संघ की संकल्पना
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:१४-अक्तूबर-२०१७
संघ दो स्तंभों पर खड़ा है, सिद्धांत और स्वयंसेवक। इसमें स्वयंसेवक का मह़त्व बहुत अधिक है, इसलिए अधिक है कि वह संघ अपने जीवन में जीता है। संघ जीने वाले ऐसे लाखों स्वयंसेवक सारे देशभर में हैं। उनके संपर्क में आने वाले लोग उनके व्यवहार से संघ को समझते हैं।

 
राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ की कथा एक बीज का वटवृक्ष कैसे बना इसकी कथा है। बीज डॉ. हेडगेवार जी का जीवन है और वृक्ष है पूरे देशभर में और विश्व में फैला संघकार्य। अपने-आप में यह एक अचंभे में डालने वाली घटना है। विश्व का सब से बड़ा एनजीओ है आरएसएस।
डॉ. केशव बलीराम हेडगेवारजी ने विजयादशमी के शुभ मुहुर्त पर १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण किया। संघ क्या है? संघ क्या करना चाहता है? संघ की विचारधारा क्या है? संघ का लक्ष्य क्या है? आदि सारे विषयों के उत्तर डॉ. हेडगेवार जी जानते थे। जिनको साथ लेकर उन्होंने संघ की शुरुआत की, वे सभी इस व्यापक दर्शन को जानते थे ऐसा नहीं है। कुछ तो बालक ही थे, इसलिए उनके विषय में यह संभावना नहीं थी। लेकिन जो समवयस्क थे वे डॉक्टरजी के विचारों को समग्रता से जानते थे ऐसा नहीं है लेकिन उनके प्रेमपूर्वक व्यवहार का अनुभव करते थे। इसी कारण वे डॉक्टरजी के कार्य के साथ जुड़ गए थे।
संघ जैसे अनोखे संगठन के पीछे बहुत लंबी और गहरी सोच है। समाज के सूक्ष्म चिंतन का विचार है, यद्यपि डॉ. हेडगेवार संघ के संस्थापक हैं फिर भी व्यापक अर्थ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का निर्माण समाज की अपनी आंतरिक शक्ति के द्वारा हुआ है। यह समाज की निर्मिति है, ऐसा मानना पड़ता है। डॉ. साहब कहते हैं कि इस संघ के निर्माता स्वयंसेवक हैं, इसीलिए समाज के पूर्व इतिहास के पन्नों को आंकना चाहिए।
धर्म में सुधार करने का प्रयास भारत के अनेक सुपुत्रों ने अपने-अपने ढंग से किया। राजा राममोहन रॉय ने ब्राह्मोे समाज की स्थापना की। स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना की। महात्मा फुलेजी ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। स्वामी विवेकानंदजी ने वेदांती समाज की संकल्पना रखी और डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की शरण ली।
समाज के बुनियादी दोष निवारण करने के प्रयास इन समाजों के माध्यम से होने लगे। लेकिन हर मार्ग अपने ढंग से सत्य होते हुए भी समग्र समाज के दोषों का निवारण करने में उनको कामयाबी नहीं मिली। उनका यश सीमित रहा...
* उपरोक्त धर्म सुधार के आंदोलन समग्र हिंदू समाज का संगठन करने में कामयाब नहीं हुए।
* अलग पंथ और उपासना पद्धति बन गई।
* हिंदू समाजांतर्गत संगठन हो गए।
* हिंदू समाज के अंदर उनकी अलग पहचान बन गई।
* हम सब एक है, इस भावना के बजाए वे और हम ऐसी भावना बन गई।
समाज के इस इतिहास को ध्यान में रख कर डॉ. हेडगेवार जी के कार्य का अवलोकन करना पड़ता है। डॉ. हेडगेवार जी के कार्य की शुरुआत एक अनुभूत सिद्धांत से होती है। यहा पर ‘अनुभूत’ शब्द का बहुत बड़ा महत्व है। पुस्तकों से जानकारी प्राप्त होती है, जिसे हम ज्ञान कहते हैं। ज्ञानी पुरुष के सहवास के कारण जो प्राप्त होता है, उसे भी ज्ञान कहते हैं, लेकिन अनुभूत ज्ञान चिंतन, मनन, निजी उत्कट इच्छा के कारण आता है। डॉक्टर जी का ज्ञान इस प्रकार का अनुभूत ज्ञान है। यह अनुभूत ज्ञान एक वाक्य का है, ‘यह हिंदू राष्ट्र है।’
डॉ. हेडगेवारजी का जीवन इसी महान सिद्धांत को व्यवहार में लाने का जीवन है। डॉ. हेडगेवार जी का वर्णन ‘हिंदू राष्ट्र का सगुण साकार रूप’ इन शब्दों में करना पड़ता है। (Personification of Hindu Rashtra)
हिंदू राष्ट्र यह डॉ. हेडगेवार जी का दर्शन है। यह कोई किताबी सिद्धांत नहीं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का यह पहला दार्शनिक सिद्धांत है। (First principle of RSS)
संघ को हिंदू राष्ट्र निर्माण करना है, यह गलत बात है। यह हिंदू राष्ट्र है इस धरातल पर संघ खड़ा है। कुछ नया निर्माण करना नहीं है।
डॉ. हेडगेवार कहा करते थे कि, यह हिंदू राष्ट्र है, यह कोई नया विचार नहीं। मैं सनातन विचार को ही आपके सामने रख रहा हूं। हमें हिंदू राष्ट्र की अनुभूति करनी चाहिए। इस सत्य को समझना चाहिए। अनुभूति करने के संघ शाखा रूपी एक तंत्र का विकास डॉ. हेडगेवारजी ने किया, यह उनकी महान खोज है। संघ शाखा के कार्यक्रम हिंदू समाज के लिए मिनिमम कॉमन प्रोग्राम है। शाखा में कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं होता। भगवा ध्वज का वंदन होता है और भारत मां का जयघोष होता है। व्यक्ति का जयजयकार नहीं, किसी उपासना पद्धति का स्वीकार नहीं। जो गुण हिंदू समाज के अंदर उत्पन्न होने चाहिए जैसे कि देशभक्ति, समाजभक्ति, चारित्र्य निर्माण, अनुशासन, आज्ञा पालन, समर्पण भाव, शाखा में भिन्न-भिन्न कार्यक्रमों से निर्माण किए जाते हैं।
हिंदू समाज के संदर्भ में डॉ. हेडगेवार जी का अनोखापन इस प्रकार है-
१) उन्होंने समग्र समाज के संगठन का लक्ष्य रखा।
२) समाजांतर्गत संगठन नहीं खड़ा करना है।
३) इसलिए नया पंथ या अलग पहचान हमें नहीं बनानी है।
४) उन्होंने कहा- हमें नया कुछ करना नहीं है, कार्य सनातन है। सनातन विचार को ही पुनर्जागृत करना है।
५) अपने वैश्विक त़त्वज्ञान को व्यवहार में जीना है, और उसे सामाजिक जीवन में लाना है।
६) समाज, देश, राष्ट्र प्रथम बाद में मैं।
७) हमें धर्म रक्षण करना है। जो धर्म का रक्षण करता है, उसकी रक्षा धर्म करता है। धर्मो रक्षति रक्षित:।
८) धर्म क्या है? धर्म यानी एक दूसरे के साथ भाईचारे का बर्ताव। हम सब भारत मां की संतान हैं। कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं।
९) संघकार्य का बुनियादी आधार निरपेक्षता और स्वार्थरहितता रहेगी।
१०) निरपेक्ष प्रेम कार्य का आधार रहेगा।
११) धर्म की रक्षा कर संगठित, समर्थ, अजेय समाज की रचना करना और उसके आधार पर राष्ट्र को परमवैभवशाली बनाना यह लक्ष्य।
१२) किसी के विरोध में काम नहीं करना है। सब को साथ लेकर सब का स्नेह प्राप्त करके काम करना है। अपनी प्रशंसा करने वाले भी अपने हैं, और विरोध करने वाले भी अपने हैं। ऐसी व्यापक भावना रख कर काम करना है।
डॉ. हेडगेवार जी ने अखिल भारतीय संगठन की नींव रखी। उन्होंने सामान्य व्यक्तियों में असामान्य गुणों की निर्मिति की। संघकार्य पूरे देशभर में ले जाने वाले कार्यकर्ता ऊंचे घराने के, राजनीतिक परिवार के, धार्मिक परिवार के, या सधन परिवार के सदस्य नहीं थे। मध्यमवर्गीय परिवारों के युवकों में उन्होंने संघ के बीज बोये। इस प्रकार का कार्य इसके पहले शायद ही कोई कर पाया होगा।
