संतोष है! खुद पर विश्वास रखने का - प्रशांत कारुलकर
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:१४-अक्तूबर-२०१७
प्रशांत कारुलकर कंस्ट्रक्शन उद्योग का वह नाम है जिसने युवावस्था में ही अपनी बुद्धिमत्ता तथा ज्ञान के आधार पर व्यावसायिक बुलंदी को प्राप्त कर लिया है। अपने व्यवसाय का सम्पूर्ण ज्ञान होने के साथ-साथ प्रशांत सामाजिक संज्ञान भी रखते हैं। मृदुभाषी, सफल उद्योगपति तथा सदैव फॅशनेबल वेष परिधान करने वाले प्रशांत कारुलकर ने हिंदी विवेक से अपने व्यवसाय तथा वर्तमान सामाजिक परिस्थिति व युवाओं को मार्गदर्शन करने वाला वार्तालाप किया। प्रस्तुत है, उस वार्तालाप के कुछ अंश-

 
जब आपने व्यवसाय शुरू किया तो आपके मन में कौन सी संकल्पना थी?
जब मैंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की उसी समय देश में मोबाइल और इंटरनेट नया-नया आया था। इसलिए हमने उस समय के सर्वश्रेष्ठ कम्प्यूटर कोर्स के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कोर्स में दाखिला ले लिया। चूंकि पढ़ाई के बाद आधा दिन बचता था तो उस बचे समय के सदुपयोग के तौर पर हमने कम्प्यूटर की असेंबलिंग शुरू कर दी। साथ ही डोर टू डोर तथा कंपनी टू कंपनी मार्केटिंग शुरू कर दी। इससे हमारा नेटवर्क बढ़ा, साथ ही बिजनेस तो बढ़ा ही। उस समय हमारी उम्र काफी कम थी तथा लोग ब्रांडेड कंपनियों में विश्वास करते थे। इसलिए हमें लोगों को काफी कन्विंस करना पड़ता था। हमने अपने आपको बिजनेस में झोंककर एक बड़ी और ब्रांडेड कंपनी से बिजनेस ले लिया था। बाद में चिदंबरम के वित्तमंत्री बनने के बाद बाजार खुला हो गया तथा बाहर की तमाम बड़ी कंपनियां बाजार में आ गईं। उस आंधी में हमारे जैसे छोटे व्यवसायी बाहर हो गए। उस समय बैंकिंग और स्टॉक मार्केट स्क्रीन पर उभर रहे थे। हमने अपने आपको स्टॉक मार्केट तथा बैंकिंग की ओर मोड़ दिया। वह समय भारतीय तथा विदेशी दोनों कंपनियों के लिए स्वर्णकाल था। हमने उस वक्त का फायदा उठाया, बाजार को समझने की कोशिश की। वह वक्त हमारे लिए पैसा कमाने के साथ ही एक शिक्षण संस्थान की भांति हमेशा प्रशिक्षित भी कर रहा था। उस समय हमें एक बात समझ में आई कि चूंकि हमारा देश एक तेजी से आगे बढ़ रहा विकासशील राष्ट्र है अतः अगले २५ वर्ष निर्माण उद्योग के होंगे। तब हमने अपने आपको स्टॉक मार्केट के साथ निर्माण उद्योग की तरफ भी मोड़ दिया।
 
निजी स्वामित्व से शुरू हुई कम्पनी के अंतर्गत आज १७ कंपनियां हैं। इस साल हम हमारी सैंड कम्पनी का आइपीओ ला रहे हैं। हम अंबरनाथ में वर्ल्ड का सब से बड़ा प्लांट (संयंत्र) ला रहे हैं।
 
