दोष निवारण में है वास्तु विज्ञान की विश्वसनीयता
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:१५-जनवरी-२०१८

 
 

दोष निवारण में है वास्तु विज्ञान की विश्वसनीयता

इंट्रो : सच तो यह है कि सुधार की पूर्ण गारंटी आवश्यक परिवर्तन करने पर ही ली जा सकती है. हर व्यक्ति की यही अपेक्षा होती है कि उसके घर अथवा व्यवसाय के वास्तुदोष बिना तोड़फोड़ के ही दूर कर दिये जाएं. जब दोष गंभीर हो तो कई बार वास्तुविशेषज्ञ भी किसी बड़े परिवर्तन की सलाह देने की हिम्मत नहीं कर पाते अथवा साहसपूर्वक कह दिया जाए तो ग्राहक ही कह बैठता है कि इतना बड़ा परिवर्तन तो बहुत खर्च करने से ही संभव होगा.

-मेल के माध्यम से रवीन्द्र मंगल ने जानना चाहा है कि दक्षिण-पूर्व के पूर्वी भाग में स्थित उनके घर के मुख्य द्वार को बिना बदले इस वास्तु दोष का क्या समाधान हो सकता है? उनके -मेल से यह स्पष्ट नहीं है कि उपरोक्त द्वारा मुख्य भवन का है अथवा कम्पाउण्ड वाल का. अतः मैने इनसे नक्शे सहित विस्तार से लिखने को कहा है ताकि यथासंभव उचित मार्गदर्शन दिया जा सके.

वैसे रवीन्द्रजी, इसी कालम में मुख्य प्रकरण के अन्तर्गत यथासमय दिशा विशेष की ओर अभिमुख द्वारों के गुणावगुण के बारें में विस्तार से उल्लेख करेंगे परंतु आज बात करते है आपके ही प्रश्न के दूसरे भाग की जिसमें बिना परिवर्तन (तोड़फोड़) के वास्तुदोष हटाने की अपेक्षा की गई है. ऐसा नहीं है कि बिना तोड़फोड़ के वास्तुदोष दूर किए ही नहीं जा सकते परंतु ये भी सच है कि बिना तोड़फोड़ के वास्तु दोष एक सीमा तक ही दूर किए जा सकते हैं तथा यह भी कुछ ही मामलों में, जिनका विस्तृत उल्लेख हम समय आने पर करेंगे. सच तो यह है कि सुधार की पूर्ण गारंटी आवश्यक परिवर्तन करने पर ही ली जा सकती है. हर व्यक्ति की यही अपेक्षा होती है कि उसके घर अथवा व्यवसाय के वास्तुदोष बिना तोड़फोड़ के ही दूर कर दिये जाएं. जब दोष गंभीर हो तो कई बार वास्तुविशेषज्ञ भी किसी बड़े परिवर्तन की सलाह देने की हिम्मत नहीं कर पाते अथवा साहसपूर्वक कह दिया जाए तो ग्राहक ही कह बैठता है कि इतना बड़ा परिवर्तन तो बहुत खर्च करने से ही संभव होगा. बरसों बिना वास्तु नियमों का पालन किए जीवन गुजार दिया तो अब भी गुजार लेंगे. ऐसे में ग्राहक को खाने की इच्छा रखने वाला वास्तु सलाहकार कई बार झंडे-डंडे-तिलक-छापे जाने कितने ही अजीबोगरीब उपाय (जिनका कहीं उल्लेख तक नहीं मिलता) बताकर अपनी फीस पक्की कर लेता है. कुछ समय पश्चात् जब ग्राहक वास्तु विशेषज्ञ को सूचित करता है कि उसे राहत मिलने के बजाय अभी भी हानि हो रही है तो नौसिखिए या व्यावसायिक मानसिकता के कथित वास्तु सलाहकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेते है कि किए गए उपायों के कारण हानि कम ही हुई है अन्यथा और अधिक हो जाती.