* डॉ. हेडगेवार जी का जीवन राष्ट्र के साथ एकात्म बोध का जीवन है।
* उनका जीवन सभी के साथ आत्मीय व्यवहार का जीवन है।
* उनका जीवन चौबीसो घंटे केवल समाज की चिंता करने का जीवन है।
* निरंतर सेवाभाव यह उनके जीवन का लक्षणीय पहलू है।
* वे स्वार्थरहितता का सर्वश्रेष्ठ आदर्श थे।
* इन दैवी गुणों के संपर्क में आनेवालों में शक्तिपात करने की उनकी अद्भुत क्षमता थी।
* उनके कहने पर युवकों ने अपनी करियर छोड़ कर और अंजान प्रदेश में जाकर संघकार्य प्रारंभ किया।
* देशव्यापी संगठन की उन्होंने बुनियाद रखी।
नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग में १९४० में उनका अंतिम बौद्धिक वर्ग हुआ। सुनने वालों के जीवन में आमूलाग्र परिवर्तन करने वाले जितने वैश्विक भाषण हैं, उनमें से यह एक अतिश्रेष्ठ भाषण है। इस भाषण को जिन्होंने सुना उन्होंने अपने जीवन का प्रथम कार्य संघकार्य बना दिया।
डॉ. हेडगेवार जी का निधन १९४० में हो गया। अंतिम समय में उन्होंने संघकार्य का दायित्व माधव सदाशिव गोळवलकर तथा श्रीगुुरुजी के कंधों पर डाला। श्रीगुरुजी ने इसका निर्वहन ३३ सालों तक जीवन की आखरी सांस तक किया।
डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी के व्यक्तित्व में बहुत अंतर है। डॉ. हेडगेवार जी सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। श्रीगुरुजी की पृष्ठभूमि आध्यात्मिक रही है। वे मेधावी छात्र थे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में वे प्राध्यापक थे। वही पर उनका संघ से संबंध आया। विद्यार्थियों ने ही उनको गुरुजी यह नामकरण दिया था। नागपुर में उन्होंने कुछ समय वकालत करने का प्रयास किया। लेकिन आध्यात्मिक लगन होने के कारण वे किसी को बिना बताए बंगाल में विवेकानंदजी के गुरुबंधु स्वामी अखंडानंदजी के सारगाछी आश्रम में जा पहुंचे। वहां पर उन्होंने आध्यात्मिक साधना की।
स्वामी अखंडानंदजी के देेहावसन के बाद वे नागपुर लौट आए। स्वामी अखंडानंदजी ने अपने अंत:काल में उनके पश्चात शिष्यों को भिन्न-भिन्न दायित्व का बंटवारा किया। श्रीगुरुजी को कोई दायित्व नहीं दिया। क्यों नहीं दिया? यह पूछने पर स्वामी अखंडानंदजी ने कहा, गोलवलकर यहां नहीं रहेगा। वह नागपुर जाएगा, और डॉ. हेडगेवार जी का काम करेगा।’
डॉक्टरजी के अंतिम तीन वर्षों में गुरुजी उनके साथ रहे और बहुत नजदिकी से डॉक्टरजी का अध्ययन किया। डॉक्टर साहब कोई विद्वान तो थे नहीं, गुरुजी जैसे असंख्य ग्रंथों का उनका अध्ययन भी नहीं था। वे कभी किसी के साथ बहस भी नहीं करते थे। फिर भी उनके साथ चर्चा होने के बाद मन की सभी शंकाएं समाप्त हो जाती थीं। श्रीगुरुजी ने उसका अनुभव किया।
एक बार डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी डॉक्टर साहब से मिलने आए थे। डॉक्टरजी से वे किसी विषय पर चर्चा करना चाहते थे। डॉक्टर साहब बीमार थे, श्रीगुरुजी ने उनके साथ चर्चा की, उनके प्रश्नों के उत्तर दिए। फिर भी उनका समाधान नहीं हुआ। अंत में डॉक्टर साहब से वे मिलने के लिए गए। श्रीगुरुजी ने जो कहा वही सारी बातें डॉक्टर साहब ने कह डाली। डॉ. श्यामाप्रसाद जी का समाधान हो गया। श्रीगुरुजी सोचने लगे कि, डॉक्टर साहब में ऐसा क्या सामर्थ्य है, जिसके कारण उनकी बातों से समाधान होता है। डॉक्टर साहब ने उसका उत्तर दिया - अपने ध्येय के प्रति त्याग, तपस्या, समर्पण से वाणी में सामर्थ्य पैदा होता है।
आगे चल कर श्रीगुरुजी आध्यात्मिक गुरुजी नहीं रहे। वे संगठन शास्त्र के गुरुजी बन गए। डॉ. हेडगेवार जी के महान भाष्यकार बन गए। डॉ. हेडगेवार जी की हिंदू राष्ट्र की संकल्पना को उन्होंने ३३ साल तक परिभाषित करने का प्रयास किया। राष्ट्र यानी क्या? राज्य यानी क्या? राष्ट्रीयता यानी क्या? राष्ट्र की संस्कृति क्या होती है? संस्कृति के मूलगामी घटक कौन से होते हैं? भारत माता यह विश्वजननी का ही एक रूप कैसे है? भारत माता की जीवन संकल्पना क्या है? (लिव्हिंग ऑर्गनिज्म) वर्ण, जाति, भाषा, प्रांत, पंथ आदि का क्या करना चाहिए? इन सब का विचार हम कैसे करें? हिंदू संगठन का विश्वव्यापी लक्ष्य क्या है? मनुष्य अपने अस्तित्व से ही सृष्टि के साथ किस प्रकार एकात्म है? जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य क्या होना चाहिए? संगठन का मतलब क्या है? धर्म क्या है? परधर्मियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए? राष्ट्र- जीवन में उनका स्थान क्या है? ऐसे असंख्य प्रश्नों का उत्तर श्रीगुरुजी ने अपने अनेक बौद्धिक वर्गो में से दिया।
वे महान वक्ता तो थे ही, लेकिन विचार देने वाले वक्ता भी थे। उन्होंने ३३ साल तक भारत का हर साल में दो बार भ्रमण किया। संघ कार्य का विस्तार उन्होंने देश के कोने कोने में किया।
उनके जीवन का सब से कठिन कालखंड १९४८ में सरकार द्वारा संघ पर पाबंदी लगाने का कालखंड था। इस पाबंदी के कारण संघ के बारे में समाज के मन में गलत एवं विकृत धारणाएं निर्माण की गईं। संघ को समाज से तोड़ने का प्रयास किया गया। पाबंदी काल में संघकार्य बंद था। श्रीगुरुजी सहित लगभग ८० हजार स्वयंसेवक कारागृह में थे। अनेकों की नौकरियां चली गईं, अनेकों के घरबार ध्वस्त किए गए। संघ का स्वयंसेवक बनना यह मानो अपराध है, ऐसी भावना बनाई गई।
श्रीगुरुजी के नेतृत्व की कसौटी का यह सारा कालखंड है। और वे काल की कसौटी पर खरे उतरे हैं।
* वे निर्भय और निड़र रहे।
* उन्होंने अन्याय, अत्याचार करने वालों की कोई आलोचना नहीं की।
* यह अपना समाज है, आज भूल से वह गलती कर रहा है, उसके साथ लड़ाई, झगड़ा नहीं करना चाहिए।
* उन्होंने एक मंत्र रखा कि, हम एक सौ पांच है। वयं पंचाधिकं शतम्।
* अपने चारित्र्य से समाज को जीत लेना चाहिए।
* व्यक्तिगत चारित्र्य और संगठन का चारित्र्य शुद्ध और पवित्र रहना चाहिए, उसमें किसी भी प्रकार का कॉम्प्रोमाइज नहीं करना चाहिए।
श्रीगुरुजी के चारित्र्यबल के कारण उनका नेतृत्व संघ स्वयंसेवकों में श्रद्धा का विषय बना। श्रीगुरुजी का शब्द यानी अंतिम शब्द ऐसी मानसिकता स्वयंसेवकों की बनी, उन्होंने जो कहा वह पूरा करके रहेंगे ऐसी कार्यप्रेरणा स्वयंसेवकों में जगी। अत्यंत कठिन कालखंड में श्रीगुरुजी की वाणी के कारण, गुरुजी के संपर्क के कारण, और श्रीगुरुजी के स्नेहभाव के कारण हजारों कार्यकर्ता सारे देशभर में विपरीत परिस्थिति में कार्य में जुटे रहे।
संघकार्य के बीज को वृक्ष के रूप में खड़ा करने में श्रीगुरुजी का अपना एक योगदान है। उनके ही कार्यकाल में विभिन्न संस्थाओं का निर्माण हुआ। उनका वर्गीकरण इस प्रकार से किया जा सकता है।