वर्तमान समय में आपके व्यवसाय का स्वरूप क्या है?
हम मूलत: निर्माण उद्योग से ही जुड़े हैं। १७ कंपनियां हैं। शैकडों कर्मचारी हैं तथा कुछ साझेदार हैं जिनमें कुछ अंतराष्ट्रीय भी हैं। हम ‘लैंड बैंक’ लेकर बड़े अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिल कर उन्हें विकास करने के लिए देतेे हैं। इस तरह के हमारे १६-१७ कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। छह- सात साल पहले हमने महसूस किया कि अगले पच्चीस साल निर्माण उद्योग के हैं क्योंकि हम एक तेजी से विकासरत मुल्क है। बाहर की तमाम कंपनियों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं पर नियंत्रण के अधिकार अपने पास रख रहे हैं। हमने एक छोटे स्तर पर रेत का प्लांट लगाया था जिसमें हम प्रति माह पचास हजार टन रेत का उत्पादन करते थे। यह इस तरह का भारत में इकलौता प्लांट था। नामचीन कम्पनी नेे हम से एक साल बाद ऐसा प्लांट डाला। हम इस चीज को लेकर लगातार शोध करते रहते हैं कि हमारे देश में कौन सी ऐसी तकनीक की कमी है जिसकी हमारे देश को आवश्यकता है। अब हम पांच लाख टन प्रति माह की क्षमता का विश्व का सब से बड़ा प्लांट डाल रहे हैं। मुंबई की रेत की पूरी मांग हमारी कंपनी से पूरी होगी। हमारी कम्पनी को ग्रीन सर्टिफिकेट भी मिला है। नदियों से निकलने वाली रेत समाप्त हो रही है। हमने कॉक्रिवॉल का भी प्लांट डाला है। यह एक आर्थोडॉक्स कंस्ट्रक्शन से है। हम केंद्र सरकार और वेदांत ग्रुप के साथ मिल कर ‘नंदघर’ नाम का प्रकल्प चला रहे है। जो माननीय नरेंद्र मोदी जी का महत्वपूर्ण सपना है। हम वेदांत ग्रुप के साथ मिलकर ११ राज्यों में चार हजार ‘नंदघर’ बना रहे है। साथ ही ‘बालवाडी‘ का भी आधुनिकीकरण किया है। मेडिकल फैसिलटीज, फूड फैसिलटीज समेत सभी सुविधाएं दे रहे हैं, बालवाडी में। हमारी तीसरी योजना ‘प्रीकास्ट प्लांट’ जो वसई में कार्यरत है। यह भी एक पैरेलल आर्थोडॉक्स टेक्नोलाजी है जो १९१०-१९२० के दशक से अमेरिका में प्रयोग की जा रही है। साथ ही स्टील प्लांट, ईंट उद्योग, एमएसडब्ल्यू जैसे आधुनिक महत्व के बिजनेस की तरफ हमारा पूरा ध्यान है।
 
समाज की आवश्यकता को ध्यान रख कर इस तरह के उत्पादन के विचार आपके मन में कैसे आए?
यह सब रिसर्च से पता चलता है। हमारे यहां चौथी पास से लेकर आइआइटी खड़गपुर व आइआइएम से निकले लोगों की टीम है। बहुत सारे रिटायर हो चुके सरकारी अफसरों को हमने रखा है। उनके दीर्घ अनुभव से हमें पता चलता है। साथ ही हम समाज से जुड़े हुए हैं। हम वास्तविक स्थितियों से ज़ुडे हुए हैं क्योंकि मेरे पिताजी किसान थे। इसी कारण हम रेत उद्योग को जान पाए। हमारी पूरी कोशिश है कि प्राकृतिक संसाधन बचें, समाज का फायदा हो तथा विकास भी हो। हमें नहीं समझ में आता कि लोग विदेश क्यों जा रहे हैं। वहां जाकर वे लोग मशीन बन जाते हैं; जबकि उनके मस्तिष्क का फायदा अपने देश को मिलना चाहिए। अगले दो दशकों में यदि हम अपनी विकासशील प्रवृत्ति, कौशल तथा सोच बदलेंगे तो हम विकसित राष्ट्र बन सकते हैं।
 
शिखर तक पहुंचने के दौरान तमाम कठिनाइयां व चुनौतियां आती हैं। आपके जीवन में ऐसे क्षण क्या आए हैं?
ऐसे तमाम मौके आए। मान लीजिए, हमने किसी प्रोजेक्ट पर रिसर्च किया और किसी बड़े कारपोरेट हाउस से सम्पर्क किया कि यह तकनीक, फायदा और अगले दस साल की बाजार की आवश्यकताएं हैं। हमारी इस तरह की तकनीक की कल्पना और किसी ने उठा ली। हम पर आरोप भी लगे तथा हमें बाहर कर दिया गया। उन सब चीजों से हम सीख रहे हैं। सामान्य परिवार से आने या विनीत स्वभाव के कारण नुकसान भी उठाने पड़े हैं। लेकिन उसके फायदे भी हैं। हम हर चीज के लिए तैयार हैं। हमें पता है कि जब तक कोई चीज पूरी नहीं हो जाती, हमारी नहीं है। लोग हमारी तकनीक चोरी कर सकते हैं पर हमारी वैचारिक ताकत को नहीं समाप्त कर सकते।
 
आप इस समय निर्माण उद्योग से जड़े हैं। निर्माण उद्योग पर RERA के प्रभाव को आप किस प्रकार आंकते हैं?
मैं इस क्षेत्र में लगभग १२ सालों से हूं जबकि मेरा सहयोगी ग्रुप लम्बे समय से इस उद्योग से जुड़ा हुआ है। RERA को लेकर मीडिया में जा आ रहा है या राजनीतिक टिप्पणी हो रही हैं, वह मेरी समझ से बाहर है। RERA तो MRTP कानून का परिमार्जित रूप है। जब ग्राहक का विश्वास बढ़ेगा तभी निर्माण उद्योग का विकास होगा। MRTP कानून में बहुत सारी खामियां थीं। उसमें बिल्डर से ग्राहक का पैसा निकालना बहुत कठिन था। पर RERA में जादा पारदर्शिता है। इसलिए इससे निर्माण उद्योग को अभूतपूर्व लाभ मिलने की सम्भावना है।
 
