भंसाली, पद्मावती और विवाद
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:०१-दिसंबर-२०१७
आम दर्शक सोलहवीं सदी के सूफी फकीर मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत’ के पन्नों में चित्रित महारानी पद्मावती के सौंदर्य, वीरता और जौहर को सत्तर एमएम के पर्दे पर जरूर देखना चाहता है। लेकिन फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न में रानी पद्मावती के आने के कथित दृश्य को लेकर विवाद उपजा है। इस संबंध में जनभावनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
 
जौहर, शौहर, विरोध, प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की आजादी की आग में रानी पद्मावती इन दिनों अपने चरित्र और व्यक्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इतिहास के पन्नों में दर्ज सच्चाई से छेड़छाड़ विषय पर बड़े-बड़े जानकार बहस में शामिल हो रहे हैं, राजपूत युवा विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आए हैं तो पूर्व राजघराने की नारी शक्ति ने भी हुंकार भर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म पर रोक की याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया है और एक प्रतिभाशाली फिल्म निर्देशक अपनी बात पर अड़ा हुआ है। इन सबके बीच रानी पद्मावती की अंतरात्मा की आवाज किसी को नहीं सुनाई देती। और शायद कभी सुनाई भी नहीं देगी। क्योंकि सब अपना-अपना पक्ष मजबूत करने और अपने विचारों की विजयश्री के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाने में मशग़ूल हैं।
 
 
फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की बहुप्रतीक्षित फिल्म पद्मावती के विरोध की आग आज देश भर में फैल चुकी है। महानगरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों और देहातों में भी विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। निर्देशक भंसाली के पुतले को विरोध की अग्नि में स्वाहा किया जा रहा है। धमकी, चेतावनी और इससे बढ़कर अपशब्दों का प्रयोग भी किया जा रहा है। मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन से भाजपा सांसद चिंतामणि मालवीय ने बयान दिया है कि जिन फिल्मकारों की बीवियां रोज शौहर बदलती हों, वे जौहर क्या जानें। मालवीय ही नहीं, और भी कई जिम्मेदार पदों पर बैठे वरिष्ठजन, नेतागण, निर्देशक भंसाली को अपने तीखे शब्दों से सम्मानित कर चुके हैं। आम दर्शक मौन साधे यह सारा तमाशा देख रहा है। उसे पद्मावती के इतिहास में दिलचस्पी रही हो या न हो, लेकिन आक्रोश की तेज हवा में फड़फड़ाए मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ के पन्नों में चित्रित महारानी पद्मावती के सौंदर्य, वीरता और जौहर को वह सत्तर एमएम के पर्दे पर जरूर देखना चाहता है। (माना जाता है कि सूफी फकीर जायसी ने यह महाकाव्य सन १५९७ में लिखा। यह अवधी में दोहा और चौपाई छंद में है। इनकी संख्या ६५३ है।) निर्देशक भंसाली ने एक वीडियो जारी कर फिल्म में किसी भी तरह का विवादास्पद दृश्य होने से साफ इंकार कर दिया है, लेकिन विरोध का तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है। बताया जा रहा है कि फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न में रानी पद्मावती के आने का दृश्य फिल्माया गया है। इसी को लेकर विवाद उपजा है। फिल्म पद्मावती में मुख्य भूमिका दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर और रणवीर सिंह ने निभाई है। विवाद इतना अधिक बढ़ चुका हैं कि कुछ राज्यों में लगातार हो रहे विधान सभा व नगर पंचायत चुनावों में उलझे होने के कारण फिल्म निर्माताओं को सुरक्षा देने में असमर्थ होने के कारण सरकार ने फिल्म के रिलीज की तारीख आगे बढ़ाने का अनुरोध किया है तथा निर्माताओं ने भी इसे मानते हुए आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।
 
