प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से लदा असम
स्रोत: हिंदी विवेक       | दिंनाक:१४-अक्तूबर-२०१७
पूर्वोत्तर भारत प्रकृति के सौंदर्य से इतना लदाबदा है कि मन के कैनवास से वह चित्र कभी नहीं मिटेगा। पूर्वोत्तर के ये आठ राज्य हैं- असम, मेघालय, अरुणाचल, मणिपुर, नगालैण्ड, मिजोरम, त्रिपुरा और सिक्किम। हर राज्य की अपनी संस्कृति, अपना पेहराव और अपनी बोली-भाषाएं और खानपान है। इतनी विविधता तो अन्य किसी भी देश में नहीं मिलेगी।

 
भीड़-भाड़ से दूर और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर
पूर्वोत्तर पर्यटकों को खूब पसंद आ रहा है तो इसकी ठोस वजह भी है। पूर्वोत्तर राज्यों का परिवेश, मौसम और आत्मीयता पर्यटकों को आकर्षित कर लेती है। पूर्वोत्तर के पास पर्यटकों को लुभाने के लिए प्रकृति प्रदत्त हर चीज है। ब्लू पाइंस से भरे नीले पहाड़ हैं, लाल नदिया हैं, जंगल हैं, दुलर्भ वन्यजीवों से परिपूर्ण राष्ट्रीय पार्क हैं, बर्फ से ढंके पहाड़ हैं, सड़क पर चलते हुए अचानक बादलों से घिर जाने का सुदख अहसास है तो धार्मिक आस्था के लिए कामाख्या मंदिर है, विश्व का सब से बड़ा नदी द्वीप माजुली है, आकाश से बातें करता तवांग और प्रसिद्ध बौद्ध मठ हैं। राफ्टिंग और क्लामिंग के दुर्गम ठिकाने भी हैं। हर तरह के पर्यटकों की पसंद की जगह पूर्वोत्तर में उपलब्ध है। लेकिन उग्रवाद और यातायात के बेहतर साधनों के अभाव में लोग आने से बचते थे। लेकिन अब बहुत कुछ बदल गया है। यही वजह है कि प्रति वर्ष घरेलू और विदेशी सैलानियों की संख्या बढ़ रही है और इसी के साथ पर्यटकों के लिए जरूरी सुविधाएं जुटाई जा रही हैं। पूर्वोत्तर हर तरह के पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम है।
अब पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार गुवाहाटी से दिल्ली दूर नहीं है। दिल्ली ही नहीं, देश के हर बड़े शहर अब गुवाहाटी से सीधे जुड़ गए हैं। गुवाहाटी से दिल्ली, कोलकाता, मुबंई, बंगलेरू, चैन्नई, जयपुर, हैदराबाद आदि के लिए सीधी हवाई और रेल सेवा है। दिल्ली से गुवाहाटी के बीच प्रति दिन करीब एक दर्जन उड़ानें हैं। सुबह पांच बजे दिल्ली से पहली उड़ान है और शाम सात बजे गुवाहाटी से अंतिम उड़ान। उसी तरह कोलकाता और गुवाहाटी के बीच सुबह से देर शाम तक हवाई सेवा मौजूद है। गुवाहाटी से नई दिल्ली के बीच सीधी राजधानी सेवा है। जिससे लखनऊ या कानपुर होते हुए अट्ठाईस घंटों में पहुंचा जा सकता है, जबकि गुवाहाटी और कोलकाता के बीच सुपर फास्ट ट्रेनें चल रही हैं। दक्षिण भारतीय शहरों के लिए पुरी और भुवनेश्वर के रास्ते रोजाना रेल सेवा उपलब्ध है। जबकि गुवाहाटी से पूर्वोत्तर राज्यों की राजधानी-इंफाल, अगरतला, आइजल, डिमापुर (कोहिमा) के लिए नियमित उड़ानें हैं। गुवाहाटी से ही शिलांग, इटानगर और तवांग के लिए सड़क यातायात के अलावा हेलिकॉप्टर सेवा उपलब्ध है। गुवाहाटी से पूर्वोत्तर के हर शहर के लिए सीधी