निर्माण उद्योग व भ्रष्टाचार एक दूसरे के पर्याय हैं, ऐसी लोगों की धारणा है। आपके क्या विचार हैं ?
फिल्मों मे दिखाया जाता था कि सामने वाला यकायक बिल्डर बन जाता है। बिल्डर यानी कि माफिया, क्रिमिनल, टेंडर मैनेज करने वाला, राजनीतिज्ञों को जेब में रखने वाला, कानून को तोड़ने-मरोड़ने वाला यह उसकी छवि थी। पहले बहुत सारी चीजें होतीं थीं पर पिछले तीन सालों में वर्तमान सरकार ने इतनी पारदर्शिता लाई है कि आपको किसी अधिकारी को ‘सम्हालने’ की आवश्यकता नहीं है। माफिया पूरी तरह से बाहर हो चुका है। सिर्फ सही व्यवसायी ही बाजार में टिके हुए हैं। अगर महाराष्ट्र की ही बात करें तो मुख्यमंत्री ने सी.सी. और ओ.सी. को लेकर जो ऑनलाइन की व्यवस्था कर दी है, वह उत्तम है। इससे काला धन और माफिया का घेरा टूट गया है। मैं यह नहीं कहता कि पूरी तरह समाप्त हो गया पर इसपर काफी हद तक अंकुश लग गया है।
 
इस स्थिती में आप स्वयं को कहां पाते हैं?
हमने शुरू से ही सोचा था कि आर्थोडॉक्स सिस्टम से कार्य नहीं करना है वरना हम ‘वन ऑफ द डम्प्स‘ बन जाएंगे। हमारा यूथ माइंडसेट हमेशा कहता था कि हमें कुछ अलग कार्य करना है। पहले दिन से ही हमने पालिसी बनाई थी कि गलत तरह के काम व मिस मैनेजमेंट के तहत कार्य कहीं करना है। ब्लैक मनी उधार लेकर कार्य नहीं करना है। नई सरकार की पारदर्शिता से मेरे जैसे लोग खुश हैं। आज बड़े बिजनेस हाउस तथा मेरे जैसे नए आदमी के लिए सेम एक जैसी अपार्च्युनिटी है।
 
जब आपने शुरुआत की थी तो आपके मन में क्या स्वप्न थे तथा आप इन सपनों के कितने नजदीक पहुंच पाए है?
बहु्त उम्दा सवाल है। १२ साल पहले मेरे मन में एक पैशन था। एक सोच थी कि कुछ करना है। सोच यही थी कि जहां-जहां कामर्शियल व सोशल फायदा हो, उसी क्षेत्र में जाना है। हमने पैशन व ड्रीम को एक किया तथा जो सहयोगी व भागीदार थे वे भी हमारे ही आयुवर्ग के थे। हम सोचते थे कि इन बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों की शुरुआत इसी तरह से हुई थी। उनकी शुरुआत २ या ३ पीढ़ियों पहले हुई थी। पर हमें इतना पता था कि संघर्ष तो करना ही है। हमें मंजिल नहीं पता थी, पर रास्ता पता था कि हमें किसी भी तरह चलते जाना है। हर असफलता में संभावना ढूंढ़नी है। मैं पीछे पलटकर नहीं देखता क्योंकि मुझे आगे की बहुत सारी चीजें देखनी हैं। देश समाज के लिए बहुत सी चीजें करनी हैं खुद के लिए भी। फिलहाल जो शैकडों लोगों का स्टॅाफ है तथा कही लोग बाहरी जुड़े हैं, उसे मुझे बढाना है। हम रोज सपने जी रहे हैं। रोज नए सपने आ रहे हैं तथा हम उन नए सपनों के पीछे भाग रहे हैं। एक स्वप्न के पूर्ण होने से पूर्व ही दूसरा स्वप्न दिखने लगता है।
 
आपसे बात करते समय आपमें अपार ऊर्जा झलकती है। इस ऊर्जा का स्रोत क्या है?
सर असफलता का डर नहीं है। निराशा नहीं है। हम बहुत बार हारे हैं। हमारे तमाम आइडियाज चुराए गए। हम बाहर निकाले गए। तकलीफ हुई पर मजा आया। इन सबसे बहुत कुछ सीखने को मिला। और बढिया ढंग से तथा मजबूती से आगे बढ़ेंगे। हमें अपनी कमजोरियां पता हैं। अगर पीछे चले गए तो वहां से फिर शुरुआत करने की क्षमता है। बिजनेस हो या कोई अन्य कार्य;यदि आप डरकर या किसी दूसरे व्यक्ति को दिखाने के लिए करते हैं तो असफल होंगे। अपका मुकाबला स्वयं से होना चाहिए। कल से बेहतर आज, आज से बेहतर कल। असफलता से डरे नहीं, इसलिए पाजिटिव एनर्जी अभी भी हैै।
 