एक प्रोफेशनल कंसल्टेंट के नाते फीस लेना किसी की विवशता हो सकती है किन्तु यह भी याद रखना चाहिए कि हम जिसे परामर्श दे रहे है उसकी जिंदगी तो प्रयोग करते-करते ही बीत जाएगी तथा साहस करे हम उसे सही सलाह नहीं देंगे तो उसका तो वास्तु विज्ञान से भरोसा उठेगा तथा हम उसका जीवन नरक बनाए रखने में सहायक होकर पाप के भागीदार बनेंगे.

श्री गंगानगर के मेरे एक क्लांइट की फैक्ट्री जब मैं पहली बार गया तो मैंने पाया कि मुख्य हाल के केन्द्र में लगी टाईल्स सही तरीक से मैच नहीं कर रही. पूछने पर ज्ञात हुआ कि श्रमिकों से संबधित समस्या के निवारणार्थ बुलाए गए वास्तु सलाहकार ने वहां जमीन में कुछ कीमती धातुएं दबवा दी है. मुझे दबाई गई धातुओं की मात्रा के बारे में जानकर आश्चर्य हुआ.

मेरे यह पूछने पर कि इस उपाय के पश्चात क्या परिणाम आया तो फैक्ट्री मालिक ने रूआंसे होकर कहा कि श्रमिक समस्या तो अब भी जस की तस है परंतु दबाई गई धातुओं को कोई निकाल कर ले जाए, इस उद्देश्य से हमने अलग से एक चैकीदार रख दिया है. देखा जाए तो कई मामलों में बिना परिवर्तन के किया गया सुधार पूर्ण परिणाम नहीं देता. उदाहरण के लिए रवीन्द्र मंगल जिस पूर्वी आग्नेयाभिमुखी द्वार की बात कर रहे हैं अगर वह द्वार कम्पाउण्ड वाल का है तो इस बात की संभावना है कि उत्तर की तुलना में दक्षिण में अधिक खुला स्थान हो. ऐसा होने पर उस मकान में महिलाओं के पूर्ण स्वस्थ एवं प्रसन्न रहने की संभावनाओं पर चिन्ह तो द्वार का उपाय करने के बाद भी लगा ही रहेगा.

भौगोलिक उत्तर की बजाय चुम्बकीय उत्तरहै महत्वपूर्ण

वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों की वैज्ञानिको द्वारा पुष्टि करने तथा इस विज्ञान केरिजल्ट-ओरिन्टेडहोने के कारण मान्यता का व्याप भी बढ़ गया है. जैसे-जैसे इस विज्ञान तक आम आदमी की पहुंच हो रही है, वैसे-वैसे स्वप्रयोगधर्मिता प्रचलित अवधारणाओं इत्यादि के कारण कई तरह की भ्रान्तियां भी पनपने लगी है. दिशाएं वास्तु विज्ञान का प्रमुख आधार है जबकि कुछ लोग, भवन में आगे या पीछे कौन-कौन से निर्माण कार्य करने चाहिए, जैसी अवधारणाएं बना लेते है. इतना ही नहीं, जो लोग यह जानते है कि दिशाओं का वास्तुशास्त्र में अत्यधिक महत्व है, वे भी सूर्य की स्थिति के आधार पर दिशाओं का निर्धारण करके भवन का वास्तु विवेचन करने लगते हैं. वास्तव में सभी वास्तु सिद्धान्तों का पालनचुम्बकीय उत्तर’ (मैग्नेटिक नार्थ) की स्थिति को ध्यान में रखते हुए करना होता है किभौगोलिक उत्तर’ (ज्योग्राफिक नार्थ) के अनुसार. क्योकिं सूर्य तो उत्तरायण एवं दक्षिणायन में अपनी स्थिति बदलते हुए प्रतीत होता है जबकि चुम्बकीय उत्तर स्थिर रहता है. बरसो से एक अवधारणा यह भी प्रचलित है कि भवन मे बायें पक्ष को भारी करने से वास्तुविज्ञान के नियमों का स्वमेव पालन हो जाता है. इस अवधारणा को समझने के लिए इसकी उत्पति के कारण की तह में जाना होगा.

