एकीकरण की युवा भावना
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:२९-दिसंबर-२०१७

किसी भी देश का सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य वहां का युवा तय करता है. समाज के अनुभवी व्यक्तियों से मार्गदर्शन पाकर अपने सतत जोश की वजह से युवा सदैव समाज को एक नई दिशा देने का प्रयत्न रहता है. युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद ने एक जगह कहा था, ‘एक विचार लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो, उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार को जियो. अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो और बाकी सब विचारों को किनारे रख दो.’ अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में भी यदि जम्मू में राष्ट्रवाद की अलख जगती रही है तो यह स्वामी विवेकानंद के औपनिषदिक विचार का जम्मू के युवाओं पर असर ही कहा जाएगा.
 
यह नहीं है राज्य का युवा
 
आज हमें बहुत से सूत्रों से जम्मू को जानने और पढ़ने का अवसर मिलता है. दुर्भाग्यवश इन सूत्रों से हमें राज्य और उसके युवा की एक ऐसी तस्वीर या कहानी दिखाई जाती है जो हृदय को कष्ट पहुंचाती है. जम्मू का युवा जब भी समाचार पत्रों या चैनलों के माध्यम से हमें हमारे घरों में परोसा जाता है, तो कुछ न कुछ राष्ट्रविरोधी गतिविधि करता हुआ या उसका समर्थन करता हुआ दिखाया जाता है. इससे देश के अधिकतम जन मानस के मन में राज्य के युवाओं की छवि बड़ी नकारात्मक बन गई है, जो कि सच्चाई और तथ्यों से बिलकुल परे है.
 
सारी भ्रांति की जड़ कश्मीर घाटी को पूरे जम्मू राज्य के रूप में परोसने की है. प्रायः जम्मू राज्य के नाम से जो चित्र हमारे सामने पेश किए जाते हैं, वह केवल कश्मीर घाटी के कुछ जिलों के होते हैं. कश्मीर का क्षेत्रफल राज्य के कुल क्षेत्रफल का मात्र ७.१३ प्रतिशत है.
 
कश्मीर घाटी में भी तीन जिलों को छोड़ पूरी घाटी में कोई भारत विरोधी स्वर सुनाई नहीं देता. इन तीन जिलों में भी जहां सुनाई देते हैं, वहां भी बहुत कम संख्या में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित अलगाववादियों के कुछ वेतन पाने वाले शागिर्द ही होते हैं. राज्य के कुल क्षेत्रफल के पांच से छः प्रतिशत क्षेत्र में और राज्य की कुल जनसंख्या के दो से तीन प्रतिशत जनसंख्या को पूरे जम्मू के रूप में हमें दिखाने का प्रयास किया गया है. इन क्षेत्रों और घाटी में बैठे कुछ अलगाववादियों के अलावा पूरे राज्य में कहीं भारत विरोधि स्वर सुनने को नहीं मिलते. जम्मू का युवा भी उतना ही देशभक्त है जितना भारत के अन्य किसी राज्य का, अपितु उनसे ज्यादा ही होगा. जम्मू का युवा बहुत लम्बे समय से भारत की एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए जो सतत प्रयास और बलिदान कर रहा है वह शायद ही किसी भी अन्य क्षेत्र का युवा कर रहा होगा.
 
राज्य के वीर युवाओं का इतिहास...
 
इसे कोई संयोग कहें या क्षेत्र की विशेषता कि पुरातन समय से इस वीर भूमि का युवा भारत की एकता और अखण्डता के लिए सतत लड़ता आ रहा है. पूर्व मध्यकाल में इसी भूमि के एक युवा सम्राट ने भारत को आक्रांताओं एवं विदेशी आक्रमणों से बचाकर पुनः अपनी नैसर्गिक सीमाओं तक पहुंचाने का कार्य अपना सर्वस्व न्योछावर करके किया है. यह युवा राजा सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड के नाम से विख्यात हुआ. सांस्कृतिक भारत की सीमाओं के प्रति पूरी तरह सजग सम्राट ललितादित्य ने अपने काल में भारत के प्रवेश द्वार अफगानिस्तान तक अपना साम्राज्य स्थापित कर विदेशी आक्रांताओं को खदेड़ दिया था. सम्राट ललितादित्य के सफल अभियान के बाद यह भूमि देश में ज्ञान और शक्ति दोनों की उपासना का सर्वोच्च केन्द्र रही. पूरे देश से विद्यार्थी, शोधार्थी और विद्वान भारत में ज्ञान की सर्वोच्च पीठ कहे जाने वाले शारदा पीठ में ज्ञान अर्जन के लिए आते थे.
 
