अग्निपरीक्षा गुजरात की जनता की
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:०१-दिसंबर-२०१७
पारस्परिक अंतर्विरोधों में उलझे हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश जैसे लड़कों के सहारे बचकाने राहुल गुजरात की जनता से वोट मांग रहे हैं, जबकि मोदी अपने विशाल कार्यों और राज्य व राष्ट्रीय विकास के बल पर वोट चाह रहे हैं।
अतः परीक्षा मोदी-शाह की नहीं, गुजरात की जनता की है। चित्र ऐसा है कि भाजपा इसमें खरी उतरेगी।

 
 
भारत में राजनीति सदा चर्चा का विषय रहा है और चुनाव किसी बड़े भारतीय उत्सव जैसे हैं। भारत में जिस तरह निरंतर उत्सव चलते रहते हैं, उसी तरह यह लोकतंत्र का उत्सव याने चुनाव निरंतर होते ही रहते हैं। चुनावी राजनीति राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा घटनाक्रम होता है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश इन दो राज्यों में विधान सभा चुनावों के बहाने भारतीय माहौल में राजनीतिक धूल उड़ रही है। हिमाचल की तुलना में गुजरात की राजनीति अखबारों, इलेक्ट्रानिक मीडिया और सोशल मीडिया पर विलक्षण चर्चा में है। अन्य राज्यों में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला होता है; लेकिन गुजरात में देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय दल आमने-सामने हैं। गुजरात के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वहां राज्य की राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति की आपस में मिश्रण दिखाई देता है। गुजरात के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह दोनों गुजरात के हैं। इसीलिए गुजरात का किला फतह करना याने राष्ट्रीय राजनीति में अपना वजूद २०१९ के लोकसभा चुनावों की दृष्टि से कायम रखने की चुनौती मोदी-शाह द्वय के समक्ष है। गुजरात के चुनाव इस बात के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गुजरात राज्य को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जाता है। भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रीय विकास के राष्ट्रीय प्रयोग सबसे पहले गुजरात से ही आरंभ किए। बाद में इन प्रयोगों को देश के अन्य राज्यों में परखा गया। गुजरात के विकास मॉडल के आधार पर सम्पूर्ण देश में वोट मांगे गए।
 
सन २००२ से गुजरात विधान सभा के चुनाव किसी न किसी कारण से हर बार विवादास्पद रहे हैं। इस वर्ष के चुनाव भी इसके अपवाद नहीं हैं। नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार व्यापारी-वर्ग पर पड़ी है। बाद में जीएसटी आने से व्यापारियों को और परेशानियों हुईं। इससे उनमें रोष है। गुजरात में भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग पटेल हैं। वे आरक्षण के मुद्दे पर भाजपा से नाराज है। गुजरात में दलितों पर हुए हमलों के कारण उस वर्ग भी रोष में है। किसान भी कृषि-उपज को उचित दाम न मिलने से पहले से ही रुष्ट हैं। साफ है कि गुजरात के चुनाव मोदी-शाह दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा ही है।
 
इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों के पास गुजरात को प्रभावी नेतृत्व देनेवाला चेहरा नहीं है। अतः यह मोदी विरुद्ध राहुल संघर्ष बन गया है। कहा जाता है कि गुजरात में कांग्रेस की स्थिति अत्यंत खराब है। किन्तु फिलहाल कांग्रेस के खेमे में उत्साह का माहौल दिखाई दे रहा है। राज्यसभा चुनाव में अहमद पटेल की विजय ने कांग्रेस का उत्साह बढ़ा दिया है। जाहिर है, मोदी और राहुल दोनों के लिए ये चुनाव काफी महत्व रखते हैं। राहुल को शीघ्र ही कांग्रेस का नेतृत्व सम्हालना है। यदि गुजरात में कांग्रेस अनपेक्षित रूप से चमत्कार कर सकी तो राहुल का भविष्य का मार्ग आसान हो सकता है। गुजरात के चुनाव एक राज्य तक सीमित चुनाव नहीं हैं। ये चुनाव देश की राजनीति पर प्रभाव डालनेवाले हैं। भाजपा को अपेक्षित सफलता मिली तो २०१९ के लोकसभा चुनावों में उसे अधिक आसानी होगी। इसके बाद कर्नाटक, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के भी चुनाव आ रहे हैं। इसलिए गुजरात के चुनाव इस बात का संकेत होंगे कि आनेवाले लोकसभा चुनावों में जनमत किस दिशा में मुड़ रहा है।
 