* जनसंगठन - १) भारतीय जनसंघ २) भारतीय मजदूर संघ ३) अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ४) वनवासी कल्याण आश्रम ५) विश्व हिंदू परिषद और ६) अखिल भारतीय किसान संघ
* प्रसारमाध्यम - १) पांचजन्य २) आर्गनायझर ३) मराठी विवेक ४) गुजराती साधना ५) कन्नड विक्रम ६) मल्यालम केसरी ७) तरुण भारत ८) स्वदेश इत्यादि वृत्तपत्रों का निर्माण्। ९) हिंदुस्थान समाचार इस वृत्तसंस्था का गठन।
* आर्थिक क्षेत्र - १) सहकार क्षेत्रों में बैंकों की निर्मिति उदा. जनता सहकारी बैंक पुणे, राजकोट नागरी सहकारी बैंक इत्यादि।
* विदेश विभाग - विदेश में जहां-जहां हिंदू बसा है उनके संगठन का प्रयास श्रीगुरुजी के कालखंड में ही शुरू हुआ और इस काम के लिए प्रचारक लक्ष्मणराव भिडेजी को नियुक्त किया गया।
* प्रचारक व्यवस्था - डॉक्टरजी के जीवनकाल में अनेक कार्यकर्ता पूरा समय देकर संघ का काम करते ही थे। श्रीगुरुजी ने संघ स्वयंसेवकों को आवाहन किया कि, अपने जीवन का कुछ समय, कुछ साल देशकार्य के लिए देने चाहिए। पढ़ाई खत्म होने के बाद, अच्छी शैक्षणिक गुणवत्ता हासिल करने के बाद कुछ साल संघकार्य के लिए समर्पित करने चाहिए।
प्रचारक का मतलब होता है, चौबीस घंटे संघ काम करने वाला संघ कार्यकर्ता। बहुतांश प्रचारक इस प्रचारक जीवन में शादी नहीं करते, उनका निजी परिवार नहीं होता। प्रचारक का मतलब होता है, संघ जहां भेजेगा, और जो काम करने को कहेगा वह काम अपनी पूरी शक्ति लगा कर करना। प्रचारक को निजी विकल्प नहीं होता। वह संघ की इच्छा के अनुसार काम करता है।
प्रचारक समाज के हित के काम ही करते रहता है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए गए हैं। इन लक्षणों का प्रचारक अपने जीवन में अनुसरण करता है। वह लोगों से भागता नहीं, सदैव लोगों के साथ ही रहने की कोशिश करता रहता है। संसार में रह कर भी संसार से अलिप्त ऐसी मानसिकता उसे बनानी पड़ती है। यह एक प्रकार की आध्यात्मिक साधना है। इस साधना का साधन संघ की रोज चलने वाली शाखा है।
श्रीगुरुजी रोज चलने वाली शाखा पर निरंतर बल देते रहे। कार्यकर्ताओं का भरणपोषण करने का सामर्थ्य दैनंदिन शाखा में है, ऐसी उनकी अनुभवसिद्ध वाणी थी। अनेक प्रकार के श्रेष्ठ गुण श्रीगुरुजी में थे। फिर भी वे अपने को एक सामान्य स्वयंसेवक ही कहा करते थे। कार्यकर्ता छोटा-बड़ा कोई भी काम करने वाला हो, वह प्रथम संघ का स्वयंसेवक है, इसे उसे कभी भूलना नहीं चाहिए। इसके कारण कार्य का और संघ का नाश करने वाले दुर्गुण जैसे अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष स्वयंसेवक में पैदा नहीं होते। एक मन बना कर, एक दिशा में चलने का सामर्थ्य संगठन में पैदा होता है।
इस प्रकार डॉक्टरजी ने जो संघ श्रीगुरुजी को सौंपा था उसे बलवान बना कर, अभेद्य बना कर, एकसंघमानस बना कर उन्होंने आगे बढ़ाया। यह भी अपने-आप में एक अद्भुत कार्य है। संघ के जन्म के दशक में विभिन्न विचारधारा के आंदोलन भारत में शुरू हुए। १९२५ में कम्युनिस्ट पार्टी बनी। १९२० से कांग्रेस का गांधीकरण हो गया और गांधीवाद का जन्म हुआ। १९२४ से ही डॉ. आंबेडकर जी का आंदोलन प्रारंभ हो गया। कम्युनिस्ट पार्टी बिखर गई, कांग्रेस भी कई बार टूटी और डॉ. आंबेडकर जी का आंदोलन फ्रैगमेंट हो गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे १९२५ में था वैसे आज भी है। संगठन को एक अभेद्य कवच देने का कार्य श्रीगुरुजी ने किया।
श्रीगुरुजी के कालखंड में जो प्रचारक व्यवस्था बनी उनमें से अनेक प्रचारकों ने संघ बीज के एक-एक पहलू का अपने जीवन में विस्तार किया है। श्री एकनाथजी रानडे जी ने विवेकानंद शिला स्मारक का निर्माण कर पूरे भारत में समाज कार्य के लिए जीवनव्रती कार्यकर्ता निर्माण किए। श्री दत्तोपंत ठेंगडी जी ने भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, विद्यार्थी परिषद आदि संगठनों की वैचारिक नींव रखी। मजदूर क्षेत्र में हिंदुत्व के वैचारिक धरातल पर संगठन खड़ा किया जा सकता है, और वह देश का क्रमांक एक का संगठन हो सकता है, यह दत्तोपंत ठेंगडी जी ने सिद्ध कर दिखाया।
विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से देश की धर्म शक्ति को, धर्माचार्यों को, संगठित करने का कठिन कार्य किया गया। अनेक धर्माचार्य अपने मठ-मंदिरों में ही बंदिस्त थे, वे अपने संप्रदाय के बारे में ही सोचा करते थे, उनको वहां से बाहर निकाल कर पूरे समाज के प्रश्नोें का विचार उन्होंने करना चाहिए ऐसा एक व्यापक विषय श्रीगुरुजी ने रखा था। श्री दादासाहब आपटे जी ने अपना पूरा जीवन लगा कर विश्व हिंदू परिषद को खड़ा करने का प्रयास किया।
पूरा जीवन लगा कर काम करने वाले संघ के प्रचारक एक मायने में डॉक्टर और श्रीगुरुजी के छायारूप होते हैं। मोरोपंत पिंगले, भाऊराव देवरस, यादवराव जोशी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, नानाजी देशमुख, हो.वें. शेषाद्रि, भास्करराव कलंबी, लक्ष्मणराव भिडे, बाबासाहब आपटे, लक्ष्मणराव इनामदार, रज्जुभैया, सुदर्शनजी आदि प्रचारक और उनका कार्य संघ बीज को वृक्ष में परिवर्तन करने का कार्य है। प्रत्येक का कार्य संघकार्य होते हुए भी उनका योगदान, उनकी कार्यशैली यह भी एक स्वतंत्र अध्ययन का विषय है। जैसे सूर्य प्रकाश एक होता है, उसका रंग सफेद होता है, लेकिन वह सात रंगों का मिल कर बनता है। इसी प्रकार इन प्रचारकों का कार्य है। इसे समझे बिना संघ समझ में नहीं आता।
श्रीगुरुजी के प्रयत्नों के कारण कर्नाटक के उडुपी में १९६९ को धर्माचार्य संमेलन हुआ। इस संमेलन में हिंदू समाज के विभिन्न पंथों के धर्माचार्य उपस्थित थे। उन्होंने प्रस्ताव पारित किया कि, धर्म का और अस्पृश्यता का कोई संबंध नहीं है, यह एक सामाजिक रुढ़ि है, और उसे दूर करना चाहिए। हिंदू धर्म के इतिहास में भी यह एक क्रांतिकारी घटना है।
श्रीगुरुजी का देहावसान १९७३ में हुआ। उसके बाद श्री बालासाहब देवरस सरसंघचालक बने। बालासाहब जी के बारे में श्रीगुरुजी कहा करते थे कि, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार जी को नहीं देखा होगा, उन्हें बालासाहब जी को देखना चाहिए। बालासाहब जी यानी हेडगेवार जी का एक रूप है। सरसंघचालक बनने के बाद बालासाहब जी ने अपने पहले भाषण में कहा था कि, ‘मेरे सामने देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं का संघ है।’
डॉ. हेडगेवार जी के कालखंड में संघ का दोहरा दृष्टिकोण था। देश परतंत्र था। उसे स्वाधीन करना था। संघकार्य देश को स्वाधीन करने के लिए है ऐसी भूमिका डॉ. हेडगेवार जी ने रखी। लेकिन दीर्घकालीन सोच के तहत देश को स्वाधीन कर परमवैभव की अवस्था तक उसे पहुंचाना है। परमवैभव का मतलब होता है सभी ऐहिक सुखसाधनों की परिपूर्ति तथा मानवी जीवन के पारलौकिक कल्याण का विचार। इसलिए प्रार्थना में शब्द आते हैं- समुत्कर्ष निःश्रेयस। यह प्रार्थना संघस्वयंसेवक रोज करता है। मतलब अपने ध्येय का स्मरण वह रोज करता है।