और आरामदायक बसें चलती हैं। पूर्वोत्तर के अधिकांश इलाके में रात-दिन घूमा जा सकता है। खास बात है कि इधर महिलाओं के साथ कभी अभद्र व्यवहार नहीं होता है। महिला पर्यटक सुरक्षित रहने के अहसास के साथ मौजमस्ती कर सकती हैं। कहीं भी आने जाने की पाबंदी नहीं है। सिर्फ अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में प्रवेश करने के लिए पर्यटकों को इनरलाइन परमिट की जरूरत पड़ती है और इसे पाने की प्रकिया काफी सहज है। दिल्ली, कोलकाता और गुवाहाटी में उन राज्यों के स्थानीय आयुक्त कार्यालय में आवेदन देकर नाम मात्र के शुल्क का भुगतान करके पाया जा सकता है।
सांस्कृतिक रूप से इतनी विविधता शायद ही देश के किसी दूसरे हिस्से में देखने को मिले। इतनी सारी संस्कृतियां, रंग-बिरंगी वेषभूषा, अलग-अलग बोलियां, खान-पान की विविधता आदि एकसाथ शायद देखा और महसूस किया जा सकता है। हरियाली के बीच पहाड़ों से घिरे खुले आकाश के नीचे पैर से लेकर ललाट तक सजे परंपरागत आभूषणों से परिपूर्ण नृत्य करती, गीत गाती सुंदर युवतियों का समूह एक अलग अहसास कराता है। ऐसे दृश्य नदी के किनारे, झरने के पास, पहाड़ी से उतरती पगडंडियों, धान के खेतों के बीच अक्सर या अनायास दिख जाते हैं। पहाड़ से उतरती नदियों का कलकल करती आवाज, पहाड़ से सैंकड़ों फीट गिरता पानी का स्त्रोत जलप्रपात बन जाता है और उससे निकलने वाला सफेद फेन पानी को चांदी का रूप दे देता है। वन्यजीवों की विविधता तो और कहीं नहीं दिखती है। असम एक सिंग वाले गैंडे के लिए विख्यात है तो मणिपुर में ही संगाई हिरण पाया जाता है। इतने सारे राष्ट्रीय पार्क, अभयारण्य सिर्फ पूर्वोत्तर में पाए जाते हैं। देश में सबसे पहले सूरज भी अरुणाचल प्रदेश में उगता है।
असम के काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क, चाय बागान, कामाख्या मंदिर, ब्रह्मपुत्र और बाघों के लिए विख्यात मानस राष्ट्रीय पार्क पयर्टकों को सब से अधिक आकर्षित करते हैं। पूर्वोत्तर में कहीं आने-जाने के लिए गुवाहाटी मुख्य पड़ाव होता है। इसलिए पर्यटकों का पहला पड़ाव गुवाहाटी होता है। गुवाहाटी से हर इलाके में जाने के लिए अलग-अलग रूट हैं। शिलांग, आइजल, इटानगर, तवांग के रास्ते यहीं से निकलते हैं। गुवाहाटी में देखने और समझने को काफी कुछ है। गुवाहाटी वायु, रेल और सड़क यातायात से जुड़ा है और हर आय वर्ग के लोगों के लिए स्टेशन के पास ही होटल और टूरिस्ट लाज हैं। स्टेशन के पानबाजार वाले छोर के बाहर ही असम पयर्टन निगम का लॉज और सूचना केंद्र है। जहां से गुवाहाटी के आसपास, गुवाहाटी-शिलांग-चेरापूंजी और गुवाहाटी-काजीरंगा के लिए चार्टर टूरिस्ट सर्विस उपलब्ध है। पयर्टक पल्टन बाजार से टैक्सी ले सकते हैं।