गुजरात में विपक्ष की ओर से कड़ी चुनौती नहीं है, यह भाजपा के लिए जमा का पक्ष है। २७ वर्ष के प्रदीर्घ काल में सत्ता में न रहने से गुजरात में कांग्रेस निष्क्रिय सी हो चुकी है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस की आशाएं पल्लवित दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले कुछ हफ्तों में गुजरात के लगातार दौरे कर भाजपा के खिलाफ विषवमन किया है। जीएसटी, व्यापारियों में रोष, बेरोजगारी पर उनका बल रहा है। ‘विकास गांडो थयो छे’ (विकास पागल हो गया है) नारे का आधार लेकर राहुल ने मोदी और शाह पर तीर चलाए हैं। कांग्रेस इसका कितना भी लाभ लेना चाहे फिर भी कांग्रेस के पास कद्दावर नेतृत्व का अभाव है। ऐन चुनाव के मौके पर कांग्रेस का चेहरा बन चुके शंकरसिंह वाघेला जैसे नेता का कांग्रेस से हट जाना उसे मुश्किल में डाल रहा है। पार्टी का संगठन भी राज्य में अत्यंत कमजोर रहा है।
 
गुजरात में अन्य पिछड़ा वर्ग अर्थात ओबीसी की संख्या ५१% है। उनमें १४६ जातियों का समावेश है। यह बड़ी संख्या है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि १८२ में से ११० सीटों पर ओबीसी का प्रभाव है। इनमें से ६० सीटों पर उनकी भूमिका निर्णायक है। गुजरात में पाटीदार और दलितों की संख्या २५% है। आदिवासी-मुस्लिमों में कांग्रेस का कुछ मात्रा में जनाधार है। गुजरात अमुमन व्यापार-बहुल राज्य माना जाता है। गुजरात में मध्यम वर्गीय और उच्च मध्यम वर्गीय व्यापारियों की बड़ी संख्या है। ये सभी बड़े पैमाने पर भाजपा के वोटर रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी से उनमें असंतोष की भावना है। कांग्रेस इसी भावना का लाभ उठाना चाहती है। उसने नोटबंदी और जीएसटी को ही प्रचार का मुद्दा बनाया है। पटेल समुदाय भाजपा का मतदाता है। आरक्षण के मुद्दे पर पटेल समाज भी भाजपा से नाराज है। कांग्रेस इसका भी लाभ उठाना चाहती है।
 
