विवेकानंद ही युवाओं के तारणहार
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:०१-दिसंबर-२०१७
अन्ना हजारे के आंदोलन की विफलता के बाद देश के युवाओं में आई हताशा को दूर करना और उनकी उम्मीदों को सकारात्मकता से जोड़कर उन्हें राष्ट्रीय और सामाजिक कार्यों से जोड़ना बहुत आवश्यक था। इस विशाल कार्य को करने के लिए प्रेरणा देने की स्वामी विवेकानंद के विचारों में ही अद्भुत क्षमता है। इन्हीं विचारों को लेकर डॉ. राजेश सर्वज्ञ ने विवेकानंद यूथ कनेक्ट की स्थापना की। प्रस्तुत है उनकी संस्था और कार्यों के बारे में उनसे हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश-
 
 
अपनी संस्था व उसके निर्माण की प्रक्रिया के बारे में बताएं।
अन्ना आंदोलन से लोगों को काफी उम्मीदें थीं पर धीरे-धीरे चीजें बेमानी लगने लगीं। तत्कालीन सरकार के कार्यों के प्रति विरोध होने के बावजूद अन्ना का आंदोलन ध्वस्त होने पर युवाओं में निराशा छा गई थी। युवा वर्ग दो भागों में बंट गया था। एक वर्ग को लगता था कि इस देश का कुछ होने वाला नहीं है, अगर कैरिअर बनाना है तो किसी अन्य देश में निकल जाओ; जबकि दूसरे वर्ग का झुकाव नक्सलपंथ की ओर होने लगा था क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि सारी समस्याओं की जड़ में नेता लोग हैं। इन्हें हटाकर समस्या का समाधान किया जा सकता है। मुझे लगा कि युवा वर्ग की यह निराशा की भावना खतरनाक है क्योंकि युवा किसी भी देश की रीढ़ होते हैं तथा इनका पथभ्रष्ट होना देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होता है। हमें लगा कि युवाओं को स्वामी विवेकानंद के विचारों से जोड़ना चाहिए ताकि वे देश की समस्याओं के प्रति जागरुक हो सकें। उनके अंदर सकारात्मकता आ सके।
देश में बहुत सारे महापुरुष हुए हैं। फिर इस संकल्पना के लिए विवेकानंद ही क्यों?
हमारा देश जो कि लगभग ८०० वर्षों की इस्लामिक व ब्रिटिशों की मानसिक गुलामी से अपनी आभा खो चुका था। उसे जगाने तथा उसके पुनरुत्थान का कार्य जरूरी था। इसलिए स्वामी विवेकानंद ने इस देश के युवाओं को जगाने का कार्य आरंभ किया। उनका कार्य सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विश्व पटल पर था। यह सही है कि बहुत सारे महापुरुषों ने देश व समाज को जगाने का कार्य किया पर विवेकानंद जी का कार्य अतुलनीय था। मेरे स्वयं के जीवन पर भी विवेकानंद जी के विचारों का काफी प्रभाव रहा है। शायद यह भी एक कारण हो सकता है, क्योंकि उनके विचारों से मैं कुछ ज्यादा ही जुड़ाव महसूस करता हूं।
इस अभियान के तहत कौन-कौन से कार्य कर रहे हैं?