किसी भी व्यवयास को आगे बढाने में कल्पनाशीलता तथा परिश्रम का महत्वपूर्ण योगदान होता है। आपके व्यवसाय में इनका क्या स्थान रहा?
परिश्रम को मैं प्लेटफार्म कहूंगा। परिश्रम से ही कोई भी सपना साकार हो पाता है। कल्पनाशीलता आपकी पाजिटिव सोच व पाजिटिव वाइब्रेशन से आती है, यदि आप सचमुच अपने समाज,अपने देश व अपने व्यवसाय के लिए कुछ करना चाहते हैं, तो कल्पनाशीलता आपको जगाती रहती है। क्रिएटिविटी समाज के विभिन्न वर्गो के साथ जड़ने से आती है, अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़े रहने तथा अपडेटेड रहने से आती है। उससे पता चलता है कि वर्तमान की आवश्यकता क्या है। व्यवसाय कहां जा रहा है? यही आपकी शिक्षा है, आपकी स्टडी है। मैं समझता हूं कि सिर्फ आराम करने वालों को भी परिश्रम करना पड़ता है।
 
व्यक्ति की सकारात्मकता का मूल्य स्रोत उसका परिवार होता है। इसलिए आप हमारे पाठकों को अपने परिवार के विषय में बताएं?
मैंने अपने दादाजी को नहीं देखा था, ब्रिटिशों ने एक किताब लिखी थी, ‘‘WHO IS IN INDIA‘‘ उसमें मेरे दादाजी का नाम था - तुकाराम चिंताराम करुलकर। मेरी दादी अंग्रजी जमाने की स्नातक थीं। जब उन्होंने ग्रेजुएशन किया तब वो विधवा थी। उन्होंने अपने परिश्रम से पढ़ाई की थी। फिर दहाणू के तलासरी में आदिवासियों के लिए विद्यालय बनवाया। वे बहुत सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ती थी। मेेरे पिता किसान थे। पर वे १९७५ में आपाताकाल में जेल गए थे। उसी समय मेरा जन्म भी हुआ था। मेरी मां १९६६ में ऑल महाराष्ट्र नर्सिंग काउंसिल में प्रथम स्थान प्राप्त किया थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में उनकी फोटो छपी थी। मेरा परिवार पढ़ा-लिखा तथा समाज से जुड़ा हुआ रहा है, मेरे बाबा संघ के कार्यकर्ता थे। दादी ने ठाणे जिले के आदिवासियों के लिए बहुत कार्य किया। उस समय के मुख्यमंत्री शरद पवार उन्हें सम्मान देने के लिए घर तक आए थे क्योंकि उनकी तबियत ठीक नहीं थी। उसी समय उन्होंने अपने यहां खेती तथा लोकल मार्केट भी विकसित किया था। उन्होंने सरकारी सेवा करते की अपेक्षा यह व्यवसाय शुरू करना आवश्यक समझा। वहीं से एक प्रेरणा मिली कि समाज के लिए करो और समाज को आगे बढ़ाओ। हम भी जमीन से जुड़े हुए हैं पर उसे आधुनिक रूप व तकनीक दे दी है। आज भी मेरी दादी के बनाए विद्यालय में उनके नाम से गणपति पूजन होता है। उन्होंने पूरी तीन पीढ़ी को समाज की मुख्य धारा मेें लाने का प्रयत्न किया।
 
मेरी पत्नी शितल का मेरे जीवनोत्कर्ष में महत्वपूर्ण योगदान है। उसने मेरे साथ कॉलेज में मेरी मित्र से लेकर मार्गदर्शक पत्नी तक की यात्रा की है। वह मूलत: गुजराती परिवार से होने के कारण व्यवसाय उसकी रगों में है। वह स्वयं बायोकेमेस्ट्री में उच्च शिक्षित है। उसका परिवारिक व्यवसाय फार्माटेक मशनरिज निर्मिती का है। परिवार की दूसरी पीढी के रूप में शितल यह व्यवसाय संभाल रही है। उसका विजन और एक्सपोजर बहुत स्ट्रंाग है। उसके दृष्टिकोण का उपयोग मुझे भी मिलता है। मेरी जीवन यात्रा में मैंने जो कुछ हासिल किया है उसमें शितल का सहभाग बहुत बडा है। वन क्षेत्र से बहुत सारी वनवासी लडकियों को शितल ने शिक्षा के लिए दत्तक लिया है। वृद्धाश्रम, अनाथालय, वनसर्ंवधन, गरीब जरूरतमंदों को दवा और ऑपरेशनहेतु शितल का हमेशा योगदान होता है।
 
