सफाई, कचरा प्रबंधन और वैज्ञानिक ड्रेनेज
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:०३-नवंबर-२०१७
यह एक कड़वी सच्चाई है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक सफाई, स्वास्थ्य, कचरे का प्रबंधन, वैज्ञानिक ड्रेनेज जैसी बातें किसी भी सरकार के एजेंडे पर या प्राथमिकता पर नहीं रहीं| न किसी केंद्र सरकार के, न किसी राज्य सरकार के| लिहाजा, केंद्र की मोदी सरकार जरूर कचरे और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है|

 
बारिश के मौसम में हम कई खतरनाक बीमारियों को बढ़ते हुए देख रहे हैं| जैसे एंसेफेलाइटिस, डेंगू, चिकनगुनिया, मलेरिया, स्वाइन फ्लू आदि| हर साल बारिश के शुरू होते ही इनके फैलने की खबरें आने लगती हैं| साथ ही इन बीमारियों के कारण मरने वालों की संख्या भी बहुत होती है| पहले इन बीमारियों की खबरें केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ भागों से आती थीं| लेकिन अब, असम जैसे दूर-दराज के राज्यों में भी डेंगू फैलने की खबरें मिलती रहती हैं|
हाल ही में हमने गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल हॉस्पिटल में ७० बच्चों की मृत्यु की खबर सुनी और देश सुन्न रह गया| जांच करने पर पता चला कि किस तरह अस्पताल प्रशासन, डॉक्टर और सप्लायरों की मिलीभगत ने छोटे-छोटे बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया और उनकी जानें गईं| दोष का सारा ठीकरा स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख पर फोड़ देना काफी नहीं होगा| यह कोई पहली घटना नहीं है| अगर हम थोड़ा पीछे जाएं, तो देखते हैं कि पिछले कई दशकों से इस इलाके में, इस प्रकार की मौतें होना, एक आम बात है| सबसे बड़े दुःख की बात यह है कि इतने वर्षों में किसी भी सरकार ने इसकी गहराई में जाकर जांच करने का कष्ट नहीं किया और न ही किसी प्रकार के स्थायी समाधान के लिए कोई कोशिश की| यह एक कड़वी सच्चाई है कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक सफाई, स्वास्थ्य, कचरे का प्रबंधन, वैज्ञानिक ड्रेनेज जैसी बातें किसी भी सरकार के एजेंडे पर या प्राथमिकता पर नहीं रहीं| न किसी केंद्र सरकार के, न किसी राज्य सरकार के|
मोदी सरकार के २०१४ में सत्ता में आने के बाद जरूर कचरे और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ी है| यह जागरूकता कुछ हद तक देश भर में सफल भी हुई है और इसी विषय पर लोग सरकार से बहुत उम्मीद कर रहे हैं| हमारा मत है कि जब तक जुर्माने और सजा के माध्यम से सख्त अनुशासन लागू नहीं किया जाएगा तब तक देश को गंदगी और कचरे से मुक्ति दिलाने का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा| छोटे और बड़े शहरों में सब से ज्यादा गंदगी फेरीवाले और दुकानदार फैलाते हैं| उन्हें कचरा सड़क पर फेंकने की आदत है क्योंकि सैंकड़ों सालों से वे सड़क पर ही कचरा फेंक रहे हैं| उसमें उन्हें कुछ गलत नहीं दिखाई देता| इसमें नगर पालिकाएं और नगर निगम भी उतने ही दोषी हैं क्योंकि उन्होंने भी कभी इसे रोका नहीं, न ही सख्ती से इस आदत को कभी बदलने की कोशिश की|
विकसित देशों में कचरा प्रबंधन
हाल ही में मैं अमेरिका में कुछ महीनों के प्रवास पर था और वहां के कचरा प्रबंधन को मैंने करीब से देखा| एक दिन मैं एक जैम की बरनी और दूध की प्लास्टिक बोतल को कचरे के डिब्बे में डालने जा रहा था| तभी मुझे एक व्यक्ति ने इन दोनों चीजों को साफ पानी से धोकर कचरे के डिब्बे में डालने को कहा| मुझे बताया गया कि ऐसा न करने पर चींटियां और कीड़े घर में घुस जाते हैं| यह एक ऐसा अनुशासन है जिसका हर अमेरिकी व्यक्ति पालन करता है| हमारे देश में अगर ऐसा करने को कहा जाए तो लोग आप पर हंसेंगे, क्योंकि हमें कभी भी इस तरह की आदतें विकसित करने के लिए नहीं कहा जाता| अमेरिका में अगर बच्चे घर में चींटी या कॉकरोच को देख लें तो यह बहुत बड़ी खबर बन जाती है और तुरंत सफाई कर्मचारियों को बुलवा कर वहां जंतुनाशक और कीटनाशक का स्प्रे कर दिया जाता है| हर सुबह लोग अपने कचरे के डिब्बे को तय समय और स्थान पर रखते हैं और कचरा उठाने वाली एजेंसी उन्हें उठा ले जाती है| सारा कचरा एक ही डिब्बे में नहीं डाला जाता है| बायोडिग्रेडेबल के लिए अलग डिब्बा, प्लास्टिक और धातु के लिए अलग और रिसायकल के लिए अलग|