मध्यकाल में विदेशी आक्रमणकारियों ने कई ऐतिहासिक भवनों के साथ पुस्तकालयों को भी नष्ट कर दिया एवं अमूल्य पांडूलिपियां ग्रंथ बड़ी मात्रा में नष्ट हो गए. इतना ही नहीं ऐतिहासिक इमारतों को बनाने वाले कुशल कारीगरों एवं विद्वान वास्तुकारों को भी मार देने जैसी घटनाएं होने लगी ताकि उनके द्वारा बनाया गया भवन सदैव अद्वितीय बना रहे. विद्वानों और ग्रंथो पर संकट के उस दौर में जब भावी पीढ़ी तक ज्ञान हस्तांतरित करना दुष्कर कार्य होने लगा तो विद्वानों ने भावी पीढ़ी के हित में बीजमंत्र की तरह कुछ संक्षिप्त फार्मूले लोगों को समझाना शुरू कर दिए. उन दिनों आज की तुलना में जनसंख्या बहुत ही कम तथा भूमि अत्यधिक थी. वास्तु के अनुसार वैसे तो कोई भी दिशा श्रेष्ठ मानी गई है. उस काल के विद्वानों को यह कल्पना शायद नहीं थी कि समय के साथ जनसंख्या इतनी अधिक बढ जाएगी कि सभी दिशाओं के अभिमुख भवन बनाने पडेगें. चूकिं पूर्व एवं दक्षिण दिशा के अभिमुख भवनों में बायां पक्ष भारी करने से वास्तव में भवन काफी हद तक वास्तुनुकूल हो जाते थे. अतःबायां पक्षभारी रखने की अवधारणा चल पडी. समय के साथ स्थितियां बदल गई परंतु भवन का मुंह चाहे किसी ओर हो, हमारे चलवों ने बायें पक्ष को भारी रखते हुए निर्माण करवाने जारी रखे जिससे केवल उत्तर एवं पश्चिमाभिन्मुखी भवनों में निवास व्यवसाय करने वाले लोगों का जीवन कष्टकारी हो गया. वरन् पूर्व और दक्षिण के भवन भी उतने वास्तुनुकूल नहीं बन पा रहे हैं . आज मुख्य भवन के भीतर शौचालय, जमीन के अदंर पानी की कुंडी इत्यादि बनाई जाती है जबकि उन दिनों ऐसा प्रचलन नहीं था.

कुछ लोग यह सोचकर प्रभावित हो जाते हैं कि भवन किराये का होने अथवा किसी अन्य के नाम से होने के कारण उन पर भी वास्तु लागू होता ही नहीं. यह एक बड़ी भ्रांति है. विज्ञान के नियम सभी लोगों स्थानों पर शाश्वत रूप से लागू होते हैं. अगर किसी वाहन के ब्रेक नहीं लगते तो चाहे उसे उसका मालिक चलाए या कोई अन्य सभी को समान रूप से प्रभावित होना पड़ता है. उसी प्रकार किसी भवन का मालिक चाहे कोई हो परंतु प्रभावित वहीं होगा जो उसका उपभोग कर रहा है.

कई बार किसी एक व्यक्ति द्वारा कही गई बात की पुनरावृत्ति होते-होते वह एक धारणा बन जाती है. उदाहरणार्थ कुछ लोगों को लगता है कि छोटे प्लाट पर वास्तु लागू नहीं होता तो कुछ अन्य को लगता है कि दक्षिण दिशा तो अशुभ ही है. सच तो यह है कि वास्तु सभी आकार के प्लाटस पर लागू होता है तथा दक्षिण दिशा भी अशुभ नहीं है. अपने आसपास गौर से देखेगें तो आप पाएंगे कि दक्षिणाभिमुख भवनों में निवास या व्यवसाय करने वाले कई लोग पूर्ण सम्पन्न और संतुष्ट है. किसी भी प्लाट को तभी त्यागना चाहिए जब वह केवल 202. 5 डिग्री से लेकर 247. 5 के भाग को ही देखता हो. अलावा उसके सावधानी से बुरे भूखंड से अच्छे परिणाम तथा असावधानी के कारण अच्छे भूखंड से बुरे परिणाम लिए जा सकते हैं.