आप युवा होने के कारण नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद युवाओं में क्या परिवर्तन देख रहे हैं?
पहले युवाओं के मन में राजनीति व राजनेताओं को लेकर चिढ़ व गुस्सा होता था। पिछले तीन वर्षों में मैं उस गुस्से को खत्म होते देख रहा हूं। युवाओं के मन में यह विश्वास जगा है कि यदि मैं अपने देश के लिए कुछ करना चाहूं तो अब यहां मुझे प्रोत्साहना मिलेगी तथा सम्मान मिलेगा। कुछ समय पहले तक जो स्थिति थी कि सरकार न तो काम कर रही थी व न ही हमें प्रोत्साहित कर रही थी। आज के युवा के लिए वह बात नहीं है। आज का युवा हमारे प्रधानमंत्री जी के भाषण सुनता है। उनकी भावभंगिमा को देखता है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का बदलता कद देखता है तो उसे गर्व महसूस होता है। यहां तक कि देश के बाहर बड़ी-बड़ी कंपनियों में ऊचे पदों पर बैठे युवा भी गर्वान्वित महसूस करते हैं। कि हमें एक ऐसा नेता मिल है जिसकी इस देश को आवश्यकता थी। आज लोगों के मन में राजनेता व सरकार के प्रति गौरव महसूस हो रहा है। युवाओं में एक विश्वास पैदा हो गया है। अगले दस वर्षों में हमारा युवा व्यवसायोन्मुखी होगा तथा हमारे देश की प्रतिभा बाहर जाने की बजाय देश में ही रहेगी। यह विश्वास हमारे प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जगाया है। अब हम व्यवसायियों को भी वैश्विक स्तर पर एक अलग इज्जत मिलती है। पहले हमें सरकार के नजरिए के प्रति विदेशी उद्योगपतियों को समझाना पड़ता था पर अब उन्हें भी लगता है कि सरकार साथ देगी। यह बड़ा बदलाव है।
 
क्या केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद निर्माण उद्योग में अच्छे दिन आए हैं?
निर्माण उद्योग बहुत फैला हुआ एवं बड़ा है। सरकार ने पहले उसके अंदर की गंदगी हटाने, कमियां दूर करने के प्रयास किए। इस तरह के परिवर्तन को क्रियान्वित करने में लगभग दो साल लग गए। बड़े-बड़े अपराधी और ब्लैक मेलिंग गिरोह इस उद्योग में सक्रिय थे। पहले आप फ्लैट खरीदने जाते थे तो ४० प्रतिशत ब्लैक तथा ६० प्रतिशत व्हाइट देना पड़ता था। इस तरह के मूल भ्रष्टाचार को समाप्त करने में ही दो साल लग गए। तीन-चार बड़े निर्णयों के बाद निर्माण उद्योग के अच्छे दिन शुरू हो गए हैं। जो वास्तविक व्यवसायी है, वह टिका हुआ है तथा खरीदार में भी एक भरोसे की भावना आई है।
 
आपकी बातों से लगता है कि आप व्यवसायी मात्र नहीं अपितु लगभग हर क्षेत्र के जानकार हैं। सरकार द्वारा लाए गए जीएसटी के लाभ-हानि पर आपका क्या नजरिया है?
लगभग २५ साल से जीएसटी का ढांचा तैयार हो रहा था। वर्तमान सरकार ने उसे लाने का साहस दिखाया। एक व्यवसायी के तौर पर कह सकता हूं कि जीएसटी बहुत जरूरी था। अंतरराष्ट्रीय कंपनियां बैंक वगैरह यहां आ रहे हैं। राज्य स्तर के कर का हर व्यवसाय पर काफी बुरा असर पड़ा। जीएसटी ने उसे सरल कर दिया। इसे आप ‘गुड्स एण्ड सर्विसेज टेक्स’ के बदले ‘गुड्स सरल टेक्स’ कह सकते हैं। इसने व्यवसाय को पुनर्स्थापित कर दिया है। इसका सकारात्मक प्रभाव आपको इसी वित्तीय साल में दिखाई पड़ जाएगा। जब साप केंचुल छोड़ता है तो दर्द होता है। हमें भी कुछ समय के लिए उस पीड़ा से गुजरना है। हम एक दिन में चमत्कार नहीं देख सकते हैं।
 
आठ महीने पहले नोटबंदी आई और फिर जीएसटी आया। उद्योग जगत पर इसके क्या परिणाम हुए?
नोटबंदी के बाद दो-तीन महीने के लिए व्यवसाय उद्योग सुप्तावस्था में चला गया था। भारत में दो तरह के व्यवसाय होते थे। पहला था कैश लेन-देन का व्यवसाय, जिसमें टैक्स होता ही नहीं। दूसरा वह जो हम जैसे टैक्स चुकाने वाले करते हैं। यह बहुत सही फैसला था। कैश के लेन-देन की जो समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही थी वह समाप्त हो गई। राजस्व बढ़ गया। एक पंक्ति में कहूं तो इससे छद्म अर्थव्यवस्था ने दम तोड़ दिया।
 
परिवर्तन के इस दौर में निर्माण उद्योग को कौन सी नीति अपनानी चाहिए?
एक कहावत है- Wait and watch अर्थात- रुको, पता करो, जल्दबाजी मत करो क्योंकि हम एक प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। कर्ई सालों से हमारी अर्थव्यवस्था संक्रमण के दौर से गुजर रही थी। भ्रष्टाचार बढ़ा हुआ था। राजनीतिक परिदृश्य उतना साफ नहीं था। लोगों का सरकार से विश्वास समाप्त हो गया था। नई सरकार उस माहौल में बदलाव कर रही है। निर्माण उद्योग ही नहीं, अपितु हर उद्योग के ईमानदार व्यवसायी खुश हैं। आने वाला समय बहुत अच्छा होगा, खासकर हमारी अगली पीढ़ी के लिए। अगले पांच वर्षों में हम भारत को एक बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देखेंगे।
 