गुवाहाटी ब्रह्मपुत्र के किनारे है। इसी शहर के अंदर ही नीलाचल पड़ाड़ी पर कामाख्या मंदिर अवस्थित है। एयरपोर्ट से शहर जाने के रास्ते में ही कामाख्या मंदिर मिलता है। यह गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से दस और कामाख्या रेलवे स्टेशन से चार किमी है। पहाड़ी पर जाने के लिए सिटी बस, ट्रेकर और आटो नियमित मिलता है। कामाख्या मंदिर के पास ही कामाख्या देवेत्तर बोई का अपना गेस्ट हाउस भी है। पहाड़ी पर कुछ होटल भी बन गए हैं। आमतौर पर लोग शहर में ठहरते हैं और वहां से मंदिर के दर्शन हेतु जाते हैं। कामाख्या मंदिर से सुबह आठ बजे से सूर्यास्त तक दर्शन किया जा सकता है। दोपहर में एक बजे से तीन बजे तक कपाट बंद रहता है। दर्शन के लिए विशेष पास भी खरीदे जा सकते हैं। इसकी पहाड़ी की चोटी से ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे पूरी गुवाहाटी का विहंगम दृश्य निहारा जा सकता है। गुवाहाटी में ही ब्रह्मपुत्र के बीच में उमानंद मंदिर जाया जा सकता है। नाव सेवा सुबह से शाम तक उपलब्ध है। गुवाहाटी का विशाल संग्रहालय भी दर्शनीय है। असम की संस्कृति को समझने के लिए पयर्टकों को श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र जरूर जाना चाहिए। इसे असमिया संस्कृति का आइना भी कहा जाता है।
गुवाहाटी के शोरगुल से दूर श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र नृत्य, संगीत, चित्रकारी, नाटक आदि को बढ़ावा देने के साथ यह कलाक्षेत्र लुप्त हो रही असमिया संस्कृति की कई धाराओं के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान कर रहा है। जहां पर दिन भर विभिन्न विधाओं के कलाकारों की गतिविधियां जारी रहती हैं तो उनके इर्द-गिर्द दर्शकों की अच्छी संख्या घूमती रहती हैं। वहां पर लुप्त हो चुके संगीत के वाद्ययंत्रों का संग्रहालय है तो कला-संस्कृति पर शोध के लिए पर्याप्त पुस्तकों व शोध ग्रंथों का भंडार है। यह कहा जा सकता है कि यह कलाक्षेत्र कलाप्रेमियों के लिए एक जरूरत बन गया है। इसका निमार्ण असम की सांस्कृतिक संपदा के संरक्षण और विकास के लिए हुआ है। असम की विभिन्न जनजातीय संस्कृति का संरक्षण जरूरी था। इसलिए इसके निर्माण में इस बात का ध्यान रखा गया है, ताकि लोगों को एक नजर में असम की विभिन्न सांस्कृतिक धाराओं और विधाओं की एक झलक मिल जाए। प्रवेश द्वार का निर्माण आहोम राजाओं के काल में शिवसागर में बनाए गए रंगघर की तर्ज पर हुआ है। कलाक्षेत्र की लंबी दीवारों में असम की बहुविध संस्कृति से जुड़ी चित्रकारी से सजाया गया है। सिर्फ इसे ही देखने में पूरा दिन बीत जाता है। इसका विशाल क्षेत्र और हरी घास लोगों का मन मोह लेती है। अठारह हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैले इस कलाक्षेत्र का डिजाइन कलात्मक रुझान को ध्यान में रख कर तैयार किया गया था। इसमें प्रवेश करते ही एक अलग परिवेश की अनुभूति होने लगती है। इसका महत्वपूर्ण पक्ष सांस्कृतिक संग्रहालय है। जहां पर लुप्त हो चुके वाद्य यंत्रों को करीब से देखा जा सकता है। यहां का कलाकार गांव भी आकर्षण का एक बड़ा केंद्र बन गया है। असम की विभिन्न जनजातीय संस्कृति से जुड़े कलाकारों की कार्यशालाओं के साथ उनकी कला के नमूनों का प्रदर्शन चलते रहता है। हर तरह के आयोजन के लिए अलग-अलग क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं। कला, संगीत और नाटक के बड़े आयोजन अब यहीं पर होने लगे हैं।
