शिंजो आबे को प्रचंड बहुमत
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:०१-दिसंबर-२०१७
जापानी प्रधान मंत्री शिंजो आबे की हाल के चुनावों में प्रचंड जीत के पीछे उनकी आर्थिक नीतियां और जापान को सशक्त सैन्य बल प्रदान करने के लिए संविधान संशोधन प्रस्तावित करना है। यह इस बात का संकेत है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अब जापानी समाज बदल चुका है। आबे की सरकार अमेरिका, जापान और भारत के बीच त्रिपक्षीय सैन्य गठबंधन की इच्छा रखती है। एशिया में यह नए युग का सूत्रपात हो सकता है।

 
जापान के प्रधान मंत्री शिंजो आबे ने २४ अक्टूबर को संपन्न संसदीय चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता में वापसी की है। आबे की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) ने अपनी सहयोगी कोमेइटो पार्टी के साथ मिलकर संसद की ४७५ में से ३२५ सीटों पर जीत का परचम लहराया है। एलडीपी को २९० जबकि कोमेइटो पार्टी को ३५ सीटें हासिल हुई हैं। मुख्य विरोधी दल कांस्टिट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान (सीडीपीजे) को ५७ सीटें तथा तोक्यो की गवर्नर यूरिको कोइको की नवगठित ‘पार्टी ऑफ होप’ को ४९ सीटें मिलीं। जापान की कम्युनिस्ट पार्टी (जेसीपी) को १२ सींटे मिली हैं। इस तरह शिंजो आबे के सत्तारूढ़ गठबंधन को दो तिहाई बहुमत मिल गया है।
वैसे अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि आबे की जीत का सबसे बड़ा कारण विरोधी दलों का एकजुट न हो पाना है। चुनाव में सत्तारूढ़ गठबंधन की भारी जीत के बावजूद आबे की निजी लोकप्रियता में कमी आई है। पर, इसके बावजूद जापान के द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर इतिहास में आबे सबसे लंबे समय तक प्रधान मंत्री बने रहने का रेकॉर्ड कायम करने वाले हैं। ६३ वर्षीय आबे २०१२ से जापान के प्रधान मंत्री बने हुए हैं। इससे पहले वे २००६ से २००७ तक प्रधान मंत्री पद पर रह चुके हैं। तब ५२ साल के आबे जापान के सबसे युवा प्रधान मंत्री बने थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे जापान के पहले प्रधान मंत्री बनने का श्रेय भी उन्हें प्राप्त है।
चुनाव के पहले विरोधी दलों ने आपसी एकता कायम करने की भरपूर कोशिश की थी। वर्ष २०१४ में हुए संसदीय चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान मुख्य विरोधी पार्टी थी। सदन में उसके कुछ ७३ सदस्य थे। इस साल सितंबर में होने वाले चुनाव के पहले यह पार्टी नाटकीय ढंग से विघटित हो गई। पार्टी ने नवगठित पार्टी ऑफ होप के बैनर तले चुनाव लड़ने का फैसला किया। इस निर्णय के पीछे पार्टी नेतृत्व का उद्देश्य आबे की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के खिलाफ संयुक्त मोर्चा पेश करना था। परंतु पार्टी ऑफ होप की नेता तोक्यो की गवर्नर युरिको कोइको की हठधर्मिता के कारण ऐसा होने ही नहीं पाया। गौरतलब है कि युरिको कोइको इस साल की शुरुआत तक आबे की एलडीपी पार्टी के प्रमुख नेताओं में थीं। अपनी निजी महत्वाकांक्षा के चलते एलपीडी पार्टी से अलग होकर उन्होंने पार्टी ऑफ होप का गठन किया। आज भी अधिकांश मुद्दों पर उनका दृष्टिकोण एलडीपी से मिलता जुलता है। वे भी आबे की तरह ही जापानी संविधान में संशोधन का समर्थन करती हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी के वामपंथी धड़े के लोग संविधान संशोधन के खिलाफ हैं। युरिको कोइको ने एक शर्त रख दी कि डेमोक्रेटिक पार्टी के जो लोग उनकी होप पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं उन्हें एक निजी वफादारी के वचन-पत्र पर हस्ताक्षर करना होगा। इस वचन-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले सभी लोग युरिको कोइको के दक्षिणपंथी एजेंडे से बंध जाते थे। डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिकांश लोग वचन-पत्र पर हस्ताक्षर करने को राजी नहीं हुए। उन्होंने विद्रोह कर दिया और कांस्टिट्यूशनल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ जापान (सीडीपीजे) का गठन किया। संसदीय चुनाव के तीन सप्ताह पहले गठित की गई इस पार्टी को चुनावी जंग में बिना पर्याप्त तैयारी और साधनों के उतरना पड़ा। यूकिओ एदानो के नेतृत्व में सीडीपीजे के ७४ उम्मीदवार विजयी हुए और यह पार्टी दूसरे स्थान पर रही। प्रधान मंत्री पद का सपना देख रही यूरिको कोइको की पार्टी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। उसे महज संसद में तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। चुनाव परिणाम आने के बाद युरिको कोइको ने स्वीकार किया कि चुनावों में हार के लिए वे जिम्मेदार हैं। जापानी मीडिया से उन्होंने कहा कि मैं स्पष्ट तौर से कहना चाहती हूं कि यह पूर्ण पराजय है। चुनावों में जापान की कम्युनिस्ट पार्टी की भी भारी दुर्दशा हुई। उसे पिछली संसद में २१ सीटों के मुकाबले इस बार महज १२ सीटें ही मिल सकीं।
संसदीय चुनावों में भारी जीत को आबे की आर्थिक नीतियों के प्रति जनादेश के रूप में देखा जा रहा है। आबे की आर्थिक नीतियों को ‘आबेनोमिक्स’ के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अर्थव्यवस्था में नकद राशि बढ़ाकर और सरकारी खर्चों में बढ़ोत्तरी करके जापान की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने का प्रयास किया था। इससे अर्थव्यवस्था में शुरू में उछाल आया था लेकिन इस साल के आखिरी महीनों में जापान फिर मंदी की चपेट में आ गया था। इसके लिए अर्थशास्त्रियों ने बिक्री कर में बढ़ोत्तरी को कुछ हद तक जिम्मेदार माना था। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद शिंजो आबे ने कहा, ‘लोगों ने हमारी आबेनोमिक्स की नीतियों पर मंजूरी की मुहर लगाई है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि हम आत्मसंतुष्ट हो सकते हैं। मेरी आबेनोमिक्स की नीतियों ने अभी तक आधा रास्ता ही तय किया है।’’
आबे की प्रचंड जीत पूरे एशियाई क्षेत्र के शक्ति समीकरण के लिहाज से अहम है। जीत के तुरंत बाद आबे ने उत्तर कोरिया की ओर से आ रही चुनौतियों से सख्ती से निपटने की बात कहकर जो संकेत दिया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संसद में दो तिहाई बहुमत मिलने के बाद आबे संविधान में संशोधन का प्रस्ताव रख सकेंगे। इससे संविधान में युद्ध की बंदिश और सेना की आत्मरक्षा की भूमिका को खत्म किया जा सकेगा। दरअसल जापानी समाज लंबे अर्से से दुविधा में जीता आ रहा है। एक समय बेहद लड़ाकू तेवरों के साथ साम्राज्य विस्तार करने में जुटे इस समाज में दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिकाओं के बाद युद्ध और हिंसा को लेकर गहरी जुगुप्सा देखने को मिली। जापानी संविधान के अनुच्छेद नौ में साफ-साफ शब्दों में कहा गया है कि जापान युद्ध का परित्याग करता है तथा वह स्टैंडिंग आर्मी नहीं रखेगा। दशकों से जापान का आत्मरक्षा बल पूर्णकालिक सेना की भूमिका निभा रहा है।
हालांकि द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान को पराजित करने वाले मित्र राष्ट्रों की ओर से लादी गई संधि भी जापान के शांतिवादी संविधान का एक बड़ा कारण थी, लेकिन इस संधि के खिलाफ कभी कोई तीखी भावना जापानी समाज में इस दौरान विकसित होती नहीं दिखी। मोटे तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध के ७० साल बाद तक जापान आर्थिक विकास को ही अपना एकमात्र ध्येय मानकर चलता रहा। नतीजा यह हुआ कि एकतरफ दुनिया भर में जापानी कंपनियों की तूती बोलती रही और एक समय वह दुनिया की दूसरे नंबर की आर्थिक ताकत बन गया था जबकि दूसरी तरफ सामरिक मामलों में उसकी कहीं कोई गिनती ही नहीं थी।
अब पिछले कुछ सालों से जापानी समाज को यह बात बैचैन कर रही है कि असाधारण आर्थिक विकास के बावजूद वह ढंग से अपनी रक्षा करने की स्थिति में भी नहीं है। उत्तर कोरिया जैसा छोटा और अल्प विकसित देश भी उसे आंखें दिखाता रहता है। देश की प्राथमिकताओं में जिस बदलाव की वकालत शिंजो आबे करते रहे हैं उसकी ताकत उन्हें समाज के इसी मिजाज से मिलती है।
संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत के बावजूद आबे के लिए संविधान संशोधन की राह आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें संसद के अलावा जनमत संग्रह में भी जीत हासिल करनी होगी। इस अड़चन को पार करना जापानी प्रधान मंत्री के लिए मुश्किल हो सकता है क्योंकि सशस्त्रीकरण के मुद्दे को लेकर जापानी समाज अब भी काफी बंटा हुआ है। मुख्य विरोधी पार्टी सीडीपीजे तथा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ जापान शांतिवादी संविधान के अनुच्छेद नौ में संशोधन के खिलाफ हैं। सीडीपीजे के नेता का कहना है कि उनकी पार्टी जापानी सेना के ‘सामूहिक आत्मरक्षा’ में शामिल होने से रोकने के लिए हर संभव प्रयास करेगी। इदानो के मुताबिक सामूहिक आत्मरक्षा का मतलब अमेरिका द्वारा दुनिया के विभिन्न हिस्सों में छेड़े गए युद्ध में शामिल होना होगा।
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद शिंजो आबे ने मीडिया से कहा कि चुनाव परिणाम उनकी पार्टी की कोरियाई तथा घरेलू नीतियों के प्रति भारी जन समर्थन को व्यक्त करता है। उन्होंने कहा कि मतदाताओं ने उत्तर कोरिया को स्पष्ट संदेश दिया है कि मजबूत जापान को अब किम जोंग ऊन अपनी चालबाजियों से मूर्ख नहीं बना सकते। आबे ने दो एक शब्दों में कहा कि उत्तर कोरिया समझौता वार्ता करने के लिए मजबूर हो जाएगा।
संविधान के मुद्दे पर आबे ने मीडिया से कहा कि वे चाहते हैं कि युरिको कोइको की पार्टी ऑफ होप जैसे राजनीतिक दलों को इस मसले पर सरकार का समर्थन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान संशोधन के लिए निर्धारित वर्ष २०२० की अवधि भी लचीली है। संविधान संशोधन पर व्यापक आम राय कायम करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए आबे ने कहा कि उनकी सरकार और लंबे समय तक इंतजार कर सकती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एलडीपी ने दो तिहाई बहुमत हासिल जरुर किया है लेकिन सत्तारूढ़ गठबंधन और विरोधी दलों के बीच व्यापक सहमति कायम करना बेहद जरूरी है।
वैसे यह बात गौरतलब है कि सन २०१५ में आबे सरकार ने संसद के जरिये ऐसे कानून बनाए हैं जिससे की जापानी सशस्त्र सेनाओं को ‘सामूहिक आत्मरक्षा’ में भाग लेने और आक्रमण का सामना कर रहे सहयोगियों की मदद करने की अनुमति है। जापानी संसद में सबसे बड़ी विरोधी पार्टी सीडीपीजे के नेता इदानो ने बार-बार कहा है कि संविधान संशोधन को रोकना उनकी पार्टी की प्राथमिकता है। उनका यह भी कहना है कि जापानी सेना को समुद्र पार लड़ाई में शामिल होने की अनुमति देने वाले २०१५ के कानून संविधान का उल्लंघन करते हैं। यह बात भी उल्लेखनीय है कि संविधान संशोधन के मुद्दे पर आबे की सहयोगी पार्टी कोमेइटो के रवैये में भी बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं। चुनावों के परिणाम आने के बाद कोमेइटो पार्टी की ओर से एक बयान दिया गया कि मुख्य विरोधी दल से सहमति प्राप्त करने के बाद ही संविधान के अनुच्छेद नौ में संशोधन किया जाना चाहिए।
आबे के संविधान संशोधन की योजना का उसके पड़ोसी देश जोरदार विरोध कर रहे हैं। चीन और कोरिया अतीत में जापानी साम्राज्यवाद का शिकार बन चुके हैं। अमेरिका के समन्वय से जापान के पुन: सैन्यीकरण की संभावना का ये दोनों देश पुरजोर विरोध कर रहे हैं। रूस भी इस मसले पर चीन और उत्तर कोरिया के साथ है।
आबे की सरकार अमेरिका, जापान और भारत के बीच त्रिपक्षीय सैन्य गठबंधन की इच्छा रखती है। फिलहाल ये तीनों देश वार्षिक संयुक्त युद्धाभ्यास करते हैं। चीन इन तीनों देशों के इस सहयोग को अपने खिलाफ मानता है। यह बात भी उल्लेखनीय है कि आबे भारत के साथ संबधों को तरजीह देते हैं। उनके फिर से सत्ता में आने से दोनों देशों के संबंधों में और मजबूती आने की संभावना है। जापान आर्थिक और परमाणु क्षेत्र में भारत का प्रमुख सहयोगी है। उसके सहयोग से भारत की प्रथम बुलेट ट्रेन की परियोजना शुरू की गई है। पिछले दिनों प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ आबे ने इस परियोजना की नींव रखी थी।