श्रीगुरुजी के कालखंड में देश स्वाधीन हो चुका था। ऐसे में अनेक ज्येष्ठ कार्यकर्ताओं के मन में भी प्रश्न आया कि अब संघकार्य की आवश्यकता क्या है? शाखाकार्य चलाने की आवश्यकता क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर श्रीगुरुजी ने अपने कालखंड में समाज के सामने रखे। उसका सारांश यह है कि स्वाधीन देश का स्व-तंत्र होना चाहिए। हमारे राष्ट्रीय जीवन की रचना हमारे सनातन जीवन मूल्यों के आधार पर और वैश्विक मानवता के विचार के आधार पर करनी चाहिए। इसे ही हिंदुत्व कहा गया है। यह कोई मजहबी विचार नहीं है। इस विचार को एकात्म मानव दर्शन के माध्यम से पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने रखा है।
श्रीगुरुजी का कालखंड संघ को समाज के हर क्षेत्र में ले जाने का कालखंड है। संघ को क्षेत्रव्यापी करने का कालखंड है। इसलिए अनेकानेक संगठनों का निर्माण किया गया। जड़ में अपनी प्राचीन मूलभूत सोच आधुनिक काल के संदर्भ में परिभाषित करने का प्रयास सभी क्षेत्रों में हुआ है। किसी भी विदेशी विचार के आधार पर राष्ट्र पुनर्निर्माण का विचार नहीं हो सकता है। अगर ऐसा प्रयास किया जाता है तो उसके परिणाम अच्छे नहीं दिखेंगे। इसलिए संघ ने कभी समाजवाद, पूंजीवाद, प्रजातांत्रिक समाजवाद की परिभाषा को स्वीकार नहीं किया। अपने विकास का और सर्वांगीण उन्नति का अपना स्वतंत्र मार्ग होना चाहिए। श्रीगुरुजी ने इस विषय पर सर्वाधिक बल दिया है।
श्रीगुरुजी के निधन के बाद संघ के क्रमबद्ध विकास का (प्रोगेसिव अनफोल्डमेंट) तीसरा दौर शुरू होता है। संघ को समाजव्यापी करने का यह कालखंड है। बालासाहब सरसंघचालक बनने के बाद आपात्काल की स्थिति का प्रथम आह्वान देश और संघ के सामने खड़ा हुआ।
इलाहाबाद हायकोर्ट का फैसला आने के बाद इंदिरा गांधी ने २५ जून १९७५ को आपात्काल की घोषणा कर दी। ४ जुलाई १९७५ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाई गई। बालासाहब देवरस समेत हजारों संघकार्यकर्ताओं को बंदी बनाया गया।
बालासाहब जी येरवडा जेल में थे। तब उन्होंने आपात्काल की स्थिति के संदर्भ में मीमांसा करने वाले दो वक्तव्य दिए। पहला वक्तव्य था - यह लंबी लड़ाई है और जिसका दम अधिक है वह यह लड़ाई जीतेगा। दूसरा बयान था-एक सरसंघचालक जेल में है लेकिन पांच सरसंघचालक बाहर हैं। वे आंदोलन को चलाएंगे। आपात्काल के दौरान संघ का भूमिगत कार्य एक जबरदस्त कार्य है। इंदिरा गांधी को करारा झटका देने वाला एक प्रसंग इस प्रकार है। विदेश में जनजागृति करने के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी जी को भेजा गया था। वे सांसद थे। इंदिरा गांधी ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। उनको माधवराव मुल्ये जी ने भारत में बुला कर संसद में उपस्थित रहने को कहा। संसद में उपस्थित रह कर उन्होंने कुछ वक्तव्य दिया। संसद से जैसे ही वे बाहर निकले गायब हो गए। इंदिरा गांधी के लिए यह करारा झटका था।
डॉ. हेडगेवार जी ने सब को साथ लेकर चलने की शिक्षा दी है। उन दिनों जितने भी राजनीतिक दल थे वे सभी संघ के कड़े विरोधक थे। फिर भी इन सभी दलों को लेकर एक कॉमन फ्रंट बनाना चाहिए ऐसा निर्णय हुआ और इसमें जो बाहर कार्यकर्ता थे जैसे कि दत्तोपंत ठेंगडी जी, माधवराव मुल्ये जी, भाऊराव देवरस जी, रज्जुभैया आदि सभी ने अथक प्रयास कर आपात्काल के खिलाफ अखिल भारतीय जनसंघर्ष समिति का गठन किया। नानाजी देशमुख उसके सचिव थे। उनको हिरासत में लेने के बाद संगठन कांग्रेस के रवींद्र वर्मा इसके सचिव बने। यही संघर्ष समिति आगे चल कर जनता पार्टी बनी। इस पार्टी में जनसंघ का विलय हो गया। और, इसी जनता पार्टी ने १९७७ के चुनाव में इंदिरा गांधी को परास्त किया। आपात्काल समाप्त हुआ।
संघ को समाजव्यापी बनाने में आपात्काल की अवधि एक महत्वपूर्ण कालखंड है। इस आपातकाल में १) भारत का संविधान २) नागरिकों के मूलभूत अधिकार और ३) प्रजातंत्र खतरे में आ गया था। इसकी रक्षा के लिए संघ ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। श्रीगुरुजी के काल में जो पाबंदी आई थी उसे हटाने के लिए संघ को संघर्ष करना पड़ा। दूसरी पाबंदी हटाने के लिए संघ ने संघर्ष नहीं किया, संघर्ष प्रजातंत्र की रक्षा के लिए किया। पहली पाबंदी में समाज संघ के विरोध में खड़ा था। दूसरी पाबंदी में समाज संघ के साथ जुड़ गया। संघ के क्रमबद्ध विकास में परिस्थिति का यह मौलिक अंतर है।
बालासाहब देवरस जी के कालखंड में संघ को समाजव्यापी करने के अनेक आंदोलन खड़े किए गए। वे इस प्रकार मीनाक्षीपुरम के धर्मांतरण के बाद दो विषय राष्ट्रीय सूची पर आए। पहला विषय हिंदू समाज के पिछड़े वर्ग की स्थिति और उसमें शीघ्र गति से परिवर्तन लाने की आवश्यकता। और दूसरा विषय था पेट्रो डॉलर्स की सहायता से इस्लामीकरण का जो प्रयास चलता है उसे रोकना। जनजागृति हेतु देश के प्रमुख स्थानों में विराट हिंदू संमेलनों का आयोजन किया गया। विश्व हिंदू परिषद को सही अर्थ में जनसंगठन बनाने की दृष्टि से अनेक कर्तृत्ववान कार्यकर्ताओं को विश्व हिंदू परिषद का जिम्मा सौंपा गया। मोरोपंत पिंगले जी और अशोकजी सिंघल इन पर प्रमुख रूप से यह दायित्व था। एकात्मता यात्रा और गंगामाता यात्रा जैसी देशव्यापी यात्राओं का आयोजन कर संपूर्ण हिंदू समाज में जनजागरण करने का अभूतपूर्व प्रयास हुआ। हिंदू समाज के इतिहास में इस प्रकार से हिंदुभाव जागृति का यह कार्य क्रांतिकारी प्रयास था।
रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की शुरुआत १९८६ से होती है। १९९० की कार सेवा और १९९२ की कार सेवा ऐसे इसके दो मह़त्वपूर्ण पड़ाव हैं। १९९० की कार सेवा के समय लालकृष्ण आडवाणी जी ने देशव्यापी रथयात्रा निकाली थी। इस यात्रा के दो मह़त्वपूर्ण संदेश समाज में गए। पहला संदेश - हम हिंदू हैं और हिंदू होने पर हमें गर्व होना चाहिए। और हमारी आस्थाओं का रक्षण हमें ही करना है। दूसरा संदेश था। हिंदू समाज को अपनी राजनीतिक ताकत प्रजातंत्र के माध्यम से घनीभूत होकर व्यक्त करनी चाहिए। रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन ने सेक्युलरिज्म की बहस पूरे देश में छेड़ दी। जनुकीय (जेनेटिकली) दृष्टि से हिंदू सभी धर्मों का सम्मान करता है। सत्य एक है और उसे जानने के मार्ग अलग अलग हैं। हरेक व्यक्ति को अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता है। मेरा ही मार्ग सत्य है और अन्य मार्ग झूठे हैं इस बात को हिंदू स्वीकारता नहीं। इसलिए उसे सेक्युलरिज्म की शिक्षा देना गलत है। इस बात को धीरे-धीरे देश का बुद्धिजीवी वर्ग समझने लगा। संघ स्वयंसेवकों के सहभागिता के बिना कोई भी आंदोलन उसकी चरम सीमा तक जाना संभव नहीं था। स्वयंसेवकों ने आंदोलन में सहभागी होना चाहिए यही संघ की इच्छा थी।