करणी सेना की हुंकार से विरोध का आगाज़
फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती के विरोध का आगाज़ श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना की हुंकार से हुआ था। फिल्म की शूटिंग जयपुर के जयगढ़ फोर्ट में चल रही थी। फिल्म पद्मावती में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए करणी सेना के पदाधिकारी-कार्यकर्ताओं ने यहां जमकर उत्पात मचाया था। सेट पर तोड़फोड़ की गई थी। निर्देशक भंसाली के साथ बदसलूकी की गई थी। फिल्म का पहला पोस्टर आउट होते ही इस विरोध की आग और भड़क गई। करणी सेना और राजपूत समाज से जुड़े सैकड़ों संगठन सड़क पर उतर आए। हिंदूवादी संगठनों ने भी समर्थन दिया और देश भर में निर्देशक भंसाली का पुतला जलाकर विरोध किया जाने लगा। करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी ने बयान दिया कि भंसाली ने हमारे साथ वादाखिलाफी की है। उन्होंने रिलीज के पूर्व प्रोमो और फिल्म दिखाने की बात कही थी, लेकिन अब मुकर गए हैं। फिल्म में इतिहास के गलत चित्रण और महारानी पद्मावती की गरिमा के साथ छेड़छाड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना का कहना है कि फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी के स्वप्न वाले दृश्य को दिखाया गया तो राजस्थान में यह फिल्म नहीं चलने दी जाएगी। हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चक्रपाणी महाराज ने भी फिल्म पद्मावती का विरोध करते हुए निर्देशक भंसाली को गिरफ्तार करने की मांग की है। फिल्म पर रोक की याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इंकार फिल्म निर्माता-निर्देशक के लिए राहत भरा है। कोर्ट का कहना है कि सेंसर बोर्ड के अधिकार से पूर्व इस मामले में सुनवाई नहीं की जा सकती।
 
किरदार से बढ़कर स्टार वैल्यू
भारतीय फिल्म उद्योग में किरदार से बढ़कर स्टार वैल्यू को महत्व दिया जाता रहा है। इस चलन में हाल ही के कुछ सालों में तेजी आई है। यानी कहानी में किरदार भले ही कितना ही मजबूत हो, लेकिन फिल्म में उसी कलाकार को लिया जाता है जिसकी स्टॉर वैल्यू बेहतर हो। चुनिंदा निर्देशक ही ऐसे हैं जो स्टार वैल्यू से ज्यादा कहानी और किरदार को तवज्जो देते हैं। निर्देशक भंसाली की बात की जाए तो वे कम किंतु अच्छी फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन तीन फिल्मों में लगातार एक ही जोड़ी को दोहराना कहीं न कहीं संदेह पैदा करता है। ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ के बाद अब फिल्म ‘पद्मावती’ में भी रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण की जोड़ी मुख्य भूमिका में है। इसे क्या समझा जाए। इसका नुकसान कभी-कभी दर्शकों को उठाना पड़ता है। मजबूत किरदार होने के बावजूद अभिनेता का किरदार के साथ न्याय न कर पाना दर्शकों को खलता है।
 
विवादित फिल्मों का फिल्मकार
फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्मों के दृश्य ख्वाबों की दुनिया से प्रतीत होते हैं। बड़े-बड़े सेट, मंहगे कॉस्ट्यूम, नामी कलाकार और वजनदार संवाद दर्शकों के दिल को छू जाते हैं। उनकी फिल्मों का बजट भी करोड़ों में होता है। पब्लिसिटी पर भी करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। लेकिन जब किसी फिल्म का विवाद से नाता हो तो पब्लिसिटी बेतहाशा मिलने लगती है, वह भी मुफ्त में, बोनस के रूप में। ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ फिल्म का नाम पूर्व में सिर्फ रामलीला रखा गया था। इस पर कुछ हिंदू संगठनों ने आपत्ति ली और देश भर में हंगामा हो गया। फिल्म प्रेमियों के साथ-साथ वे लोग भी रामलीला से वाकिफ हुए जो कम फिल्में देखते हैं या थियेटर तक नहीं जाते। फिल्म को अच्छी खासी पब्लिसिटी मिली और इस विवाद का अंत फिल्म के नाम में आंशिक परिवर्तन करने पर हुआ। यही स्थिति फिल्म पद्मावती के साथ भी निर्मित हो रही है। फिल्म को रिलीज से पहले ही काफी पब्लिसिटी मिल चुकी है। लेकिन ऐसे लाभ की चाहत के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक को आम दर्शक और संबंधित किरदार से जुड़ी भावनाओं का ख्याल रखने की भी आवश्यकता है।
 
आत्म सम्मान के लिए किया पद्मावती ने जौहर
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ की रानी पद्मिनी को पद्मावती के नाम से भी जाना जाता है। वे १३वीं-१४वीं सदी की महान भारतीय रानी रहीं। रानी पद्मिनी के साहस की गाथा इतिहास में अमर है। सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती की बेटी पद्मिनी का विवाह चित्तौड़ के राजा रावल रतनसिंह से हुआ था। दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मिनी के सौंदर्य से प्रभावित था। उसने राजा रतनसिंह से रानी पद्मिनी को देखने का आग्रह किया। रानी पद्मिनी की शर्त के अनुरूप खिलजी ने रानी को शीशे में देखा। वह उनके सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसने छल से चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। राजा रतनसिंह को बंदी बना लिया गया। अपने सम्मान की रक्षा के लिए रानी पद्मिनी ने हजारों महिलाओं के साथ अग्निकुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी को जौहर कहा जाता है।