दलितों के नेता अल्पेश ठाकोर, आदिवासी नेता जिग्नेश मेवानी ये दोनों पाटीदार-पटेल आरक्षण के खिलाफ हैं। अल्पेश ठाकोर का आंदोलन भी मूलतया इसी मुद्दे पर टिका है कि पाटीदार-पटेल को आरक्षण दिया गया तो दलित-वनवासी समाज का हक मारा जाएगा। पटेल आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल को जिस दिन गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी ने चुनाव लड़ने का न्यौता दिया उसी दिन पाटीदार आरक्षण आंदोलन समिति के प्रवक्ता वरुण पटेल अपने सैंकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश मेवानी जैसे युवा गुजरात की राजनीति में उतरे हैं। पटेलों में अंतर्विरोध का लाभ उठाना कांग्रेस नेतृत्व को अभी नहीं जमा है। पटेल-पाटीदार के आरक्षण का विरोध करने वाले लोगों को साथ लेकर कांग्रेस पटेल समाज के वोटों की किस तरह अपेक्षा कर सकती है? पिछले विधान सभा चुनावों में पटेल समाज के वरिष्ठ नेता केशुभाई पटेल ने गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई थी। उन्होंने भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। केशुभाई ने अपनी पार्टी की ओर से १६३ उम्मीदवार खड़े किए थे। उनमें से केवल ३ उम्मीदवार जीते। मतदान का प्रतिशत था मात्र ३.६३। उस समय कांग्रेस केशुभाई जैसे कद्दावर नेता के विद्रोह का लाभ नहीं उठा सकी, तो फिर अब की बार अंतर्विरोध में उलझे इन राजनिति से अनजान लड़कों का लाभ किस तरह उठा पाएगी यह प्रश्न ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार ८०% पटेल मतदाताओं ने उस समय भाजपा को मतदान किया था और अब फिलहाल ४४ विधायक पटेल समाज के हैं।
 
१९८५ में माधवसिंह सोलंकी ने पटेल समाज के खिलाफ अन्य समाजों को एकत्रित कर गुजरात की राजनीति की थी और उसकी प्रतिक्रिया में पटेल समाज कांग्रेस से छितरता गया और भाजपा के करीब आता गया। यही पटेल समाज अब भाजपा के कितने करीब रहता है इस पर भाजपा की जीत निर्भर है। इंदिरा गांधी के कालखंड में गुजरात में कांग्रेस का पारंपारिक जनाधार खत्री, अनुसूचित जाति-जनजातियां और मुसलमान था। लेकिन १९८० के बाद हिंदुत्ववादी राजनीति के कारण अनेक समुदाय भाजपा की ओर मुड़े।
 
गुजरात में जातीय, सामाजिक समीकरण और ग्रामीण-शहरी मतदाताओं के बीच अंतर भी महत्व रखता है। कांग्रेस का परम्परागत बल क्षत्रिय, दलित, आदिवासी, मुस्लिम वोटों पर है, जबकि भाजपा का बल उच्च जातियों और ओबीसी पर है। शहरी इलाकों में भाजपा का वर्चस्व निर्विवाद है। इन मतदाताओं पर मोदी की गहरी पकड़ है। गुजरात और भाजपा पिछले दो दशकों से बना समीकरण है। १९९५ के चुनाव में १८२ में से भाजपा के १२१ उम्मीदवार चुने गए थे। तब से भाजपा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। १९९० से पिछले २७ वर्षों में कांग्रेस कभी सत्ता के करीब नहीं पहुंच सकी। इस बार भी चित्र नहीं बदला है। गुजरात में क्षेत्रीय मुद्दों को कभी तवज्जो नहीं दी गई, क्योंकि मोदी ने क्षेत्रीय भावनाओं को अपने राष्ट्रीय मुद्दों में स्थान दे दिया। ‘वायब्रेंट गुजरात’ पर गौर करें। इस अभियान के जरिए उन्होंने गुजरात की परम्परा को वैश्विक स्वरूप दे दिया। यह एक मिसाल है। पिछले २० वर्षों में गुजरात में हुआ विकास राष्ट्रीय विकास को प्रेरणा देने वाला साबित हुआ है।
 