दूसरा आंदोलन संघांतर्गत था। अब तक संघ का पूरा बल दैनिक शाखा और दैनिक शाखा से संबंधित कार्यक्रम, उपक्रमों पर था। संघ की आयु बढ़ रही थी। इसका मतलब यह था कि संघ में आने वाले स्वयंसेवकों की भी आयु बढ़ गई थी। बढ़ते आयु वाले सभी स्वयंसेवक दैनंदिन शाखा कार्य नहीं कर सकते लेकिन वे संघ के साथ जुड़े रहते हैं। संघ का कुछ ना कुछ काम करना चाहते हैं। यह संघ की पूंजी है। फिक्स डिपॉजीट में जैसी पूंजी रखी जाती है वैसी यह पूंजी है। इसे काम में लगाना चाहिए इसलिए सेवा कार्य का विषय आया।
स्वयंसेवकों को अपने रुची के अनुसार सेवा कार्य करने चाहिए। समाज की जो आवश्यकता है उसकी परिपूर्ति करने का कार्य करना चाहिए। इस विषय को बालासाहब जी ने सैद्धांतिक रूप से रखा। उस समय के सरकार्यवाह श्री हों. वे. शेषाद्रि जी ने इसको क्रियान्वित करने का देशव्यापी प्रयास किया। उत्तर भारत में पहले से ही विद्याभारती के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा काम खड़ा किया गया था। आपात्काल समाप्त होने के बाद सर्व शिक्षा अभियान चलाने का काम भी किया गया।
बालासाहब देवरस जी अपने प्रवास में अनेक सेवा कार्यों का अवलोकन करते थे। सांगली जिले का म्हैसाल प्रकल्प, पुणे की ज्ञानप्रबोधिनी, पुणे की स्वरूपवर्धिनी ऐसी संस्थाओं को उन्होंने भेंट दी। उन्हीं के कालखंड में सहकारी बैंकों का काम बढ़ने लगा। नए- नए बैंक खड़े होते गए। ऐसे बैंकों के कार्यक्रम में बालासाहब उपस्थित रहा करते थे। समाज की सेवा का यह भी एक माध्यम है यह उनकी सोच थी।
बालासाहब देवरस जी ने सामाजिक विषयों को संबोधित करना प्रारंभ किया। संघांतर्गत संघ के बौद्धिक वर्ग के माध्यम से सामाजिक विषयों को पहले से ही रखा जाता था। यह प्रथा डॉक्टरजी के कालखंड से है। लेकिन सार्वजनिक रूप से संघ की सामाजिक सोच को रखने का काम बालासाहब जी ने किया। १९७४ में पुणे के वसंत व्याख्यानमाला में उनका हिंदू संगठन और सामाजिक समता इस विषय पर भाषण हुआ। दलित प्रश्न, दलितों के विषय, आरक्षण, दलितेतर समाज को कैसे सोचना चाहिए इस पर बालासाहब देवरस जी ने बिलकुल स्पष्ट शब्दों में संघ की भूमिका रखी है। संघ की सामाजिक सोच का यह अत्यंत मह़त्वपूर्ण दस्तावेज है।
इस भाषण में बालासाहब जी ने डॉ. बाबासाहब आंबेडकर जी का गौरवपूर्ण उल्लेख किया है। अगर अस्पृश्यता गलत नहीं तो विश्व में कुछ भी गलत नहीं है, ऐसा मानना चाहिए। इन शब्दों में बालासाहब जी ने अस्पृश्यता के संदर्भ में भूमिका रखी। जातिभेद और वर्णभेद संपूर्णतः समाप्त होने चाहिए- इट मस्ट गो, लॉक, स्टॉक एंड बैरल- इन शब्दों में संघ की भूमिका रखी। आरक्षण आवश्यक है यह भी उन्होंने कहा। बाद में अन्य जगहों पर उन्होंने आरक्षण विषय पर जो एक प्रश्न बार-बार आता है कि आरक्षण कितने साल चलेगा? उसका उत्तर देते हुए कहा, आरक्षण कब तक रखना है यह इन्हीं बंधुओं को सोचना है। यह उनका विषय है और उस पर उन्हें ही निर्णय करना चाहिए।
बालासाहब देवरस जी ने जो सामाजिक दिशादर्शन किया। इसके कारण सामाजिक समरसता मंच का निर्माण हुआ। १९८३ में इसकी शुरुआत हो गई। उस समय समरसता इस शब्द का प्रयोग सोशल डिस्कोर्स में नहीं किया जाता था। आज इस शब्द के प्रयोग बिना सोशल डिस्कोर्स नहीं होता इतना परिवर्तन आया है। समरसता का मतलब होता है - मैं और तू में कोई भेद नहीं है, जन्म से कोई बड़ा नहीं और छोटा नहीं, हम सब आपस में भाईबहन है। इसलिए हमें आपस में व्यवहार करते समय बंधुभावयुक्त व्यवहार करना चाहिए।
संघ की सोच का एक सिद्धांत है - समग्र हिंदू समाज अपना है। हिंदू समाज के साधुसंत, विचारक, धर्मज्ञ आदि सभी हमारे हैं। वे किसी जातिविशेष के नहीं हैं अथवा पंथविशेष के नहीं हैं। सभी हमारे लिए श्रद्धेय और वंदनीय हैं। संघ में यह विचार भी पुराना है। इसीलिए प्रारंभिक काल में भारतभक्तिस्तोत्रम के माध्यम से पूरे भारतवर्ष के महनीय व्यक्तियों का प्रातःस्मरण किया जाता था। बाद में इसका नामकरण एकात्मता स्तोत्र हुआ और इसमें अनेक नए नामों का समावेश हुआ। जिसमें स्वातंत्र्यवीर सावरकर, ठक्करबाप्पा, महात्मा फुले, डॉ. बाबासाहब आंबेडकर आदि महापुरुषों के नाम आते हैं। इससे स्वयंसेवकों को एक दिशा मिलती है कि, सभी अपने हैं, मतलब पूरा समाज अपना है और समाज के साथ हमें जुड़ना चाहिए।
बालासाहब जी के कालखंड में संघ का क्षेत्रशः विकास बढ़ता गया। राजनीतिक क्षेत्र से लेकर सामाजिक, धार्मिक, विद्यार्थी, वनवासी क्षेत्र तक काम करने वाली संस्थाओं की शक्ति का विकास होता गया। दो प्रकार के परिवर्तन आए। पहला परिवर्तन संस्था बड़ी होने लगीं और दूसरा परिवर्तन संस्था को चलाने वाले कार्यकर्ता भी बड़े बनते गए। उदाहरण के तौर पर राजनीतिक क्षेत्र में काम करने वाली पार्टी का स्लोगन बन गया- अगली बारी अटलबिहारी। मतलब देश का अगला प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी बनेगा।
संस्था और व्यक्ति बड़े बनने के बाद पूर्वकाल में जो समस्या नहीं थीं, उन समस्याओं का सामना भी संघ को करना पड़ा। सभी संस्थाएं आपस में संघर्ष न करते हुए, आपसी ईर्ष्या न करते हुए, परस्पर स्नेह रखते हुए एक दिशा में कैसे बढ़े यह प्रश्न सामने आया। इस प्रश्न का निराकरण करने हेतु समन्वय समिति की संकल्पना आई।
समन्वय यह शब्द संघ की खोज नहीं, कई स्थानों पर इसका उपयोग किया जाता है। लेकिन संघ ने समन्वय इस शब्द को एक गहरा संगठनात्मक आशय दिया है। संघ में इसका मतलब होता है- १. परस्पर सहकार्य, २. अनुभवों का आदानप्रदान, ३. एक लक्ष्य की ओर जाना है इसका नित्य स्मरण, ४. क्षेत्र के अनुसार विचार अभिव्यक्ति की परिभाषा भिन्न रहेगी, कार्यक्रम भिन्न रहेंगे लेकिन लक्ष्य एक रहेगा ५. सभी संस्थाओं को राष्ट्रीय विषयों में सहमति बना कर काम करना है। ६. तात्कालिक लाभ के लिए विचारों से किसी तरह का समझौता नहीं करना चाहिए। समझौता न करने से जो नुकसान होगा उसे सहन करना चाहिए, लेकिन अपनी भूमिका पर अड़िग रहना चाहिए। ७. हम एक जैविक संगठन के अवयव हैं इसका स्मरण सदैव रहना चाहिए। हम सभी का कार्य अलग रहते हुए भी जीवनरस एक है इसे हमेशा याद रखना चाहिए। ८. आपस में अनौपचारिक संवाद के अवसर बनाने चाहिए और नित्य संवाद करते रहना चाहिए। इसी का नाम है समन्वय।
