अम्लीय प्रदूषण से दूषित होती नदियां
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:२९-दिसंबर-२०१७
प्रमोद भार्गव
 
इंट्रो
स्टील प्लांटों से निकले तेजाब ने मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र की नदियों के जल को प्रदूषित कर अम्लीय बना दिया है. वहीं छत्तीसगढ़ की नदियों को खदानों से उगल रहे मलबे लील रहे हैं. उत्तर प्रदेश की गोमती का पानी जहरीला हो गया है. गंगा किस हाल में है, सब जानते हैं.
ल संपदा की दृष्टि से भारत की गिनती दुनिया के ऐसे देशों में है, जहां बड़ी तादाद में आबादी होने के बावजूद उसी अनुपात में विपुल जल के भंडार अमूल्य धरोहर के रूप में उपलव्ध है. जल के जिन अजस्र स्रोतों को हमारे पूर्वजों व मनीषियों ने पवित्रता और शुद्धता के पर्याय मानते हुए पूजनीय बना कर सुरक्षित कर दिया था, आज वहीं जल स्रोत हमारे अवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक दोहन की उद्दाम लालसा, औद्योगिक लापरवाही, प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनैतिक अदूरदर्शिता के चलते अपना अस्तित्व खो रहे हैं. गंगा और यमुना जैसी सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व की नदियों की बात तो छोड़िए, प्रादेशिक स्तर की क्षेत्रीय नदियां भी गंदे नालों में तब्दील होने लगी हैं. स्टील प्लांटों से निकले तेजाब ने मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र की नदियों के जल को प्रदूषित कर अम्लीय बना दिया है. वहीं छत्तीसगढ़ की नदियों को खदानों से उगल रहे मलबे लील रहे हैं. उत्तर प्रदेश की गोमती का पानी जहरीला हो जाने के कारण उसकी कोख में मछलियों की संख्या निरंतर घटती जा रही है. गंगा किस हाल में है, सब जानते हैं.
 
भारत में औसत वर्षा का अधिकतम अनुपात उत्तर-पूर्वी चेरापूंजी में ११,४०० मिमी और उसके ठीक विपरीत रेगिस्तान के अंतिम छोर जैसलमेर में न्यूनतम २१० मिमी के आसपास है. यही वर्षा जल हमारे जल भण्डार- नदियों, तालाबों, बांधों, कुओं और नलकूपों को बारह महीने लबालव भरा रखते हैं. प्रकृति की वर्षा की यह देन हमारे लिए एक तरह से वरदान है. लेकिन हम अपने तात्कालिक लाभ के चलते इस वरदान को अभिशाप में बदलने में लगे हुए हैं. औद्योगिक क्षेत्र की अर्थ दोहन की ऐसी ही लापरवाहियों के चलते मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में लगे स्टील संयंत्र रोजाना करीब ६० टन दूषित मलबा नदियों में बहाकर उन्हें जहरीला तो बना ही रहे हैं, मनुष्य-मवेशी व अन्य जलीय जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा भी साबित हो रहे हैं. दरअसल इन स्टील संयंत्रों में लोह के तार व चद्दरों को जंग से छुटकारा दिलाने के लिए ३२ प्रतिशत सान्द्रता वाले हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का इस्तेमाल किया जाता है. तारों और चद्दरों को तेजाब से भरी बड़ी-बड़ी हौदियों में तब तक बार-बार डुबोया जाता है तब तक ये जंग से मुक्त नहीं हो जातीं? बाद में बेकार हो चुके तेजाब को चामला नदी से जुड़े नालों में बहा दिया जाता है. इस कारण नदी का पानी लाल होकर प्रदूषित हो जाता है, जो जीव-जंतुओं को हानि तो पहुंचाता ही है यदि इस जल का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है तो यह जल फसलों को भी पर्याप्त नुकसान पहुंचाता है. पूरे मध्यप्रदेश में इस तरह की पंद्रह औद्योगिक इकाइयां हैं. लेकिन अकेले मालवा क्षेत्र और इंदौर के आसपास ऐसी दस इकाइयां हैं, जो खराब तेजाब अगल-बगल की नदियों में बहा रही हैं.
नियमानुसार इस दूषित तेजाब को साफ करने के लिए रिकवरी यूनिट लगाए जाने का प्रावधान उद्योगों में है, पर प्रदेश की किसी भी इकाई में ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगे हैं. दरअसल एक ट्रीटमेंट प्लांट की कीमत करीब आठ करोड़ रूपये है. कोई भी उद्योगपति इतनी बड़ी धनराशि व्यर्थ खर्च कर अपने संयंत्र को प्रदूषण मुक्त रखना नहीं चाहता? कभी-कभी जनता की मांग पर प्राशसनिक दबाव बढ़ने के बाद औद्योगिक इकाइयां इतना जरूर करती हैं कि इस अम्लीय रसायन को टैंकरों में भरवाकर दूर फिकवाने लगती हैं. इसे नदियों और आम आदमियों का दुर्भाग्य ही कहिए कि इसी मालवा अंचल में चंबल, क्षिप्रा और गंभीर नदियां हैं, टैंकर चालक इस मलबे को ग्रामीणों की विद्रोही नजरों से बचाकर इन्हीं नदियों में जहां-तहां बहा आते हैं. नतीजतन औद्योगिक अभिशाप अंतत: नदियों और मानव जाति को ही झेलना पड़ता है. ग्रामीण यदि जब कभी इन टैंकरों से रसायन नदियों में बहाते हुए चालकों को पकड़ भी लेते हैं तो पुलिस और प्रशासन न तो कोई ठोस कार्रवाई करता है और न ही इस समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में कोई पहल करता है. ऐसे में अंतत: ग्रामीण अभिशाप भोगने के लिए मजबूर ही बने रहते हैं.
 