मुख्य संग्रहालय में असम के जनजातीय समूहों के इस्तेमाल में आने वाली वस्तुओं को देखा जा सकता है। यह अन्य राज्यों से आने वाले पयर्टकों के लिए महत्वपूर्ण स्थल है। जहां जाने मात्र से असम के जनजातियों के बारे में कई जानकारी एकसाथ मिल जाती है। मुक्ताकाश थिएटर में दो हजार लोगों के बैठने की क्षमता है। यहां पर परंपरागत नृत्य और नाटक का मंचन किया जाता है। साहित्य भवन यहां का पुस्तकालय है। जहां पर पांडुलिपियों और पुस्तकों का भंडार है। असम के साथ पूर्वोत्तर के साहित्य को यहां बैठ कर समझा जा सकता है। कला, संगीत, फाइट आर्टस, नाटक आदि पर शोध करने वालों के लिए यह खास जगह है। असम की विभिन्न परंपराओं के अध्ययन के लिए जरूरी सारी पुस्तकें वहां पर उपलब्ध हैं। ललित कला भवन चित्रकारों और चित्र प्रेमियों की प्रिय जगह है। अक्सर कला प्रदर्शनी चलती रहती है। संस्कृति और कला पर होने वाली कार्यशालाएं यहीं पर आयोजित की जाती हैं। इसके साथ एक हैरिटेज पार्क भी है। घरेलू पयर्टकों को आकर्षित करने के मकसद से बच्चों के लिए पार्क के साथ शाम में साउंड और लाइट शो की भी व्यवस्था होती है। अब नाट्य समारोह, जनजातीय नृत्य महोत्सव आदि भी यहीं आयोजित होते हैं। शाम की मस्ती के लिए ब्रह्मपुत्र के किनारे कई फ्लोटिंग रेस्टॉरेंट आ चुके हैं। जहां पर लोग गर्मी की उमस भरी शाम ब्रह्मपुत्र में तैरते रेस्टोरेंट पर पूरे परिवार के साथ बिता सकते हैं। कुछ फ्लोटिंग रेस्टोरेंट में तो बार और डिस्कोथेक की भी सुविधा है।
खजुराहो मदन कामदेव
गुवाहाटी से महज चालीस किमी दूर और राष्ट्रीय राजमार्ग-५२ पर स्थित बाइहाटा चारियाली से मात्र तीन किमी दूर, जगंलों के बीच देवानगिरी नामक एक छोटी सी पहाड़ी पूर्वोत्तर का 'खजुराहो'- मदन कामदेव के कई रहस्यों, उत्कंठा और प्राचीन कामरूप नगरी के शिलालेखों का गवाह है। वहां पर खजुराहो की तरह यौन क्रियारत कई मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं। इसके सामने ही ब्रह्पुत्र के उस पार नीलाचल पहाड़ी है। जहां पर मां कामाख्या का मंदिर विराजमान है। वहां पर कई शिव मंदिरों के प्रमाण मिले हैं। उनके इर्द-गिर्द पत्थर को तराश कर बनाई गई विभिन्न मुद्राओं की मूर्तियों का विपुल भंडार है। उन मूर्तियों में देवी-देवताओं के चित्रों के अलावा यौनरत पशुओं और मनुष्य की आकृतियां उकेरी गई हैं। दीवालों, प्रवेश द्वार, खंभों आदि पर फूल, पशु, छहमुखी भैरव, चार सिर वाले शिव, कल्पवृक्ष आदि की आकृतियां उकेरी गई हैं। शायद इसीलिए इसका नाम मदन कामदेव पड़ा है।