इस समन्वय पर संघ में बहुत बल दिया जाता है। बालासाहब जी ने इसका निरंतर आग्रह रखा है। वे कहा करते थे कि हमारे आपसी संबंध स्विच् ऑन/स्विच् ऑफ’ इस प्रकार के नहीं हो सकते हैं। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं की समस्याओं से हमें अवगत होना होगा। संघ के विचारानुसार कार्य करने वाली हरेक संस्था स्वतंत्र और स्वायत्त है। संघ इन संस्थाओं को चलाने का दायित्व नहीं ले सकता। संस्थाओं को उन्हीं कार्यकर्ताओं को चलाना है। छोटी-मोटी समस्या आती है तो आपस में बैठ कर उसका हल निकालना चाहिए। संघ के कार्यकर्ताओं के साथ सलाह-मशविरा हो सकता है। लेकिन निर्णय संघ के पदाधिकारी नहीं करेंगे। निर्णय उसी संस्था के कार्यकर्ताओं को करना है।
माध्यमों में संघ परिवार ऐसा शब्दप्रयोग किया जाता है। संघ को यह प्रयोग मान्य नहीं। परिवार का मतलब होता है एक मुखिया के अंतर्गत काम करने वाले लोगों का समूह। संघ के सरसंघचालक की भूमिका इस प्रकार की नहीं हो सकती है। बालासाहब जी ने इसे अनेक बार स्पष्ट किया था। उनका कहना था कि, हम संगठनशास्त्र में माहिर हैं, लेकिन राष्ट्र-जीवन के सभी प्रश्नों में हम निष्णात हैं ऐसा दावा हम नहीं कर सकते हैं। अर्थशास्त्र, मुद्राशास्त्र, विदेश व्यापार, परराष्ट्र-नीति, देश की अंतर्गत सुरक्षा नीति, विज्ञान- तंत्रज्ञान विकास ऐसे अनगिनत विषय विशेषज्ञों के होते हैं। जिनका इन विषयों में गहरा अध्ययन हैं वे ही इन विषयों में अधिकार वाणी से कुछ कह सकते हैं। संघ इन विषयों के संदर्भ में केवल कुछ दिशादर्शक बता सकता है, जैसे कि, हमारी अर्थनीति सभी की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली और सभी को आरोग्य प्रदान करने वाली होनी चाहिए इतना केवल संघ बता सकता है। इसे कैसे करना है यह उस क्षेत्र के लोगों का काम है। इसलिए संघ मार्गदर्शन करता है। अतः संघ संस्थाएं चलाता है, नागपुर से आदेश आने के बाद कार्य होता है आदि सारे विषय भ्रममूलक हैं। संघ के सिद्धांत एवं सोच से इनका कोई संबंध नहीं हैं।
डॉ. हेडगेवार जी के कालखंड में ही संघ और महिला यह विषय आया। संघ में महिलाओं को प्रवेश देना चाहिए ऐसी बात उस समय भी रखी गई। वर्धा की लक्ष्मीबाई केलकर जी का डॉक्टरजी से संवाद हुआ। डॉक्टर जी ने उनसे कहा कि, संघ जैसा महिलाओं का स्वतंत्र संगठन आप खड़ा कीजिए। संघ आपकी मदद करेगा। लक्ष्मीबाई केलकर जी ने राष्ट्र सेविका समिति इस नाम से महिलाओं के संगठन का कार्य प्रारंभ किया। इस संगठन का विस्तार पूरे देशभर में है और महिलाओं का यह एक सशक्त संगठन है।
बालासाहब जी के कालखंड में महिलाओं का विषय और आगे बढ़ा। भारतीय स्त्रीशक्ति यह एक नया संगठन खड़ा हुआ। संघ विचार से चलने वाली अन्यान्य संस्थाओं में भी महिलाओं का योगदान बढ़ने लगा। भिन्न-भिन्न जिम्मेदारियां लेकर सक्षमता से महिला वर्ग काम करने लगा। इसके कारण आगे चल कर महिला समन्वय का विचार सामने आया और महिला समन्वय की बैठकें भी होने लगीं। राष्ट्र कार्य में महिलाओं का योगदान कैसे बढ़े और अनेक सामाजिक प्रश्नों का हल निकालने में मातृशक्ति का योगदान क्या हो सकता है? इस पर चर्चा होने लगी।
संघ के संदर्भ में बालासाहब जी का एक और बड़ा योगदान है। डॉक्टरजी के कार्यकाल में संघ छोटा था। संघ के कार्यकर्ता भी आयु में छोटे थे। उन दिनों आयु में बड़े गिने जाने वाले कार्यकर्ता यानी डॉ. हेडगेवार, आप्पाजी जोशी, बाबासाहब आपटे जैसे इनेगिने कार्यकर्ता थे। संघ छोटा होने के कारण प्रश्न, चर्चा, बहस खुल कर होती थी। जैसे-जैसे कार्य बढ़ने लगा वैसे-वैसै चर्चा, बहस की आवश्यकता भी बढ़ने लगी। बालासाहब जी ने सरसंघचालक होने के बाद अपने प्रवास में प्रश्नोत्तरी का कार्यक्रम रखना आरंभ किया। विभिन्न सत्रों में कार्यकर्ता तरह-तरह के प्रश्न पूछते थे। कुछ प्रश्न संघ के सिद्धांत के विषय में होते थे। कुछ प्रश्न तात्कालिक परिस्थिति और राजनीति के बारे में होते थे। कुछ प्रश्न संघ की कार्यपद्धति के बारे में हुआ करते थे। बालासाहब कोई भी प्रश्न नहीं टालते थे। चाहे तिरछा प्रश्न हो या बचकाना प्रश्न हो, वे हर प्रश्न का जवाब देते थे। एक कार्यकर्ता ने प्रश्न किया कि, एकचालकानुवर्तित्व यह तानाशाही है और संघ के सरसंघचालक को तानाशाह क्यों नहीं कहना चाहिए? बालासाहब ने उत्तर देते हुए कहा कि, एकचालकानुवर्तित्व का मतलब होता है जो संघ निर्णय करेगा वह निर्णय सरसंघचालक बताएंगे। संघ का कोई भी निर्णय समूह चिंतन से होता है। सरसंघचालक व्यक्तिशः कोई निर्णय नहीं करते हैं। इसको स्पष्ट करते समय उन्होंने डॉक्टरजी के कई उदाहरण दिए थे।
बालासाहब देवरस जी ने संघ को काल के अनुसार नई दिशा देने का प्रयास किया। संघ व्यक्ति पूजा में विश्वास नहीं करता। यह व्यक्तिवादी संगठन नहीं है। यह संघवादी संगठन है। सरसंघचालक होने के बाद पूर्व प्रथा के अनुसार डॉक्टर हेडगेवार, श्रीगुरुजी के साथ उनकी भी प्रतिमा लगानी चाहिए यह विषय आया तब बालासाहब जी ने कहा कि, डॉक्टर और गुरुजी को छोड़ कर अन्य किसी की भी प्रतिमा नहीं लगानी चाहिए। डॉक्टर और गुरुजी की इसलिए लगानी चाहिए क्योंकि वे दोनों महापुरुष थे और संघ की नींव उन्होंने ही रखी है। संघकार्य का आज का जो रूप है यह उन्हीं की देन है। उनकी तुलना में मैं छोटा हूं्। सरसंघचालकों की प्रतिमाएं संघ कार्यक्रमों में लगाने की प्रथा उन्होंने बंद करवा दी।
उनका दूसरा योगदान है कि अपनी मृत्यु के बाद दाह संस्कार कहां हो यह उन्होंने कार्यकर्ताओं को बताया। डॉ. हेडगेवार और श्रीगुरुजी का दाह संस्कार रेशीमबाग में हुआ। सरसंघचालक जी का दाह संस्कार रेशीमबाग में ही हो यह प्रथा नहीं बननी चाहिए। जहां पर आम आदमी का दाह संस्कार होता है वहीं पर मेरा होना चाहिए ऐसी इच्छा उन्होंने प्रकट की। अपने देश के नेताओं की मानसिकता को यदि हम याद करें तो दिखाई देगा कि यह एकदम अनोखा निर्णय है। डॉ. हेडगेवार और गुरुजी ने एक संस्कार किया कि, मैं प्रथम स्वयंसेवक हूं इस बात का हमेशा स्मरण रहना चाहिए। अपने लिए कोई विशेष बात नहीं मांगनी चाहिए। संघ में कोई भी स्वयंसेवक विशेष नहीं है, दायित्व छोटा-बड़ा हो सकता है लेकिन मूल भूमिका स्वयंसेवक रहने की ही है।
संघ की कथा यानी एक व्यक्ति द्वारा अपने जीवन के उदाहरण से संगठन कैसे गढ़ना चाहिए, उसके मूल्य क्या होने चाहिए, और यह संगठन स्वाभाविक रीति से एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी तक कैसे संक्रमित होना चाहिए इसकी कथा है। मूल संकल्पना में कोई बदलाव नहीं लेकिन काल के अनुसार आवश्यक उतने बाह्य परिवर्तन करते रहने चाहिए। श्रीगुरुजी और बालासाहब जी ने इसका एक रास्ता बनाया है।
संघ का स्वरूप जनता के सामने रखते समय इन तीन महापुरुषों के जीवन संदेश के साथ-साथ कुछ अन्य बातों का भी ध्यान रखना होगा। वे बातें इस प्रकार हैं-