आपको पता ही होगा कि विवेकानंद जी के शिकागो प्रवास की शुरुआत मुंबई से ही हुई थी। उसके १२० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हमने रामकृष्ण मिशन, मुंबई के सहयोग से एक काफी बड़ा कार्यक्रम किया था, जिसमें देश के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जी भी आए थे। वह कार्यक्रम मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में हुआ था। इसके अलावा मुंबई में युवाओं का त्यौहार माने जाने वाले दही-हंडी में कई मंडलों को विवेकानंद जी की फोटो छपी टी शर्ट वितरित की ताकि युवा वर्ग को उनके विषय में पता चल सके। कई मंडलों को विवेकानंद का नाम भी दिया। अमिताभ बच्चन के बंगले ‘प्रतीक्षा’ के सामने भी एक बड़ा कार्यक्रम किया, फिल्म इंडस्ट्री में उनके योगदान को दर्शाने वाला। मीडिया का भी काफी सहयोग मिला। मुंबई के प्रसिद्ध डिब्बावालों की परंपरा के १२५ साल पूरे होने पर युवाओं के साथ मिलकर उनका सम्मान समारोह आयोजित किया था। इसमें काफी गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इसी तरह गणेशोत्सव के दौरान पंडालों के प्रमुखों को टी शर्ट दिए। शिकागो स्पीच की जयंती व विवेकानंद जयंती के अवसर पर भी मुंबई विश्वविद्यालय के युवाओं को साथ लेकर कार्यक्रम किए। विवेकानंद जी के जीवन पर आधारित एक पात्रीय नाटिका ‘योद्धा संन्यासी विवेकानंद’ का मुंबई के तमाम कॉलेजों में मुफ्त शो करवाया।
आप संघ से भी जुड़े हैं। वहां पर आपने कौन-कौन से दायित्व संभाले व उन क्रियाकलापों से क्या मदद मिली?
संघ से तो मैं बचपन से ही जुड़ा रहा हूं। मेरा पूरा परिवार संघ से जुड़ा हुआ है। हमारे यहां नियमित शाखा नहीं लगती थी। जब कभी प्रचारक आते तभी लगती। कभी लगातार कई दिन लग जाती; पर ज्यादातर सप्ताह में एक बार लग पाती थी। हेमंत शिविर में जाते थे तथा अन्य वर्गों में भी जाते थे। बाद में शाखा मुख्य शिक्षक बनाया गया। कॉलेज में अ.भा.विद्यार्थी परिषद से जुड़ा। बजरंग दल व विश्व हिंदू परिषद के अभियानों में भी जाता रहा। संघ की खासियत रही है कि वह समाज के हर सकारात्मक कार्य में सहयोग करता है। मुझे भी संघ परिवार से पूरा आशीर्वाद मिला। साथ ही भाजपा से भी भरपूर सहायता मिली।
इस अभियान में आपके मुख्य सहयोगी कौन-कौन रहे?
यह संस्था एक अभियान की तरह कार्य कर रही है। हमारे साथ संघ के कार्यकर्ता भी जुड़े हैं, भाजपा के राजनेता तथा कई मीडिया समूह भी। हमारा मुख्य चेहरा विवेकानंद हैं, कार्य का चेहरा मुझे मान सकते हैं तथा ४०० से अधिक ओपिनियन मेकर्स भी अब तक जुड़े हैं। इन सबको मिलाकर ही ‘विवेकानंद यूथ कनेक्ट’ बनता है। इनमें से हर व्यक्ति केवल एक फोन की दूरी पर है तथा हर संभव प्रयास करता है।
अब तक किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है?
चुनौतियां कई प्रकार की होती हैं। जैसे एक बात बताऊं कि हमने इसे सेक्शन ८ कम्पनी के रूप में रजिस्टर करने की कोशिश की। इसमें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। बिना पैसे दिए कोई काम नहीं होता। जिस काम को एक महीने में हो जाना चाहिए था वह चौदह महीने में भी नहीं हो पाया है। १६-१७ बार री- सब्मिशन (पुनर्प्रस्तुतीकरण) करना पड़ा। बड़े-बड़े लोगों के साथ फोटो देखकर अधिकारियों को लगता था कि इनसे ज्यादा पैसा ऐंठा जा सकता है। हमारे नौकरशाह बिना पैसे लिए कुछ करते नहीं। वर्तमान सरकार आने के बाद वह बंद हो गया है। इसलिए भी सरकार के नजदीकी लोगों को परेशान करते हैं। दूसरी बात, किसी भी कार्यक्रम को करने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। सब कुछ इतना आसान नहीं होता।
क्या इस भावना को अंतरराष्ट्रीय आकार देने की भी आकांक्षा है?