यह माना जाता है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने की वजह से उपजे क्रोध में तीसरे नेत्र खुलने से भस्म हो गए प्यार के देवता कामदेव या मदन का पुनर्जन्म इसी जगह पर हुआ था। यह भी धारणा है कि पुनर्जन्म के बाद मदन अपनी पत्नी रति के साथ इसी जगह पर रहने लगे थे। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि इस जगह पर मौजूद यौन क्रीड़ारत कई आकृतियों के कारण इस जगह का नाम मदन कामदेव पड़ गया है। शायद खजुराहो के अलावा भारत में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां पर इतनी संख्या में कामुक मुद्राओं की आकृतियों को उकेरा गया है। शायद इसीलिए इस जगह का चुनाव ब्रह्पुत्र के दूसरे किनारे पर आबादी से कुछ अलग किया गया है।
गुवाहाटी से तवांग जाते वक्त कुछ देर के लिए तेजपुर में रुका जा सकता है। वहां का अग्निगढ़ महाभारतकालीन पात्र और कृष्ण के पोते अनिरुद्ध तथा बाणासुर राजा की बेटी उषा की प्रेम कहानी का प्रतीक है। जिसे अब सुंदर पार्क का रूप दे दिया गया है। इसके भग्नावेष में एक प्रेम कहानी कैद है। तेजपुर महाभारतकालीन असुर राजा बाणासुर की राजधानी थी। शिवभक्त बाणासुर के पास कई चमत्कारिक शक्तियां थीं। अग्निगढ़ का निर्माण राजा बाणासुर ने अनिरुद्ध को कैद कर रखने के लिए कराया था। बाद में श्रीकृष्ण ने आकर अपने पोते को मुक्त कराया था।
यदि सुनहरे कपड़े की कारीगरी का अवलोकन करना है तो गुवाहाटी से सटे सुआलकुची गांव जाना बुरा नहीं लगेगा। गुवाहाटी से नियमित बस सेवा के साथ भाड़े की टैक्सी उपलब्ध है। गुवाहाटी से करीब पैंतीस किमी दूर ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे सुआलकुची के हर घर में युवतियां सुनहरे मूंगा सिल्क के धागे से सुंदर भविष्य के सपने बुनती हैं। गांव के हर घर में आज भी करघा चलता है। यहां के बने कपड़े विदेश तक जाते हैं। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जब गुवाहाटी आए तो खुद को सुआलकुची जाने से नहीं रोक पाया। वैसे मूगा सिर्फ असम में पाया जाता है। मूगा सिल्क के कपड़े का सब से अधिक उत्पादन इसी गांव में होता है। संभवत: इसी बात के कारण इस गांव को पूरब का मानचेस्टर कहा जाता है। मूगा सिल्क का सुनहरा रंग इसकी सब से बड़ी विशेषता है। यह सिल्क विश्व में और कहीं नहीं मिलता है। पर्यटक यादगार के रूप में मूगा के कपड़े और साड़ियां उचित दाम देकर खरीद सकते हैं।
असम में आज भी आश्रम में गुरु-शिष्य परंपरा विद्यमान है। इसके देखने के लिए ब्रह्मपुत्र के बीच बसे एशिया के सबसे बड़े नदी द्वीप माजुली जाना होगा। वहां तक पहुंचने के लिए पहले जोरहाट जाना होगा। जोरहार राष्ट्रीय राजमार्ग है। वहां तक सीधी वायु और रेल सेवा भी है। माजुली का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। असम की विभिन्न जनजातीय समाज को एक मंच पर लाने और वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए असम के संत श्रीमंत शंकर देव ने असम में सत्रों की स्थापना की थी। सत्र एक तरह से आश्रम व्यवस्था थी। जहां पर गुरू और छात्र एक साथ रहते, ज्ञान ग्रहण