दक्षिण के एक राज्य फ्लोरिडा में लगभग साल भर बारिश होती है| खास तौर से गर्मियों में भारी बारिश होती है| लेकिन यहां पांच मिनट के लिए भी पानी जमा नहीं होता है| सभी ड्रेनेज भूमिगत हैं| हमें पता भी नहीं चलता कि पानी कहां से जा रहा है| आप पूरे अमेरिका में घूमिये; देश भर में आपको यही अनुभव आएगा| हमारी सरकारें हजारों करोड़ रुपये इस समस्या पर खर्च करती हैं लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है| अगर भारत को विकसित देशों की पंक्ति में आना है तो इन सब बातों का पालन करना होगा| सालों साल से हमारे राजनेता और वरिष्ठ अधिकारी इन देशों में जा रहे हैं| कभी वहां की बातों को देखने और कभी अध्ययन करने| लेकिन आजतक एक भी राजनेता या अधिकारी ने वहां की प्रणालियों को भारत में लागू करने का प्रयत्न नहीं किया| वर्तमान की राजग सरकार ने जरूर कई ऐसे कदम उठाए हैं जो कि एक अच्छा संकेत हैं| लोग अब भी कई अपेक्षाएं लिए हुए हैं कि इस दिशा में कई बड़े कदम उठाए जाएंगे|
मुझे भारत भर में रेल और सड़क यात्रा के माध्यम से, लगभग हर मौसम में घूमने का अवसर मिला है| लाखों बार मैंने गांवों और शहरों में नालियां रुकी हुई देखी हैं या फिर कई जगह तो नालियां ही नहीं हैं जहां से पानी बह सके| अगर कहीं नालियां हैं भी तो उनमें कचरा डाल-डाल कर उन्हें जाम कर दिया गया है| पानी और मल का बहाव रुक गया है| विशेषकर ग्रामीण इलाकों में अब भी ड्रेनेज सिस्टम जैसी कोई चीज़ ही नहीं है और खुले में शौच करना, गंदा पानी, मल और कचरा आपको जहां-तहां दिख जाएगा| लगभग सभी नालियां कचरे से भरी हुई हैं जो पानी के बहाव को रोकती हैं और बाढ़ का कारण बनती हैं| निचले इलाकों में ये सब अस्वास्थ्यकर गंदगी, प्लास्टिक, कचरे का जम जाना नज़र आता है| वहीं दूसरी ओर गैरेज से ऑइल का निकलना, फैक्ट्रियों से कचरा और खतरनाक रसायनों का बहना, ये सब भी अंततः पानी के बहाव को रोक देता है| छोटे और बड़े शहरों में बड़े बड़े कचरागाह बना दिए गए हैं जहां न जाने कितने सालों से कचरा जमा किया जा रहा है, वह भी आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की चिंता किए बिना|
शायद प्रशासनिक और राजनैतिक लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कभी कोई आएगा और समाज की सारी गंदगी को साफ़ करेगा|
छोटे और बड़े शहरों के ड्रेनेज सिस्टम में से ९५% अवैज्ञानिक हैं| अवैज्ञानिक का मतलब यह है कि ये ड्रेनेज सिस्टम बनाने वाले इंजीनियरों ने यह नहीं सोचा कि जब भारी वर्षा होगी तो कितना पानी यह ड्रेनेज सिस्टम बहा ले जा सकेगा| उनके पास ऐसे कोई आंकड़े नहीं थे या उन्होंने कभी मौसम विभाग से ये आंकड़े नहीं लिए कि किसी इलाके विशेष में अगर चार-पांच घंटे लगातार भारी वर्षा होती है तो इस ड्रेनेज सिस्टम को कितना पानी बहा ले जाना होगा| उसकी क्षमता कितनी होनी चाहिए, इस बात पर उन्होंने कोई विचार नहीं किया| बिना किसी अध्ययन के उन्होंने अपनी इच्छा और मर्ज़ी के अनुसार ड्रेनेज बना दिए| परिणामस्वरूप छद्म-बाढ़ और पानी का भर जाना शहरों में एक आम बात हो चुकी है|
हमारे मत में, यही सब बातें भारी वर्षा के मौसम में बीमारियों का कारण हैं| हर साल हम देखते हैं, सुनते हैं और पढ़ते हैं कि हजारों लोग इन बीमारियों से मर रहे हैं और कई लोग मरने की कगार पर हैं| हज़ारों करोड़ों रुपये हमारी सरकारें इसकी रोकथाम के लिए खर्च कर रही हैं| जैसा कि हम जानते हैं, उत्तर प्रदेश और बिहार इस समस्या से सबसे ज्यादा पीड़ित हैं| हम इस ओर इन राज्यों की सरकारों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं| अगर उनमें इन खतरनाक बीमारियों से लड़ने की इच्छाशक्ति हो तो ऊपर दिए गए उपाय करने होंगे| सरकारों को ग्रामीण सड़कों, वैज्ञानिक ड्रेनेज का निर्माण और कचरे का उचित प्रबंधन करने के लिए परियोजनाएं लानी होंगी| अंत में रेल मंत्री और रेल अधिकारियों का हृदय से धन्यवाद जिन्होंने रेलों और प्लेटफार्म को साफ़ रखने की दिशा में बहुत अच्छा काम किया है, विशेषकर दक्षिण के राज्यों में|