इसी तरह गुना जिले के विजयपुर में स्थित खाद कारखाने का मलबा उसके पीछे बहने वाले नाले में बहा देने से हर साल इस नाले का पानी पीकर दर्जनों मवेशी मर जाते हैं. मलबे से नाले का पानी लाल होकर जहरीला हो जाता है. सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने पर यह पानी जहां फसलों की पैदावार कम करता है, वहीं इनसे निकले अनाज का सेवन करने पर शरीर में बीमारियां भी घर करने लगती हैं. ग्रामीण हर साल नाले में दूषित मलबा नहीं बहाने के लिए अपनी जुबान खोलते हैं लेकिन खाद कारखाने एवं जिले के आला प्रशासनिक अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती.
 
वाराणसी में गंगा का प्रवाह सात किमी है. एक समय बृहद बनारस क्षेत्र में बारहमासी वरुणा, असी, किरणा और धूतपापा नदियां गंगा में मिलकर इसके जल को प्राकृतिक रूप से प्रांजल बनाए रखने का काम करती थीं. इसके अलावा ब्रह्मनाल, मंदाकिनी और मत्स्योदरी बरसाती नदियां भी गंगा के जल प्रवाह को गातिशील बनाए रखती थीं. किंतु अब ये सब नदियां नालों-परनालों में तब्दील होकर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं. इनके व अन्य २३ नालों के जरिए ही गंगा में ३०० मीलियन लीटर से ज्यादा मल-मूत्र प्रवाहित हो रहा है. इन वजहों से गंगा जल में जीवाणु-विषाणुओं की भरमार हो गई है. पेयजल में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड का मानक तीन मिली ग्राम प्रति लीटर होना चाहिए, जो बनारस की गंगा में ५ से ८ मिलीग्राम प्रति लीटर है. तय है,गंगा में बड़ी मात्रा में जहर बह रहा है. जाहिर है, नदी का इस स्तर पर खराब हुआ स्वास्थ्य मनुष्य जाति को भी स्वस्थ नहीं रहने देगा. इसलिए यह तो अच्छी बात है कि देश के ऊर्जावान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी बनारस में गंगा का कायापलट करने पर आमादा हैं, लेकिन गंगा का अविरल प्रवाह बना रहे इस दृष्टि से माननीय प्रधान मंत्री जी को देहरादून में दिए उस बयान पर पुनर्विचार करना होगा, जिसमें उन्होंने ऊर्जा के लिए पहाड़ी नदियों और पहाड़ों के पानी के दोहन की बात कही थी. अन्यथा गंगा तो दूषित रहेगी ही, पहाड़ भी वृक्षों से निर्मूल हो जाएंगे.