बड़े समझना बंद कर दें तथा प्रत्येक संवेदनशील बात अथवा विचार पर चिंतन करें तब बच्चों के द्वारा ही इसकी पहल की जाती है|

* हर बच्चा महीने में एक बार एक फूल वाला छोटा पौधा अथवा तुलसी का पौधा अवश्य लगाए तथा अपने मित्रों रिश्तेदारों को किसी भी शुभ अवसर पर केवल पौधा ही उपहार में दें|

* वर्ष में एक बार किसी वृक्ष का पौधा अवश्य लगाएं| मुझे विश्वास है कि बड़े और समझदार कहे जाने वाले लोगों ने जहां हमारे परिवेश को नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी वहीं छोटे बच्चे किशोर-किशोरियां अपने प्रयासों से अपनी प्रकृति मां का श्रृंगार बनाए रखेंगे और इस पृथ्वी पर स्वर्ग की कल्पना को साकार करेंगे|

मोबा. ९२५९१४६६६९