गुजरात की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी लगभग २२ वर्षों से निर्णायक रूप से विजयी होती रही है। गुजरात में पार्टी की चुनावी राजनीति के शिल्पकार नरेंद्र मोदी ही हैं। अब वे देश के प्रधानमंत्री हैं। फलस्वरूप गुजरात की राजनीति में आंतरिक झटके महसूस किए जा रहे हैं। पाटीदार आरक्षण आंदोलन से विशेष झटका लगा। किसानों की नाराजी जैसे छोटे-मोटे मुद्दे हैं ही। गुजरात विधान सभा की १८२ सीटें हैं। उनमें से १५० सीटें जीतने का भाजपा का लक्ष्य है। यह लक्ष्य उत्तर प्रदेश की भारी विजय के बाद भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक नया रेखांकन होगा। लेकिन गुजरात और देश में अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। कांग्रेस को कम से कम जोरदार संघर्ष की उम्मीद है। भाजपा के लिए गुजरात जीतना अनिवार्य तो है ही, लेकिन सीटों का कम होना भी उसके लिए चिंता का विषय हो सकता है। इस स्थिति में गुजरात जैसे राज्य के विधान सभा चुनाव देशभर में गर्मागर्म बहस का मुद्दा बन गए हैं। यह भी कहा जाता है कि इस बार के गुजरात चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए अग्नि-परीक्षा है। लेकिन राहुल गांधी राज्य में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकोर को साथ लेकर ‘विकास पागल हो चुका है’ कहते हुए जातिगत राजनीति करने में मशगूल हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि यह परीक्षा नरेंद्र मोदी की ही नहीं, गुजरात के नागरिकों की भी है। गुजरात की जनता किसे चुनती है- विकास के आधार पर भारत को विश्व गुरु बनाने का लक्ष्य रखनेवालों को या जाति के आधार पर गुजराती समाज का विभाजन करने वाले राहुल गांधी को? अपने अमेठी निर्वाचन क्षेत्र में जनहित के कोई काम न करनेवाले और मोदी के विशाल कामों की खामियां खोजकर हार्दिक, जिग्नेश और अल्पेश नामक कमजोर बैसाखियों के सहारे वोट मांगने वाले राहुल गांधी को? ये प्रश्न अहम हैं।
 
परीक्षा तो गुजरात के व्यापारी वर्ग की भी है कि वे अपना वोट किसे देते हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा कराधान की प्रक्रिया को सरल, आसान कर अपने काम के आधार पर वोट मांगनेवाले मोदी को या कांग्रेस की बचीखुजी इज्जत भी लुटानेवाले राहुल गांधी को? परीक्षा उस पाटीदार समाज की भी है जिनकी संस्कृति में वल्लभभाई पटेल जैसे श्रेष्ठ नेताओं की परम्परा है। आत्मनिर्भरता के आधार पर अपना व गुजरात का विकास करनेवाला पाटीदार समाज और सीडी द्वारा घर घर पहुंचे हार्दिक पटेल को वोट देगा?
 
पटेल-पाटीदार समाज आंदोलन एक सामाजिक आंदोलन है। इसका राजनीति से कोई सम्बंध नहीं है यह कहते हुए कांग्रेस को अनुकूल माहौल बनाते हुए अपना राजनीतिक भविष्य निश्चित करने की मंशा रखनेवाले हार्दिक पटेल को पाटीदार समाज क्या वोट देगा? परीक्षा तो इस पटेल-पाटीदार समाज की है।
 
गुजरात के विकास और राष्ट्रीय विकास के मुद्दे पर मोदी गुजरात की जनता से जिस तरह से वोट मांग रहे हैं उसी तरह से कांग्रेस अपने कामों का हवाला देकर वोट मांगे तो उनके पास नोटबंदी, जीएसटी, आरक्षण और जातिपाति के सीमित मुद्दों के अलावा अन्य कोई मुद्दे ही नहीं है। ऐसी स्थिति में पारस्पारिक वैचारिक मतभिन्नता रखनेवाले हार्दिक, अल्पेश, जिग्नेश जैसे लड़कों के सहारे बचकाने राहुल गुजरात की जनता से वोट मांग रहे हैं। गुजरात की जनता इन बातों को जानती है। अतः परीक्षा मोदी की नहीं, गुजरात की जनता की है। उनसे मिला प्रत्युत्तर केवल गुजरात ही नहीं, बल्कि देश का भविष्य निर्धारित करनेवाले २०१९ के चुनावों में निर्णायक साबित होनेवाला है।