बिलकुल। मेरी कुछ योजनाएं हैं। जैसा कि, विवेकानंद जयंती के अवसर पर मुंबई में तथा शिकागो भाषण जयंती के अवसर पर दिल्ली में मैराथन किया जा रहा है। दिल्ली में दो सौ दूतावास हैं जहां पर लगभग ८ से ९ हजार विदेशी कार्य करते हैं। उन्हें जोड़ रहे हैं। हमारी कोशिश है कि लगभग हर महाद्वीप में कार्य हों। हमारी कोशिश है कि विवेकानंद को एक वैश्विक शांतिदूत के तौर पर स्थापित किया जाए। साथ ही उनके नाम पर एक राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा सालाना सम्मान समारोह के आयोजन का भी विचार है जिसके मुख्य अतिथि राष्ट्र के महामहिम राष्ट्रपति हों। इसके अंतर्गत विश्व शांति, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, युवा, विज्ञान जैसे तमाम आयामों के लिए सम्मान दिए जाएंगे।
वर्तमान और पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया व सहयोग कैसा रहा?
दो अलग विचारधाराओं की सरकारों से हमें कोई दिक्कत नहीं हुई। मुझे नहीं लगता कि इस तरह के कामों में ऐसी कोई परेशानी किसी को होती हो। उल्टा उनका आकर्षण ज्यादा रहा। अगर कोई व्यक्ति संघ से जुड़ा रहा हो तो वह बचपन से ही उनकी खासियत जानता है। पर कांग्रेस के लोगों के लिए एक बड़ा आकर्षण था।
कुछ समय पश्चात् होने वाले मुंबई मैराथन (१० जनवरी २०१८) के लिए क्या-क्या तैयारियां की हैं?
इस तरह के आयोजनों में काफी तैयारियां करनी पड़ती हैं। सबसे पहला होता है ‘रनिंग पाथ’ की अनुमति प्राप्त करना जिसमें राजनीतिक रसूख की आवश्यकता पड़ती है। भाजपा सांसद पूनम महाजन जी इस मामले में हमारी पूरी मदद करती हैं। पिछले साल की ही भांति इस साल भी वे पुलिस आयुक्त, मनपा आयुक्त, एसीपी को पत्र लिखकर अनुमति मंगवाने का कार्य कर रही हैं। दूसरा महत्वपूर्ण कार्य है, धावकों को लाना। दो प्रकार के धावक होते हैं, प्रोफेशनल और आम आदमी। प्रोफेशनल रनर के लिए हमें काफी मेहनत करनी पड़ती है। सोशल मीडिया, कन्वेसिंग, कोचों से मिलना, मार्केटिंग करके उन्हें लाना पड़ता है। साथ ही आम जन की भागीदारी के लिए भी लोगों को जागरुक करना पड़ता है। इतने लोगों के लिए पानी, नाश्ता, विजेताओं के लिए मेडल, टी शर्ट इत्यादि का इंतजाम करना पड़ता है। इन सारी तैयारियों के लिए हम कार्य कर रहे हैं।
बहुत सी संस्थाएं युवाओं के लिए कार्य करने का दावा करती हैं पर अपनी छाप छोड़ने में असफल होती हैं। आपकी संस्था उनसे अलग कैसे है?
मेरे जीवन पर स्वामी विवेकानंद का काफी प्रभाव रहा है। इसलिए मैंने कुछ इस तरह के कार्य की योजना बनाई। साथ ही मुझ में सामाजिक कार्य करने के प्रति एक जुनून सा है। इन सारी चीजों के कारण मुझे लगता है कि हम देश के युवाओं के लिए बहुत कुछ सकारात्मक कर पाएंगे।
संस्था की भविष्य की महत्वपूर्ण योजनाएं क्या हैं?