क्या संघ तानाशाही में विश्वास करता है? इस प्रश्न का उत्तर है - नहीं। संघ का संगठन एकचालकानुवर्तित्व है। संघ के संगठन के लिए यह रचना उत्तम है। लेकिन देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए यह रचना उत्तम नहीं हो सकती है। राजनीतिक रचना प्रजातंत्र पर आधारित ही होनी चाहिए। देश का शासन कौन चलाए? इसका निर्णय जनता को करना चाहिए। यह व्यवस्था आज के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था है। संघ जैसी रचना राजनीति में हो यह संघ की सोच नहीं है।
प्रजातंत्र सफल होने के लिए कुछ बातों की आवश्यकता होती है। प्रजातंत्र प्रजा का राज है इसलिए प्रजा अर्थात आम आदमी सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से साक्षर होना चाहिए। उसका प्रशिक्षण निरंतर होते रहना चाहिए। संघ कार्यकर्ता समाज में होता है और समाज में रहते हुए समाज के विभिन्न प्रश्नों पर वह कभी लिखता है तो कभी बोलता है। इससे प्रशिक्षण की प्रक्रिया निरंतर चलते रहती है। जितनी अधिक मात्रा में प्रजा का इस प्रकार प्रशिक्षण होगा उतनी अधिक मात्रा में अपना लोकतंत्र सफल होगा।
संघ का कार्य एकचालकानुवर्तित्व के आधार पर चलता है। इसका मतलब यह नहीं कि संघ में बहस, चर्चा, अलग मत रखने की स्वतंत्रता नहीं होती है। हर विषय पर संघ में लंबी बहस चलते रहती है। सेवा कार्य संघकार्य का हिस्सा बने अथवा ना बने इस पर डेढ़ दो साल तक बहस जारी रही। अंत में संघ का निर्णय हुआ कि इस कार्य को करना चाहिए और संघ की व्यवस्था में उसे बिठाया गया। आपात्काल के पूर्व संघ ने मतलब संघ स्वयंसेवकों ने जो आंदोलन चल रहे हैं उनमें हिस्सा लेना चाहिए या नहीं इस पर भी लंबी बहस चलती रही। अंत में यह निर्णय हुआ कि, इस आंदोलन में हिस्सा लेना चाहिए। शाखा में अन्य धर्मियों को प्रवेश देना चाहिए अथवा नहीं इस बात पर भी लंबी बहस चलती रहती है। इस समय का निर्णय अन्य धर्मियों को संघ में लाने के विशेष प्रयास नहीं करना चाहिए और जो स्वेच्छा से आते हैं उनको आने देना चाहिए, इस प्रकार का रहा है।
निर्णय करने की संघ की अपनी एक पद्धति है। यह पद्धति सामूहिक चिंतन द्वारा एकमत से निर्णय करने की है। विषय कौनसा है इस पर सामूहिक चिंतन करने वाला समूह तय होता है। जैसे कि, राष्ट्रीय विषय है तो राष्ट्रीय समूह बनता है और स्थानीय विषय है तो स्थानीय समूह बनता है। वहां पर पक्ष-विपक्ष में चर्चा होकर सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर निर्णय किया जाता है।
संघ की अपनी एक परिभाषा है। इस परिभाषा में निर्णय संघ का होता है। किसी व्यक्ति का नहीं, जिसने विरोधी मत रखा है उसका अनादर नहीं किया जाता है। संघ में अनुशासन भंग पर कार्रवाई नहीं होती है; क्योंकि अलग मत रखने से कोई अनुशासन भंग नहीं होता है ऐसी संघ की मान्यता है। संघ का अंदरूनी ढांचा सहमति के प्रजातंत्र का है। जहां पर सभी प्रकार के विचार प्रवाह रखने की खुली छूट होती है। लेकिन अनुशासन यह होता है कि अंत में जो निर्णय होगा वह संघ का निर्णय होगा और उसी का ही क्रियान्वयन होगा।
संघ देश में यूनिफॉर्मिटी लाना चाहता है। यह देश की बहुविविधता के लिए (प्ल्युलरिजम) खतरा है, ऐसा आरोप लगाया जाता है। वास्तविकता क्या है? संघ का आग्रह राष्ट्र के संदर्भ में देश की सोच एक होनी चाहिए, इस प्रकार का है। यह सनातन राष्ट्र है, उसकी एक विचारधारा है। उसकी जीवन पद्धति है, उसके जीवन मूल्य हैं, उनकी रक्षा करनी चाहिए। इस यूनिफॉर्मिटी का संघ आग्रही रहेगा। लेकिन राजनीतिक दलों की विचारधारा कौनसी होनी चाहिए? उनका आर्थिक चिंतन कौनसा होता चाहिए? राष्ट्रीय प्रश्नों का हल निकालने के उनके मार्ग कैसे हैं? आदि बातों में उनकी यूनिफॉर्मिटी बन पाना कठिन है। प्रजातंत्र में अनेकानेक राजनीतिक दल रहेंगे, और वे रहने भी चाहिए। प्रजातंत्र की यह मूलभूत आवश्यकता है। एकदलीय प्रजातंत्र में संघ विश्वास नहीं करता।
देश विशाल होने के कारण और प्राकृतिक कारणों से भी देश के अंदर विविधता रहेगी। भाषा, रहन-सहन, पोषाख, खान-पान, रितीरिवाज, त्योहार आदि में विविधता रहेगी। यह विविधता ही अपना सौंदर्य है। इस विविधता के अंदर जो एकता है, उस पर संघ बल देता है और उसे सुदृढ़ करने का प्रयत्न करता है। पूरे देश में संघ कार्य समान है। लेकिन हर एक राज्य की विशेषता संघकार्य में भी आई है। वहां का संघकार्य वहां की प्रादेशिक भाषा में चलता है। हिंदी का दुराग्रह नहीं होता। किसी भी प्रकार से कोई विषय थोपने का संघ का प्रयास नहीं होता। विविधता यानी भेद नहीं, उनको भेद मान कर जो राजनीति करते हैं, या संगठन चलाते हैं, वे देश की सेवा नहीं करते, ऐसा संघ का मत है।
संघकार्य मुस्लिम और ईसाईयत के खिलाफ है, संघकार्य बढ़ने से इन धर्मावलंबी लोगों की जान खतरे में आ सकती है, इस प्रकार का एक आरोप किया जाता है। यह आरोप जब संघ नागपुर तक ही सीमित था, तब से प्रारंभ हुआ है। डॉ. हेडगेवार जी के अनेक मुस्लिम मित्र थे, और वे डॉक्टरजी की सहायता किया करते थे। डॉक्टर साहब ने अपने भाषणों में कभी भी इस्लाम या ईसाईयत पर कोई आघात नहीं किया। श्रीगुरुजी ने भी इस्लाम या ईसाईयत के श्रद्धास्थानों पर आघात नहीं किए। आपात्काल में जमाते-इस्लामी के अनेक मुसलमान कार्यकर्ता संघ कार्यकर्ताओं के बीच रहे। पहले उन्हें डर लगा कि, उनका क्या होगा? लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि, संघ स्वयंसेवक सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हैं। मुसलमान होने के कारण वे किसी का द्वेष नहीं करते।
संघ की यह सोच है कि, भारत में बसने वाले ईसाई और मुसलमान पूर्व काल में हिंदू थे। उनके पुरखे हिंदू थे। बालासाहब कहा करते थे कि, पूर्वकाल में आज के सब मुसलमान हिंदू थे। उन्होंने अपनी पूजा पद्धति बदल दी है। पूजा पद्धति बदलने से पुरखे नहीं बदलते। संस्कृति नहीं बदलती। इसका स्मरण मुसलमानों को रखना चाहिए। वे अल्लाह की उपासना करते हैं, और मस्जिद में प्रार्थना करते हैं, उससे हमें कोई आपत्ति नहीं। आम हिंदू की तरह उन्हें भी भारत को अपनी जननी मानना चाहिए और हम पहले भारतीय हैं, इसका गर्व रखना चाहिए। बालासाहब देवरस इंडोनेशिया का उदाहरण दिया करते थे। इंडोनेशिया में सब से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। उस देश के राष्ट्रपति का नाम था सुकार्णो याने के सु-कर्ण। उनके बेटी का नाम है, मेघावती। उनके बीस हजार के नोट पर गणेशजी का चित्र है। रामायण के वहां शो होते हैं। कलाकार मुस्लिम होते हैं। वे कहते हैं कि, इस्लाम यह हमारा मजहब है और रामायण हमारी संस्कृति है। हम मुसलमान बन गए इसका मतलब हमने अपनी संस्कृति छोड़ दी है ऐसा नहीं होता।