उसके बाद उत्तर भारत से मुगल साम्राज्य को जड़ों से उखाड़ने वाले वीर बंदा बैरागी भी इसी भूमि की संतान थे. जम्मू के इस युवा वीर बंदा बैरागी ने भारतीय दश गुरु परंपरा के दशम गुरु गोबिन्द सिंह की आज्ञा मानकर खालसा सेना के सेनापति का दायित्व संभाला और देखते ही देखते पंजाब और उत्तर भारत से अति शक्तिशाली मुगल साम्राज्य को उखाड़ फेंक पहले खालसा राज की स्थापना की. उसके बाद महाराजा रणजीत सिंह ने इस भूमि से अफगानिस्तान तक हमला कर आक्रांताओं की गतिविधियों को शांत किया. ऐसे अनेक वीर युवा सपूतों ने आक्रांताओं से सीमाओं को सुरक्षित रख भारत की अखण्डता को बनाए रखा.
 
विभाजन के उपरांत युवाओं की भूमिका
 
१९४७ में विभाजन ब्रिटिश भारत का हुआ लेकिन इसका दंश देशी प्रांतों को भी झेलना पड़ा, जम्मू जिसमें सबसे ऊपर था. इतना खून या नरसंहार विभाजित हिस्सों या राज्यों में नहीं हुआ होगा जितना जम्मू राज्य में हुआ. महाराजा के भारत में अधिमिलन की इच्छा भांपते हुए पाकिस्तान ने जम्मू पर जबरन कब्जा करने का प्रयास किया और पाकिस्तान की सेना ने कबाइलियों के रूप में २२ अक्तूबर १९४७ को जम्मू पर हमला कर दिया.
 
जब तक भारतीय सेना पाकिस्तानी सेना को हटाने के लिए वहां तक पहुंच पाती, तब तक राज्य के युवा ही पाकिस्तानी सेना से लोहा लेने के लिए आगे आए. पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए जम्मू के हजारों साधारण युवाओं ने अपना बलिदान दिया. भारत पर हुए इस हमले में बलिदान देने वाले युवा राज्य के किसी एक क्षेत्र नहीं अपितु जम्मू, लद्दाख एवं कश्मीर तीनों संभागों से थे. पाकिस्तान के हमले का संदेश मिलते ही महाराजा हरि सिंह ने जम्मू राज्य की सेना के सेनाध्यक्ष ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह को मुजफ्फराबाद जाकर पाकिस्तानी घुसपैठियों को राकने की आज्ञा दी. ‘अमर डोगरा’ कहे जाने वाले ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह महाराजा की आज्ञा पाते ही केवल ११० सैनिकों के साथ मुजफ्फराबाद की ओर रवाना हुए.
 
इतिहास में पहली बार किसी सेना का सेना अध्यक्ष युद्ध में सैनिकों का नेतृत्व कर रहा था. ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह और राज्य के अन्य ११० सैनिकों ने उड़ी में पाकिस्तानी घुसपैठियों को चुनौती दी. पाकिस्तानी घुसपैठियों की संख्या ६००० के करीब थी. ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह अपने वीर सैनिकों के साथ गुरिल्ला युद्ध प्रणाली से उन पर हमला करते रहे. दुश्मन के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने उड़ी का पुल ही उड़ा दिया ताकि दुश्मन सेना इस पार न आ सके. अंत में २६ अक्तूबर १९४७ को महाराजा हरि सिंह ने विलयपत्र पर हस्ताक्षर कर राज्य का संवैधानिक अधिमिलन भारत में किया और उड़ी में दुश्मन सेना से लड़ते ‘कश्मीर के रक्षक’ ब्रिगेडियर राजेन्द्र सिंह ने अपना बलिदान दे दिया. अपने अथक साहस और देशभक्ति के लिए वह आजाद भारत के पहले महावीर चक्र सम्मान के हकदार हुए, जो उन्हें मरणोपरांत मिला.
 
जम्मू और लद्दाख के युवाओं की भूमिका
 
जहां कश्मीर में राज्य की सेना और युवा निरंतर दुश्मन से लड़ते हुए अपना बलिदान दे रहे थे, वहीं जम्मू और लद्दाख संभाग में भी युवाओं ने कमर कस ली थी. २४ अक्तूबर १९४७ को जम्मू संभाग के भीतर पाकिस्तान ने बख्तरबंद वाहनों से नरसंहार शुरू कर दिया, तब भी दुश्मन की गोलियों का सामना करते हुए हजारों नौजवानों ने भारत की सीमाओं की रक्षा करने की खातिर पाकिस्तान सेना को रोकने की पूरी कोशिश कर अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय सेना के वहां पहुंचने से पहले ही नेहरू संघर्ष विराम कर चुके थे. इन देशभक्त युवाओं की वजह से ही पाकिस्तानी घुसपैठिये आगे नहीं बढ़ सके.
 