करते, कर्म, कृषि, हस्तकला, धर्म और संस्कृति की नैतिक और व्यवहारिक शिक्षा ग्रहण करते हैं। जहां खेती करने के साथ नृत्य, गीत और वाद्ययंत्र के प्रयोग की भी शिक्षा दी जाती है। यह आश्रम व्यवस्था आज भी जारी है। सत्र के प्रमुख को सत्राधिकारी कहा जाता है। शंकर देव ने आराधना के लिए नामघर स्थापित किया, जहां कोई मूर्ति नहीं होती। लेकिन वे श्रीकृष्ण के अनुयायी हैं। काजीरंगा से जोरहाट जाने के दौरान सड़क के दोनों ओर चाय बागान के नजारों को निहारा जा सकता है।
जंगल सफारी- काजीरंगा
जंगल सफारी का मजा लेने वालों के लिए प्रसिद्ध काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क बेहतर जगह है जिसके घने जंगलों के बीच दिन में अंधेरे का अहसास होता है। हाथी पर चढ़ कर पक्षियों के कलरव के बीच एक सिंग वाले गैंडे और अन्य वन्यजीवों को करीब से देखने का आनंद काजीरंगा में लिया जा सकता है। वन विभाग पयर्टकों को घुमाने के लिए प्रशिक्षित हाथियों का उपयोग करता है। हाथियों के काफिले के साथ वन विभाग के सुरक्षा कर्मी भी हथियार लेकर चलते हैं, ताकि किसी जानवर के हिंसक हो जाने की स्थिति से निपटा जा सके। इसलिए पर्यटक बेखौफ होकर जंगल सफारी का आनंद ले सकते हैं।
गुवाहाटी से काजीरंगा करीब पांच घंटे की ड्राइव पर पहुंचा जा सकता है। यह राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे हैं। गुवाहाटी में भाड़े की कार उपलब्ध है। असम जाने वाली सभी बसें इसी मार्ग से गुजरती हैं। देश के किसी भी हिस्से से गुवाहाटी तक सीधी वायु और रेल सेवा उपलब्ध है। जो पर्यटक वहां रुकना नहीं चाहते, वे तड़के सुबह गुवाहाटी से निकल कर देर रात तक वापस भी आ सकते हैं, लेकिन एक रात काजीरंगा में रुके बिना जंगल सफारी का आनंद नहीं मिल सकता है।
अक्टूबर से अप्रैल तक असम का मौसम जंगल सफारी के अनुकूल रहता है। न गर्मी और न ठंड। साथ में सुरक्षा का अहसास्। दिन की कमजोर धूप में जंगल के बीच से गुजरना हर पर्यटक को हर अच्छा लगता है। रात की हल्की ठंड में कैंप फायर बेहिसाब आनंद देता है। यदि उस दौरान बदली घिर जाए तो फुहार पड़ने लगे तो जंगल में मंगल हो जाता है। प्रति वर्ष अक्टूबर के आरंभ में इस पर्यटकों के लिए खोल दिया जाता है।
जंगल के अंदरूनी इलाके तक जाने के लिए वन विभाग ने जीप की व्यवस्था की है। लेकिन जंगल सफारी का आनंद तो हाथियों की सवारी है। जिसके लिए निर्धारत दर तय है। एक हाथी पर तीन-चार पर्यटक आराम से सफर कर सकते हैं। चाहें तो पूरा हाथी भी रिर्जव कर सकते हैं। जंगल के अंदरूनी इलाके तक जाने के लिए पर्यटकों से सुबह जाने का आग्रह किया जाता है, ताकि अंधेरा होने के पहले जंगल के बाहर आया जा सके। शाम के बाद जंगल के अंदर रहना खतरनाक हो सकता है। इसलिए वन विभाग के कर्मचारी शाम होते ही पयर्टकों को बाहर जाने का आग्रह करते रहते हैं। हाथी पर सवार होकर गैंड़ों को करीब से देखने का आनंद कुछ और है। महावत को गैंड़ों के स्वभाव के