आपकी सकारात्मक सोच ने आपको इस मुकाम तक पहुंचाया है। भारतीय युवाओं को सकारात्मक सोच रखने के प्रति क्या कहेंगे?
हमारे युवाओं में क्षमता तथा जोश है। यदि आप कुछ करना चाहते हैं तो आपको परिश्रम, कल्पनाशीलता और संयम रखना पड़ेगा। और सब से बढ़ कर जो चीज है, वह है धीरज। यदि आप इन सबके साथ-साथ संयम रखते हैं तो आपकी हर इच्छा पूरी होगी। जल्दबाजी के चक्कर में आपकी योग्यता बर्बाद हो जाती है। मैंने ऐसे कई युवाओं को देखा हैं, जिनमें बेहतर क्षमता है पर उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता है। आज के युवाओं के साथ सही बात यही है कि वे स्वयं से प्रतियोगिता करते है; जापानी कहावत है कि किसी को आगे बढ़ने के लिए तीन साल दो। खुद पर विश्वास रखो, सफलता अवश्य मिलेगी। हम ऐसी जगह पर खड़े हैं जहां अवसरों का भंडार लगा हुआ है।
 
दुनिया की जानकारी रखना अत्यंत आवश्यक है। दुनिया की सभी जानकारियां अपने पास होनी आवश्यक है। इसके लिए पढ़ना महत्वपूर्ण है। समसामयिक घटनाएं, इतिहास, टेक्नॉलाजी सभी बातों की जानकारी रखने के लिये पढिये। अपने आपको आगे रखने के लिए पढिए। जो मिले वह पढ़िये। अपनी भाषाओं के साथ ही दुनियाभर की भाषाओं को सीखने-समझने की कोशिश करें। मैं खुद दुनिया की १४ भाषाएं अच्छी तरह बोल सकता हूं। मेरी पर्सनालिटी का विकास करने मेंयह बहुत फायदेमंद रहा है। जिसका मुझे अपने आप मे विकास करने के लिए बहुत उपयोग हुआ है।
 
बातचीत की शुरुआत में आपने ‘लैंड बैंक’ की बात की। इस पर प्रकाश डाले?
यदि मैं मुंबई की ही बात करूं तो, तीन-चार पीढ़ियों पहले उत्तर भारत से लोग आए। उन्होंने व्यापार का एक फार्मूला तय किया था कि अपना ‘लैण्ड बैंक‘ बनाओ अर्थात अपनी जगह बनाओ। वे ‘लैंड बैंक’ बना कर अगली पीढ़ी के लिए छोड़ जाते थे तथा अगली पीढ़ी उस जगह का विकास करती थी। हमने उत्तर के लोगों से सीखा कि अपनी सम्पत्ति बनाओ। सम्पत्ति कई तरीकों से बनती है। हमारा कौशल, हमारी परिसंपत्तियां व जमीन हमारी संपत्तियां हैं। जिस जमीन में कोई समस्या है, हम उस जमीन को खरीद कर तथा समस्याओं को दूर कराकर अपनी कंपनी के अंतर्गत रख देते हैं। हमने मुंबई और आसपास के इलाकों में कुल लगभग १५०० एकड़ जमीन ‘लैंड बैंक’ के तौर पर रखी हुई है। उस जमीन को विकसित करने के लिए हम विदेशी कंपनियों तथा यहां की बड़ी कंपनियों के साथ मिल कर कार्य करते हैं। भारतीय बाजार (विकास, प्रबंधन, प्रशासन) प्रणाली पर चलता है। मानिए मेरी एक विशेषता है, दो लोग अन्य विशेषताएं लेकर आ रहे हैं तथा हम तीनों मिल कर काम कर रहे हैं। तीनों पर न कर्ज का दबाव होता है और न तो समय का दबाव रहता है तथा एक बेहतरीन चीज सामने आती है। प्रणाली के अंतर्गत हम जमीन के मालिक हैं। बाकी लोग पैसा या अन्य चीजें लेकर आते हैं तथा मिल कर कार्य करते हैं। यह बैंक और बड़ा होगा तथा पीढ़ी दर पीढ़ी चीजें चलती रहेंगी। यदि मैं न भी रहूं तो यह व्यवसाय चलता रहेगा। यह फार्मूला हम ने रतन टाटा जी से सीखा था। रतन टाटा जी ने एक बात कही थी कि ‘इंसान बड़ा मत बनाओ। कम्पनी बड़ी होनी चाहिए। इंसान कभी भी खत्म हो सकता है। पता चला कि आप पर एक दाग लग गया और आपकी कम्पनी खत्म। इसलिए स्वयं की बजाय कम्पनी को बड़ा बनाने पर जोर दो और हम इसी दिशा में कार्य कर रहे हैं। हमारे यहां जितने लोग जुड़े हैं वे सभी भागीदार हैं। कोई संडे नहीं, कोई छुट्टी नहीं। सफल व्यवसायियों की उपलब्धियों तथा उनकी गलतियों से हम सीखते हैं।
 