जम्मू और कश्मीर संभाग से दुश्मन को खदेड़ने में लगी भारतीय सेना को लद्दाख पहुंचने में कुछ समय लग गया. सेना और रसद की प्रतीक्षा में ब्रिगेडियर शेर जंग थापा ने छः महीने तक लद्दाख के स्कर्दू पर पाकिस्तान को कब्जा नहीं करने दिया. भारतीय सेना के वहां पहुंचने तक लद्दाख के युवाओं ने वीरता और देशभक्ति का एक बिरला उदाहरण पेश किया. आधुनिक लद्दाख के निर्माता कहे जाने वाले उन्नीसवें कुशोग बकुला लोबजंग थुबतन छोगनोर इस समय आगे आए. पाकिस्तानी घुसपैठियों से देश की रक्षा करने के लिए उन्होंने स्थान-स्थान पर जाकर युवाओं का संगठन खड़ा किया और उनसे आह्वान किया कि वह मठों से बाहर निकल कर देश की रक्षा के लिए कमर कसें. इस संगठन का नाम उन्होंने नुबरा गार्ड रखा, जो बाद में भारतीय सेना के लिए अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ. देश की रक्षा के लिए कुशोग बकुला द्वारा बनाई गई नुबरा गार्ड ने पाकिसतानी घुसपैठियों को लद्दाख में कब्जा नहीं करने दिया.
 
छात्रों का आंदोलन
 
राज्य के भारत में विधिवत अधिमिलन के बाद नेहरू की अत्यधिक शह की वजह से राज्य के प्रथम प्रधान मंत्री शेख अब्दुल्लाह की नियत समय के साथ गड़बड़ा गई. राज्य में वह एकसत्तावाद चाहते थे. राज्य को भारत से भिन्न दिखाने का प्रयास वह करने लगे. शेख अब्दुल्लाह ने राज्य के लिए अलग झंडे की मांग शुरू कर दी. वह अपनी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के झंड़े को वह राज्य का झंड़ा बनाना चाहते थे. उन्होंने सरकारी कार्यक्रमों में नैशनल कॉन्फ्रेंस का झंड़ा फहराना शुरू कर दिया. जम्मू राज्य को देश के ऊपर और अलग समझने वाले उनके इन राष्ट्रविरोधी निर्णयों को चुनौती देने फिर यदि कोई सत्ता के साथ आर-पार की लड़ाई के लिए खड़ा हुआ तो वह राज्य का युवा ही था. उनके इन तानाशाही निणर्यों का सड़कों पर उतर कर पुरजोर विरोध जम्मू में प्रजा परिषद और लद्दाख में ‘लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन‘ ने किया.
 
उसके बाद १५ जनवरी १९५२ को जम्मू के राजकीय गांधी मेमोरियल विज्ञान महाविद्यालय में छात्रों का एक कार्यक्रम हुआ. इस कार्यक्रम में शेख अब्दुल्लाह बतौर मुख्य अतिथि आनेवाले थे. महाविद्यालय के छात्रों को सूचना मिली कि कार्यक्रम में नेशनल कॉन्फ्रेंस का झंड़ा फहराया जाएगा और मार्च पास्ट करते छात्रों को इसे सलामी देनी है. कार्यक्रम के दिन छात्रों ने शेख अब्दुल्लाह के सामने इसका विरोध किया और नेशनल कॉन्फ्रेंस के विरोध में नारेबाजी की. पुलिस ने बलपूर्वक छात्रों को वहां से खदेड़ा और स्टूडेंट नेशनल एसोसिएशन (बाद में यह संगठन १९५४ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में विलीन हो गया था) के महासचिव समेत छह छात्रों को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें महाविद्यालय से भी निलंबित कर दिया गया.
 