चूंकि मैं एक डॉक्टर हूं इसलिए मेरी पहली पहल रहेगी कि विवेकानंद के नाम से एक मेडिकल सेंटर बनवाऊं जहां लोगों को सस्ते दर पर दवाइयां मिल सकें तथा उनका उपचार भी हो सके। बाद में एक बड़े हास्पिटल की नींव भी रखी जाएगी। मुंबई के झोपड़पट्टी इलाकों में बच्चों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में मार्गदर्शन का भी कार्य करना चाहता हूं। लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने का भी कार्य किया जाएगा। लोगों को शुद्ध पेयजल व आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखने के प्रति जागरुक करने का भी कार्य किया जाएगा।
युवा वर्ग का राजनीति से मोहभंग हो रहा है। इस दिशा में आप क्या कार्य कर रहे हैं?
मुझे लगता है कि किसी भी युवा को यदि स्वामी विवेकानंद के विचारों का ज्ञान कराया जाए तो वह खुद-ब-खुद विकट परिस्थितियों के खिलाफ खड़ा हो जाएगा। उसके अंदर यह भाव आएगा कि ये परिस्थितियां बदलनी चाहिए तथा उसके लिए स्वयं कमर कस तैयार हो जाएगा। बस आवश्यकता है कि उसके अंदर वे भाव जगाए जाएं।
संस्था की अब तक की उपलब्धियों से आप कितने संतुष्ट हैं?
संतुष्ट कहना ठीक नहीं होगा; क्योंकि किसी भी एनजीओ का जो स्वरूप होता है, वह हम अपनी संस्था को नहीं दे पाए हैं। हमारा पूरा प्रयास है कि हमारी संस्था अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से कार्य कर सके। अभी तक यह संस्था व्यक्ति केंद्रित है जबकि यह पूरी तरह कार्य-केंद्रित होनी चाहिए। मैं चाहता हूं कि यह संस्था जल्द से जल्द उन मानकों को प्रापत कर लें।
दिल्ली पीस मैराथन (१० सितम्बर २०१७) के प्रति लोगों का क्या रिस्पांस रहा?
स्वामी जी ने शिकागो सम्मेलन में पहला भाषण ११ सितम्बर को और अंतिम भाषण २७ सितम्बर को दिया था। यह बात कम ही लोगों को ज्ञात थी। साथ ही उस समय उन्होंने यूरोप और अमेरिका में काफी प्रवास किया था। यह बात भी काफी लोगों को पता न थी। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भी विवेकानंद जी की बातें उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी १२५ साल पहले थीं। आज के समाज को उन विचारों की अधिक आवश्यकता है। वरिष्ठ भाजपा नेता श्री श्याम जाजूजी ने भरपूर सहयोग दिया तथा सबने कहा कि यह एक सही व सार्थक पहल है और यह भावना मजबूती के साथ उभरनी चाहिए। दुनिया के हर देश ने अपने ‘आयकान’ (प्रतीक) को ग्लोबल (वैश्विक) बनाने का काम शुरू किया है जबकि हम हमारे ‘ग्लोबल आयकान्स’ को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं पहुंचा पाते। इसीलिए हम विवेकानंद को एक ‘ग्लोबल पीस आयकान’ के तौर पर सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं।
चे ग्वेरा स्टाइल में टी शर्ट का ख्याल कैसे आया?
जब इंटरनेट और सोशल मीडिया जैसी चीजें नहीं थीं उस समय टी शर्ट के माध्यम से चे ग्वेरा को १२० देशों तक पहुंचाया गया। यह एक सफल फार्मूला था पर मुझे दो तीन साल बाद पता चला जब लोगों ने कहना शुरू किया कि इस तरह का कार्य पहले किया जा चुका है। दरअसल मुंबई के बांद्रा इलाके में संघ की एक रैली निकली थी जिसमें मुझे विवेकानंद की फोटो वाली टी शर्ट पहनने को मिली थी तथा मैंने वह फोटो फेसबुक पर डाल दी तो लोगों के कमेंट आने शुरू हो गए कि यह एक बड़ी बेहतरीन पहल है। इसे आगे बढ़ाना चाहिए। ऐसा नहीं कि एक दिन पहन लिया और भूल गए। उस समय काफी नकारात्मक माहौल था इसलिए इस सकारात्मक पहल को लोगों ने हाथों हाथ लिया।