आपको कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। वे पुरस्कार किस संदर्भ में मिले? इस पर प्रकाश डालिए।
समाज अच्छी चीजों को ग्रहण करता है। आप मेरा साक्षात्कार ले रहे हैं, यह भी मेरा पुरस्कार है क्योंकि आप इसके माध्यम से मुझे हजारों लोगों तक पहुंचा रहे हैं। वैसे समाज से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर जब हमारी कम्पनी का खास नाम नहीं था उस समय हमने भारत का सब से बड़ जमीन सौदा किया था। हमने सहारा से जमीन खरीदी थी जिसमें सुप्रीम कोर्ट, सेबी इत्यादि शामिल थे। हमारा नाम इतना बड़ा नहीं था; जबकि हमारे सामने १६-१७ बड़ी कंपनियां थीं। इस खबर को हर समाचार पत्र ने प्रथम पृष्ठ पर जगह दी थी। इसके लिए मुझे उस साल का ‘लैंड बायर आफफ द ईयर’ सम्मान मिला था। इससे मेरी कंपनी की साख अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी काफी बढ़ गई थी। इसलिए यह अवार्ड मेरे बहुत करीब है। यह अवार्ड मुझे छत्तीस साल की उम्र में ही मिल गया था; जबकि सामान्यत: यह लोगों को ६० वर्ष की उम्र के बाद मिलता है।
 
अपने व्यवसाय के वर्तमान विस्तार के विषय बताइए।
हमारे कई कार्यालय हैं। भारत के अलावा दुबई, हांगकांग, सिंगापुर तथा अमेरिका में भी कार्यालय हैं। हम बैंकिग क्षेत्र में भी हैं। हमारा स्वयं का सहकारी बैंक है और गैर बँकिय वित्तीय कंपनी (NBFC) भी है। लैंड बैंक है। हम लोग हर क्षेत्र में फैले हुए हैं। एमएसडब्ल्यू से भी जुड़ रहे हैं। घन कचरे से हम उत्पाद बनाएंगे तथा वह घन-कचरे का निपटारा भी हो पाएगा। इसके लिए लंदन की वेस्टिन हाऊस कम्पनी के साथ रिसर्च चल रहा हैं। हम नगरपालिकाओं से कचरा लेकर पहले उसका शुद्धिकरण करेंगे। उसमें से बाइप्रोडक्ट के तौर पर डीजल, पेट्रोल तथा बिजली मिलेगी। यदि मुंबई शहर की ही बात करें तो डंपिंग की समस्या के कारण नए निर्माणों को सीसी नहीं मिल पा रहा है। यहां के विकास में कचरे का प्रबंध बाधक है, जो इस तकनीक से हल हो जाएगा। वैसे वर्तमान सरकार अपने स्तर पर कार्य कर रही है। सहारा ग्रुप से हमने जमीन खरीदी हुई है जैसा कि हमने पहले ही बताया है कि वह देश की सब से बड़ा ‘जमीन सौदा’ है। हमने वसई के पास उनकी जमीन ११११ करोड़ में खरीदी थी। उससे एक फायदा हुआ कि उनके जमाकर्ताओं को पैसे मिले तथा हमें वह जमीन मिल गई। उस पर विकास कार्य करने पर कंपनी को फायदा हुआ। जो कंपनियां कभी बड़ी खरीदार थीं पर अब कानूनी मुद्दों की वजह से उनकी जमीनें फंसी हुई हैं। ऐसे लोगों की जमीन खरीद कर हम लैंड बैंक बढ़ाने की कोशिश भी कर रहे हैं। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारी नाममुद्रा (ब्रांड) का मूल्य है।
 
कृषि हमारे देश का मूल आधार है। देश की ७० प्रतिशत से अधिक जनसंख्या खेती पर आश्रित है। मेरे पिताजी भी एक किसान थे। उन्होंने उस समय खेती को लेकर कुछ नए प्रयोग भी किए थे। मेरी समझ से आज के समय में देश की प्रमुखतम समस्या किसानों की आत्महत्या ही है। हम इस दिशा में शोध कर रहे हैं कि पोलैंड जैसे देशों की ही भांति अपने देश में भी खेती के क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाए। पोलैंड में जमीन बहुत कम है पर वहां के किसानों ने काफी प्रगति की है तथा वे काफी धनी हैं। मैंने स्विट्जरलैंड के किसानों को बीएमडब्ल्यू व मर्सीडीज से चलते देखा है। हमारे यहां सबकुछ होते हुए भी वह रचनात्मकता नहीं है, क्रियाशीलता नहीं है। हम इस दिशा में कार्य कर रहे हैं तथा काफी नजदीक हैं। यदि यह तकनीक अपना ली जाए तो किसानों की समस्या जड़ से समाप्त हो जाएगी। न तो कर्जमाफी की नौबत आएगी और न ही किसी अन्य प्रकार की छूट की। बस उन्हें जागरुक करना होगा। ताकि वे ज्यादा से ज्यादा अन्न उपजा सकें। इसका प्रयोग पहले हम स्वयं करेंगे तथा बाद में उसे पेटेंट करवाएंगे।
 