पता होता है। वे वैसे मादा गैंड़े के करीब नहीं जाते हैं, जिनके बच्चे उनके साथ रहते हैं। अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए मादा गैंड़ा हाथी पर आक्रमण कर सकती है। खास बात यह है कि गैंड़े घने जंगलों की बजाय बड़ी घास से भरे मैदानों में विचरण करना पसंद करते हैं। उस इलाके में सड़क नहीं है, इसलिए पयर्टक हाथी पर जाना ज्यादा पसंद करते हैं। काजीरंगा आने वाले विदेशी पयर्टक तो हाथी पर ही पूरे जंगल की यात्रा करना चाहते हैं। सुबह जाने से शाम में ही जंगल से बाहर आते हैं, इसलिए पयर्टक साथ में पानी की बोतल और लंच पैकेट लेकर जाते हैं। इसकी व्यवस्था गेस्ट हाउस वाले कर देते हैं।
पर्यटकों के आग्रह पर रात में पार्क के बाहरी इलाके में वन विभाग के लोग कैंप फायर का भी आयोजन करते हैं। वहीं पर खाने-पीने का इंतजाम किया जाता है। कुछ पर्यटक मछली मारते हैं। पर्यटक चाहें तो वन्य जीवों और वनपस्तियों के बारे में विशेष जानकारी के लिए वन विभाग के विशेषज्ञों की मदद ले सकते हैं।
कोहरा रेंज
कोहरा रेंज में पर्यटकों के लिए कई गेस्ट हाउस और रिसोर्ट्स बन चुके हैं। हर श्रेणी के लोगों के लिए होटल उपलब्ध है। जिसकी बुकिंग पहले से करा लेना बेहतर होता है। इसके अलावा ग्रामीणों के घर के हिस्से में बने गेस्ट हाउस में घरेलू माहौल में रहा जा सकता है।
असम में जंगल सफारी के लिए मानस नेशनल पार्क भी बेहतर जगह है। यह भी गुवाहाटी से करीब साढ़े तीन घंटे की ड्राइव पर है। वैसे रेल से बरपेटा रोड स्टेशन से वहां तक पहुंचा जा सकता है। मानस नेशनल पार्क में चीते की पर्याप्त संख्या है।
मानस टाइगर प्रोजेक्ट
करीब सवा पांच सौ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले मानस वन्य क्षेत्र को चीता के लिए विशेष तौर पर जाना जाता है तथा देश में पहली दफा टाइगर प्रोजेक्ट पर मानस में ही काम शुरू किया गया था। पिछले कुछ वर्षों पर वहां पर पर्यटकों की संख्या बढ़ी है। इसे देखते हुए कुछ पर्यटक गेस्ट हाउस बनाए गए हैं। बरपेटा रोड में पर्यटकों के लिए जीप और हाथी की भी व्यवस्था की गई है। मानस के बीच में वन विभाग के गेस्ट हाउस में एक रात बिता कर रोमांचकारी अनभुव बटोरा जा सकता है। इस गेस्ट में बिजली की व्यवस्था नहीं है, लेकिन पयर्टकों के जाने पर जेनरेटर चलाए जाते हैं। वहां पर खाने-पीने की व्यवस्था है। रात में जब चारों तरफ अंधेरा छा जाता है, तब कमरे की बंद खिड़की से बाहर विचरण करते जंगली जानवरों के स्वछंद को निहारा जा सकता है। कई तरह के जंगली जानवर गेस्ट हाउस के बरामदे में विचरण करते हैं। वहां तक सिर्फ जीप से पहुंचा जा सकता है।
गुवाहाटी से मात्र पैंतीस किमी की दूरी पर पवितरा अभयारण्य भी जंगल सफारी के लिए बेहतर स्थान है। वहां भी एक सींग वाले गैंड़े देखे जा सकते हैं। वहां पर वन विभाग का गेस्ट हाउस भी है। ज्यादातर लोग सुबह जाते हैं और शाम तक लौट आते हैं। लेकिन वहां पर एक रात रुकना बुरा नहीं होता।