देशभक्त छात्रों को प्रताड़ित करने वाली सरकार के इस तानाशाही फैसले का विरोध करते हुए २८ जनवरी को छात्रों ने भूख हड़ताल पर बैठने का निर्णय लिया. ४० दिन तक यह भूख हड़ताल चली. भारत के झंड़े के साथ हल वाला झंड़ा फहराने का विरोध छात्रों को इतना महंगा पड़ा कि अंततः ८ फरवरी १९५२ को कॉलेज अनिश्चितकाल के लिए ही बंद कर दिया गया. छात्रों का यह आंदोलन जन आंदोलन में तब्दील हो गया. राष्ट्रवादी छात्रों के समर्थन में पूरा शहर सड़कों पर आ गया. देखते ही देखते अपने देश के झंड़े के सम्मान में उतरे छात्रों और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस और सेना को बुला दिया गया. पूरा शहर छावनी में तब्दील हो गया. पांच बार लाठी चार्ज हुआ और तीन बार गोलियां चलाई गई, लेकिन देश के झंड़े के अपमान के विरोध में खड़े छात्रों का हुजूम रुका नहीं. अंततः ८ फरवरी आधी रात को जम्मू में ७२ घंटे का कर्फ्यू लगा दिया गया.
 
तब से अब तक...
 
समय बीतता गया लेकिन जम्मू के युवाओं की देशभक्ति में कोई अंतर नहीं आया. राज्य में जब आतंकवाद चरम पर था, तब भी स्थानीय युवाओं ने, विशेषकर जम्मू संभाग के और पहाड़ी क्षेत्रों में बसने वाले गुज्जर और बकरवाल युवाओं ने आतंकवादियों की गतिविधियों और ठिकानों का पूरा ब्योरा सेना और सुरक्षा बलों को देकर देश के प्रति अपना दायित्व निभाया. कई उदाहरण तो ऐसे भी मिले जब नियंत्रण रेखा के पास रहने वाले इन पहाड़ी युवाओं ने सेना का इंतजार किए बिना ही आतंकवादियों से मुकाबला कर उन्हें धर दबोचा. आतंकवाद के खिलाफ लड़ते हुए सुरक्षा बलों के वीर जवानों के अलावा बड़ी संख्या में जम्मू के युवाओं ने भी अपना बलिदान दिया. गैर राष्ट्रवादी शक्तियों के खिलाफ सतत संघर्ष करते हुए आज जम्मू के युवाओं के कारण ही राज्य में पाक प्रायोजित आतंकवाद और अलगाववाद अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है.
 
दरअसल, आजादी के नाम पर जो कुछ चंद कश्मीरी युवकों को अलगाववादियों ने बरगलाया भी था, वह भी समझ गया कि यह जंग किसी आजादी की नहीं अपितु केवल उनकी और भारत की बरबादी की है. अपने मकसद को पूरा करने के लिए यह पाक प्रायोजित अलगाववादी और आतंकवादी स्थानीय कश्मीरी युवाओं का भी जब कत्ल करने को उतारू हो गए तब वहां का समाज जागा. हाल ही में अपने घर छुट्टी काटने आए फैयाज़, इरफान डार, मोहम्मद रमज़ान पारे जैसे सेना और सुरक्षा बलों के अधिकारी और युवाओं को भी आतंकवादियों ने घाटी में मौत के घाट उतार दिया. एक सरकारी आंकड़े के अनुसार पिछले २८ वर्ष में आतंकवाद से लड़ते-जम्मू पुलिस के ही १६२२ जवान और अधिकारी अपना बलिदान दे चुके हैं. सेना और अर्धसेना बलों के जवानों के अलावा यह राज्य का अपना ही युवा था जो पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद में बलिदान हो गया. अब स्थानीय युवा ही आतंकियों को दोज़ख पहुंचाने में भारतीय सेना के अभियान का खुलेआम या छुपकर समर्थन कर रहा है.
 
जम्मू और लद्दाख के साथ-साथ अब घाटी में भी कोई युवा अलगाववाद का सर्मथन करता नहीं मिल रहा है. हाल ही में सेना में कमीशन हुए घाटी के एक युवा लेफ्टिनेंट जमशेद नासीर ने कश्मीर के युवा भाव प्रकट करते हुए कहा, ‘अगर वह एक फैयाज़ मारेंगे तो सैंकड़ों भारतीय सेना में जुड़ेंगे.’ लेफ्टिनेंट जमशेद नासीर ने जो भाव प्रकट किए वह ही आज कश्मीरी युवा का भाव है. वह अपने यहां विकास चाहता है, अलगाववादियों का दिया हुआ विनाश नहीं. वह रोज़गार और शांति चाहता है, पत्थरबाजी और आत्मघाती क्रांति नहीं. जम्मू का युवा पहले भी और आज भी भारत की रक्षा के लिए सतत संघर्ष और बलिदान करता आया है और यह क्रम यूं ही चलता रहेगा.