जब आपने उद्योग शुरू किया उस समय आपके पास कितनी पूंजी थी?
तीन हजार रुपये।
 
इसके साथ ही और कौन सी पूंजी थी जो आपको यहां तक लाई?
विश्वास, खुद पर भरोसा। हमने जिन-जिन लोगों के पास जाकर अपना प्रस्ताव समझाया, हमारी आवाज व हमारी सकारात्मक दृष्टि से हमारे प्रति उनका विश्वास कायम हो सका। यदि मैं खुद पर विश्वास नहीं करूंगा तो कोई अन्य व्यक्ति मुझ पर कदापि विश्वास नहीं कर सकता। आज के युवाओं से मैं कहता हूं कि खुद पर विश्वास रखो। वही आपकी सब से बड़ी पूंजी है।
 
आज इस मकाम पर खड़े होकर जब आप सिंहावलोकन कर १२ साल पीछे देखते हैं तो आपके मन में क्या भाव उत्पन्न होता है?
एक संतोष अवश्य होता है, खुद पर विश्वास रखने का। कुछ हासिल करने का। समाज के लिए, अपने लोगों के लिए तथा अपने लिए कुछ कर पाने का संतोष। पर मुड़ कर पीछे देखने पर ज्यादातर अपनी गलतियां दिखाई देती हैं। कुछ ऐसी गलतियां जो नहीं होनी चाहिए थीं। उस जगह पर और बेहतर हो सकता था, इस जगह पर यह नहीं होना चाहिए था। वे गलतियां ही हमारी गुरु हैं। इसलिए पीछे मुड़ कर देखने पर ध्यान देता हूं कि, कहां फिसला था? वे चीजें हमारे भावी जीवन के लिए मशाल का कार्य करती हैं।
 
भविष्य में आप स्वयं को एवं अपनी संस्था को कहां देखना चाहते हैं?
मैं चाहता हूं कि कोई विदेश की बड़ी शिक्षा संस्था हमारे साथ अनुबंधित हो, कर्मचारी चयन के लिए। जैसे हमारे यहां के बच्चे माइक्रोसॉफ्ट जैसी संस्थाओं से जुड़ कर गर्व का अनुभव करते हैं कुछ ऐसा ही विदेशियों के मन में हमारे देश की कंपनियों के प्रति भी हो। यह विकास हमारे पूरे समाज व देश का होना चाहिए। हम यहां की मिट्टी से जुड़ कर, यहीं की अवसरों से इतना बड़ा बन सकते हैं। कुछ वैसी ही राह जो कि मोदी जी ने दिखाई है। चाय बेंचने से लेकर, संन्यासी बनना तथा फिर प्रधानमंत्री बनना। वे सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं हैं। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसके बारे में हर व्यक्ति जानना व शोध करना चाहता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने के लिए जब हम जाते हैं तो खाने के टेबल पर हमसे मोदी जी के बारे में पूछा जाता है। जैसे कि, आप कभी मिले हैं उनसे? उनकी पृष्ठभूमि क्या है? वे क्या सोचते हैं? उनकी टीम कैसी है? यह चीज किसी ने सोची नहीं थी कि देश का प्रधानमंत्री एक आइकॉन बन जाएगा। आजतक केवल अमेरिकी राष्ट्रपति ही आइकॉन बने हैं। खासकर एशियाई लोगों को यह उपलब्धि अभी तक नहीं मिली थी।
 
देश में एक बदलाव अवश्य आना चाहिए कि सफलता के लिए कोई शार्टकट नहीं होता। कई व्यापारिक घराने एक पीढ़ी में ही समाप्त हो गए पर जो लोग किसी सोच के तहत आगे बढ़े वे पीढ़ियों तक आगे ब़ढ़ते ही चले गए। जैसे टाटा व इंफोसिस में उनका उत्तराधिकारी बाहर से एक कुशल व्यक्ति आकर बना हुआ है। खुद पर विश्वास रखते हुए अपनी कार्यकुशलता को समझते हुए आगे बढ़ो। सिर्फ आप आगे नहीं बढ़ते हैं बल्कि आपका देश भी आगे बढ़ता है। हमें आजाद हुए ७० साल हो गए पर अभी हम विकासशील देशों की श्रेणी में ही हैं। पर हमारी प्रगति संतोषजनक है। कभी कभी हम भटक जाते हैं। हमारी सब से बड़ी समस्या है, अशिक्षा। यह देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधक है।