ईसाई लोगों के बारे में भी यही तर्क है। भारत के सभी ईसाई पूर्व काल में हिंदू थे। उनका धर्म परिवर्तन हो गया। धर्म परिवर्तन से संस्कृति परिवर्तन नहीं होना चाहिए। उपासना पद्धति परिवर्तन हो सकता है। परमेश्वर की पूजा करने की स्वतंत्रता हिंदू समाज ने सभी को दी है। एक ही देवता की पूजा करनी चाहिए ऐसी हिंदू समाज की मान्यता नहीं है। मूर्तिपूजा करने वाला भी हिंदू होता है और निर्गुण, निराकार की उपासना करने वाला भी हिंदू होता है, परमेश्वर को मानने वाला भी हिंदू होता है, न माननेवाला भी हिंदू होता है। इसी कारण पूजा पद्धति के विषय में हिंदू समाज के अंदर कोई झगड़ा नहीं है और इसी अर्थ में हिंदू सब से अधिक सेक्युलर है यह संघ की मान्यता है।
जिस प्रकार हिंदू एक जीवन पद्धति है, उस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यह भी एक जीवन पद्धति है। संघ को सिद्धांत के द्वारा नहीं समझा जा सकता। क्योंकि, हर सिद्धांत एक प्रति सिद्धांत को जन्म देता है, और फिर बहस चलती रहती है। उसका कोई अंत नहीं है। बहस करने वाले बहस करने में ही आनंद मानते हैं। ऐसी बहस से कोई लाभ नहीं होता। इसीलिए जिन्हें समाज में कुछ मौलिक कार्य करना है, परिवर्तन लाना है, ऐसे लोग अपने आपको बहस से बाहर रखते हैं, और वे कार्य में जुट जाते हैं। उनके लिए उनका कार्य यही सिद्धांत होता है। कार्य देखो और सिद्धांत समझो, ऐसी उनकी धारणा होती है।
संघ जीवन पद्धति है, इसका मतलब क्या है? जैसे कहा गया कि, संघ सिद्धांतों की शुष्क चर्चा नहीं करता। डॉ. हेडगेवार जी का कहना था कि, जो सिद्धांत व्यवहार में नहीं ला सकते उन सिद्धांतों को बांझ समझना चाहिए। हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि, हम जो बोलेंगे वहीं करेंगे। कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रहेगा। यह डॉक्टर साहब जी के विचार थे। मुख से बात करना कि जो कुछ है, वह ईश्वर का रूप है, और व्यवहार करते समय जाति के अनुसार करना, यह ढोंगबाजी है। संघ इस में विश्वास नहीं करता।
संघ की कथा सिद्धांत और उसको व्यवहार में लाने वाले सामान्य व्यक्ति से शुरू होती है। संघ दो स्तंभों पर खड़ा है, एक सिद्धांत और दूसरा स्वयंसेवक। इसमें स्वयंसेवक का मह़त्व बहुत अधिक है, इसलिए अधिक है कि वह संघ अपने जीवन में जीता है। संघ जीने वाले ऐसे लाखों स्वयंसेवक सारे देशभर में हैं। उनके संपर्क में आने वाले लोग उनके व्यवहार से संघ को समझते है।
एक उदाहरण से यह विषय समझ में आएगा। कुली सिनेमा की शूटिंग के दौरान फाइट का सीन करते समय अमिताभ बच्चन के पेट में एक कलाकार की फाइट लगी। उससे वे बेहोश हुए। चर्चा चली कि, अमिताभ को मारने के लिए ही किसी ने यह सुपारी दी थी। इस सिनेमा में विख्यात मराठी अभिनेता निलू फुले की भी भूमिका थी। उनसे जब पूछा गया, तो उन्होंने कहा, फाइट मारने वाले को मैं जानता हूं। वो ऐसा गंदा काम नहीं करेगा। क्योंकि वह एक संघ परिवार में बड़ा हुआ है। संघ के स्वयंसेवक के बारे में यह विश्वास सब जगह दिखाई देता है। आम जनता संघ को सिद्धांतों से कम जानती है, संघ स्वयंसेवकों के व्यवहार से जादा जानती है।
संघ सिद्धांत व्यवहार में लाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर जिस प्रकार स्वयंसेवक प्रयत्नशील रहता है, उसी प्रकार संस्था बना कर भी वह काम करते रहता है। महाराष्ट्र में इसके कई उदाहरण दिखाए जा सकते हैं। सामाजिक समरसता का आशय औरंगाबाद में हेडगेवार रुग्णालय के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। यह रुग्णालय संघ के कुछ स्वयंसेवक डॉक्टरों ने एकत्रित आकर अधिक लाभ की पर्वा न करते हुए, आम आदमी के स्वास्थ्य की चिंता करने के लिए आज से कुछ बीस साल पहले बनाया। उसके लिए डॉ. आंबेडकर ट्रस्ट का निर्माण किया गया, और इस ट्रस्ट के माध्यम से रुग्णालय का काम शुरू हुआ। ट्रस्ट का नाम आंबेडकर ट्रस्ट और रुग्णालय का नाम डॉ. हेडगेवार रुग्णालय रखा गया। नाशिक में इसी ट्रस्ट के माध्यम से श्रीगुरुजी रुग्णालय का निर्माण हुआ। समाज के सभी महापुरुष अपने हैं, यह बात संघ केवल बोलता नहीं तो संघ उस प्रकार का व्यवहार भी करता है। देशभर में ऐसे असंख्य उदाहरण मिलेंगे।
संघ स्वयंसेवक जहां कहीं जाता है, वहां कुछ ही दिनों में उसके व्यवहार के कारण यह संघ का स्वयंसेवक है, ऐसी उसकी छवि बन जाती है। लोग बोलचाल की भाषा में इसे यह आरएसएस वाला कहते हैं। आरएसएस वाला का मतलब होता है, वह अपने स्वार्थ की चिंता नहीं करता, सभी के साथ स्नेह का व्यवहार करता है, सामाजिक प्रश्न के विषय में जागृत रहता है, और अपने ढंग से और अपनी शक्ति के अनुसार ऐसे प्रश्नों के निराकरण की चिंता करते रहता है। उद्योग, कला, वाणिज्य, प्रशासन, पत्रकारिता, बैंकिंग, अनुसंधान इत्यादि असंख्य क्षेत्रों में स्वयंसेवक संघ मूल्यों के आधार पर अपना जीवनयापन करता है। इसके कारण लोग संघ को समझते हैं।
देश में जाति निर्मूलन पर बहुत बहस चलती रहती है। जाति समाज को बांटती है, और परस्पर अविश्वास का वातावरण निर्माण करती है, इसको दूर करना चाहिए, ऐसे भाषण अनेक लोग देते हैं। संघ इस पर भाषण नहीं देता लेकिन संघ के जन्मकाल से ही संघ के अंदर जातिभेद, वर्णभेद, अस्पृश्यता को कोई जगह नहीं है। वर्धा के शिविर में जब महात्मा गांधीजी आए थे, तब उन्होंने संघ स्वयंसेवकों को उनकी जाति के बारे में पूछा। महात्मा गांधीजी को यह ध्यान में आया कि, इस शिविर में हिंदू समाज के अस्पृश्य जाति के स्वयंसेवक भी हैं, और सभी एकसाथ रहते हैं, एकसाथ भोजन करते हैं। संघ में जातिभेद के लिए कोई जगह नहीं और अस्पृश्यता के लिए भी कोई जगह नहीं। संघ इस देश का एकमात्र ऐसा संगठन है, जिसमें स्वयंसेवक की पहचान उसकी जाति के आधार पर नहीं होती। संघ में उसकी इज्जत जाति के आधार पर नहीं होती और संघ में उसको अधिकार पद जाति के आधार पर नहीं मिलते। संघ में केवल गुण और क्षमता का ही विचार होता है। जाति निर्मूलन में संघ ने जो सफलता प्राप्त की है, वह अनुपमेय है।
जाति निर्मूलन का एक कारगर उपाय अंतरजातीय विवाह है। देशभर में संघ के स्वयंसेवक जितने अंतरजातीय विवाह करते हैं, शायद ही उतने अन्य किसी संगठन के सदस्य करते होंगे। अनुभव ऐसा है कि यह सभी विवाह सफल रहते हैं। संघ इसकी डिंगें नहीं हांकता। क्योंकि, यह प्रसिद्धि के लिए या अपने आपको प्रागतिक बनाने के लिए नहीं किया जाता। स्वाभाविक रीति से यह होना चाहिए, ऐसी संघ की मान्यता है। समाज परिवर्तन ढोल पीटने से या भाषणों से, आलोचना से नहीं होता। यह समाज मेरा है, समाज के सभी लोग मेरे हैं, हम में कोई श्रेष्ठ, कनिष्ठ नहीं है, इस विचार के जीवनयापन से ही समाज परिवर्तन संभवनीय है। इस विचार को अपने जीवन में अभिव्यक्त करना चाहिए, यही संघ की सीख है।